Wednesday 20, August 2025
जीवन की मूल प्रेरणा कर्तव्य पालन | Jeevan Ki Mul Prerana Kartavya Palan
Ep:-54 तुम मेरा काम करो हम तुम्हारा काम करेंगे
अमृतवाणी:- युग परिवर्तन की बेला | Yug Parivartan Ki Bela | पूज्य गुरुदेव पं० श्रीराम शर्मा आचार्य
गायत्री मन्त्र में उच्चारण का महत्व | Gayatri Mantra Mei Uccharan Ka Mehtav
संयम है आरोग्य का मूल | Sanyam Hai Aarogya Ka Mool
वायु तत्व का उपयोग | Vayu Tatva Ka Upyog
मन मैला ही रहा अगर तो, उजला तन बेकार है |
अमृत सन्देश:- आध्यात्मिकता का आधार | Aadhyamikta Ka Aadhar
गायत्रीतीर्थ शांतिकुंज, नित्य दर्शन
आज का सद्चिंतन (बोर्ड)
आज का सद्वाक्य
नित्य शांतिकुंज वीडियो दर्शन
अमृत सन्देश : सच्चा साधक कौन हैं ? Saccha Sadhak Koun Hai
!! शांतिकुंज दर्शन 20 August 2025 !! गायत्री तीर्थ शांतिकुञ्ज हरिद्वार !!
परम् पूज्य गुरुदेव का अमृत संदेश
बेटे, छोटे सितारे की जिंदगी धन्य है। रात को, रात को एक छोटा सितारा चमकता है। रात में जब सब ओर अंधेरा फैला हुआ है, अब हमको कहां चलना चाहिए, कहां जाना चाहिए? और रात को निकलने वाला सितारा रास्ता बताता है। आइए, हम रास्ता बता सकते हैं आपको। देखिए, पूर्व इधर है। देखिए, पश्चिम इधर है। छोटा सा सितारा उनको रास्ता बताता है।
मुसाफिर, भटकने वाला मुसाफिर, गुमराह होने वाला मुसाफिर रास्ता तलाश कर लेता है और देखता है, उसको धन्यवाद देता है। किसको? रात को निकलने वाले तारे को। क्या कहता है? Thank you for a tiny spark. Twinkle twinkle little star, छोटे तारे चमको चमको। थैंक यू फॉर अटिनी स्पार्क। ट्विंकल ट्विंकल लिटिल स्टार, छोटे तारे चमको चमको। थैंक यू फॉर अटिनी स्पार्क, तुम्हारी छोटी सी चिंगारी के लिए धन्यवाद। देन द ट्रबलर इन द डार्क, हाउ आई वंडर व्हाट यू आर? छोटे वाले बच्चे गाते रहते हैं। गाते रहते हैं। पाँचवें दर्जे की या दूसरे दर्जे की किताब में पढ़ाया जाता रहता है।
ऐ तारे, आप धन्य हैं। ऐ दीपक, आप धन्य हैं। आप जले, ठीक। बर्बाद हो गए, आप ठीक। आप क्षदाम के थे, आप एक मिट्टी के बने हुए थे। लेकिन आपने वह रोशनी पैदा की, जिसकी वजह से हम ठोकर खाने से बच गए। वह आदमी, जो उन्होंने अपनी जिंदगी को इस तरीके से जिया, इस तरीके से जिया — उसको शांति मिलने वाली है, उसको संतोष मिलने वाला है।
जिसके सफेद कपड़ों के ऊपर दाग-धब्बे नहीं लगाए। किसी ने गंदा जीवन नहीं जिया। लोगों के सामने जिन्होंने उदाहरण पेश नहीं किए — बेटे, मैं उसको इज्जतदार आदमी मानता हूं। और उसको मैं संत कहता हूं। शरीफ आदमी को मैं संत कहता हूं। आपने अगर शराफत की जिंदगी जी ली, संत की जिंदगी जी ली — ऐसे जमाने में, हर आदमी अपना ईमान खोता चला जा रहा है। एक-एक पैसे के लिए जहां लोग ईमान खो रहे हैं और छोटी-छोटी बातों के लिए, और जरा-सी बातों के लिए फिसलते हुए चले जा रहे हैं — अगर आदमी उस फिसलन के जमाने में चट्टान की तरीके से खड़ा रह गया, तो मैं कहता हूं, उसको शांति मिलने वाली है। और उसको सुख मिलने वाला है।
एक, एक आपकी जीवात्मा का हिस्सेदार और पार्टनर — उसको भी मिलना चाहिए हिस्सा, शेयर। उसको भी मिलना चाहिए, जिसकी भूख है। आपकी तो भूख उन चीजों की है, जिसको हम वासना, तृष्णा कहते हैं। पर आत्मा की तो भूख नहीं है। आत्मा की भूख यह है — आत्मा की भूख यह है कि आपका उच्च स्तरीय चरित्र बनता रहे। उच्च स्तरीय चरित्र बनाने के लिए, आप अपनी जीवन की संपदा में से कोई हिस्सा निकालते हैं कि नहीं? जवाब दीजिए। नहीं? हम तो भजन करते हैं।
बेटे, भजन की बात करेगा तो मैं फिर आपको गाली देंगे। भजन, भजन, भजन, भजन — लेके चल दिया है। भजन करता हूं, भजन करता हूं। नहीं है भजन। भजन को भगवान के यहां कोई स्रोत नहीं है। हमने खाते में भगवान के यहां देखा था, और ये पूछा था — आपके यहां कोई भजन का अकाउंट है? उन्होंने कहा — भजन का कोई अकाउंट नहीं है। भजन का कोई अकाउंट नहीं है। हमारे यहां शराफत का इसका अकाउंट है। और हमने जिंदगी किस तरीके से जी — आपने हमारा, इसका अकाउंट है। आप बताइए, कैसे जिंदगी जीते हैं। हम भजन करते हैं? नहीं, हमें नहीं जरूरत है। और भगवान के यहाँ भजन से कोई ताल्लुक नहीं है।
अखण्ड-ज्योति से
उपासना का अर्थ मात्र देवालय बना देना नहीं है। वैसा जीवन भी जीना होता है, तभी वह सफल है।
चित्रगुप्त अपनी पोथी के पृष्ठों को उलट रहे थे। यमदूतों द्वारा आज दो व्यक्तियों को उनके सम्मुख पेश किया गया था। यमदूतों ने प्रथम व्यक्ति का परिचय कराते हुए कहा, “यह नगर सेठ हैं। धन की कोई कमी इनके यहाँ नहीं। खूब पैसा कमाया है और समाज हित के लिये धर्मशाला, मन्दिर, कुआँ और विद्यालय जैसे अनेक निर्माण कार्यों में उसका व्यय किया है।” अब दूसरे व्यक्ति की बारी थी। उसे यमदूत ने आगे बढ़ाते हुए कहा, "यह व्यक्ति बहुत गरीब है। दो समय का भोजन जुटाना भी इसके लिए मुश्किल है।
एक दिन जब ये भोजन कर रहे थे, एक भूखा कुत्ता इनके पास आया। इन्होंने स्वयं भोजन न कर सारी रोटियाँ कुत्ते को दे दीं। स्वयं भूखे रहकर दूसरे की क्षुधा शान्त की। अब आप ही बतलाइये कि इन दोनों के लिये क्या आज्ञा है?" चित्रगुप्त काफी देर तक पोथी के पृष्ठों पर आँखें गड़ाये रहे। उन्होंने बड़ी गम्भीरता के साथ कहा-धनी व्यक्ति को नरक में और निर्धन व्यक्ति को स्वर्ग में भेजा जाये।"
चित्रगुप्त के इस निर्णय को सुनकर यमराज और दोनों आगन्तुक भी आश्चर्य में पड़ गये। चित्रगुप्त ने स्पष्टीकरण देते हुए कहा-धनी व्यक्ति ने निर्धनों और असहायों का बुरी तरह शोषण किया है। उनकी विवशताओं का दुरुपयोग किया है और उस पैसे से ऐश और आराम का जीवन व्यतीत किया। यदि बचे हुये धन का एक अंश लोकेषणा की पूर्ति हेतु व्यय कर भी दिया, तो उसमें लोकहित का कौन सा कार्य हुआ?
निर्माण कार्यों के पीछे यह भावना कार्य कर रही थी कि लोग मेरी प्रशंसा करें, मेरा यश गायें। गरीब ने पसीना बहाकर जो कमाई की, उस रोटी को भी समय आने पर भूखे कुत्ते के लिए छोड़ दी। यह साधन-सम्पन्न होता, तो न जाने अभावग्रस्त लोगों की कितनी सहायता करता? पाप और पुण्य का सम्बन्ध मानवीय भावनाओं से है, क्रियाओं से नहीं। अतः मेरे द्वारा पूर्व में दिया गया निर्णय ही अंतिम है।" सबके मन का समाधान हो चुका था।
अखण्ड ज्योति – अक्टूबर 1995 पृष्ठ 32
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