Thursday 21, August 2025
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गायत्रीतीर्थ शांतिकुंज, नित्य दर्शन
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अमृत सन्देश : समाज के योगदान को मत भूलो | Samaj Ke Yogdan Ko Mat Bhulo
!! परम पूज्य गुरुदेव का कक्ष गायत्री तीर्थ शांतिकुञ्ज हरिद्वार 21 August 2025 !!
!! शांतिकुंज दर्शन 21 August 2025 !! गायत्री तीर्थ शांतिकुञ्ज हरिद्वार !!
परम् पूज्य गुरुदेव का अमृत संदेश
शराफ़त की अच्छी ज़िंदगी जीने के लिए, अपनी जीवात्मा की खुराक देने के लिए कमर बाँध के खड़ा होना पड़ेगा। अगर आप नए योग्य, संदेशवाहक के रूप में चलते हैं, तब यह काम आप कर सकते हैं। यह काम आपके स्वयं के काबू में है। कोई कहना—“नहीं”—मानता, कोई कहना—“नहीं”—मानता होगा, मैंने मान लिया, लेकिन आप तो अपना कहना मान सकते हैं। आपकी अक्ल का आप पर अधिकार तो होना चाहिए। आपका शरीर पर आपका अधिकार तो होना चाहिए। फिर आप क्यों नहीं मानते? अपनी अपनी ज़िंदगी को आप शराफ़त से व्यतीत कीजिए।
एक और भी चीज़ है, बेटे—हमारी मनुष्य की ज़िंदगी में वह यह है कि हमारा शरीर चक्र, समाज चक्र, जल चक्र—एक इस पहिये पर घूम रहा है जिसमें सहकारिता के ऊपर, सहयोग के ऊपर, एक दूसरे की सहायता करने के ऊपर, सेवा करने के ऊपर टिका हुआ है। आप देखते नहीं हैं—शरीर खास कमाता रहता है, मुँह खाता रहता है, पेट से हजम करता रहता है, हृदय में खून जाता है, नाड़ियों में घूम जाता है—एक दूसरे की सहकारिता पर टिके हुए हैं।
हम लोग—अगर हमारी और आपकी तरीके से यह शरीर स्वार्थी बन जाए, फिर मुश्किल खड़ी हो जाए। फिर कोई शरीर ज़िंदा नहीं रह सकेगा। और यह मनुष्य समाज—अगर बादलों की तरह समुद्रों की तरह चलना नहीं चाहेगा, यह मानव समाज मर जाएगा। समुद्र पानी देता है बादलों को, बादल बरस जाते हैं, जमीन पर पानी चला जाता है, नदियों में नदियां चली जाती हैं, समुद्र में सभी से चक्र घूमता रहता है, और सर्कल घूमता रहता है। आप सर्कल को घुमाना नहीं चाहते, तो फिर दुनिया में तबाही आएगी और आपके लिए मुसीबत आएगी। तबाही आएगी—दुनिया में मुसीबत आएगी।
अगर एक आदमी—जो कुछ भी कमाएगा—स्वयं ही खाएगा, और दूसरों की कमाई भी खाएगा, अपनी भी खाएगा; जिस समय हमने पैदा हुआ है, जिस समाज में पैदा हुए हैं, उसकी समस्याओं के लिए हम कोई योगदान नहीं देंगे, अपेक्षा करते रहेंगे कि हमें क्या काम है—किसी से? और अपने मतलब से मतलब, अपने मतलब से मतलब, अपने मतलब से मतलब...
अच्छा, आप अपने मतलब से मतलब रख रहे हैं। तो यह कहााँ से लाए हैं कपड़ा? कहााँ से कपड़ा लाए? समाज ने बना करके दिया है। पैसे से देकर—“हाँ साहब यह तो पैसे दिया है—देकर लिया।” अच्छा, तो पैसे देकर लाए हैं सब चीज़? अच्छा, तो आपने मां को—जो आपको पेट में रखा और जिसने आपको दूध पिलाया—कितने पैसे देकर लाए? पैसे वाला बना है—बड़ा भारी पैसे वाला।
बीवी, जो तेरे पास आई है, और सारी ज़िंदगी तेरी सेवा करती है, कितने पैसे में खरीद के लाए?
“नहीं महाराज जी, मैं तो पैसे से लाया हूँ—बड़ा पैसे वाला आया।”
जिस ज़मीन पर रहता है—यह जमीन कितने पैसे में तूने खरीदी है? और जिस सड़क पर तू चलता है—यह सड़क कितने पैसे में खरीदी? और जिस गंगा जी में नहा कर आया, तूने कितने पैसे में खरीदी? और सूरज, जिसकी रोशनी में बैठता है, कितने पैसे में खरीदा? पैसा पैसा पैसा...—पैसे से देकर खरीदता हूँ, बड़ा पैसे वाला है।
तो क्या हुआ? सारा समाज का अनुदान है—जिसकी वजह से हमें बोलना आता है, सोचना आता है। जिसकी वजह से हम पढ़ाई करते हैं, ज्ञान मिलता है। जिसकी वजह से हमारी तरक्की हुई है, तरक्की हुई है। और समाज के प्रति आपके कर्तव्य हैं—कुछ कर्तव्य हैं? नहीं?
हमारे अपने बेटे का ब्याह करना है—बेटे का ब्याह करना है। हाँ, बेटे का ब्याह भी करना है, और समाज का—समाज का भी ब्याह करना है। इस समय में हम पैदा हुए हैं, युग में पैदा हुए हैं, देश में पैदा हुए हैं, धर्म में, समय में, संस्कृति में—उसकी भी कोई जिम्मेदारी है। हमारी नहीं? इसकी कोई जिम्मेदारी नहीं है?
साहब हम तो अपना मौज करने की जिम्मेदारी है, और औलाद की जिम्मेदारी है। अब मैंने मान लिया—औलाद की भी जिम्मेदारी है, और शरीर की भी जिम्मेदारी है—but यह भी जिम्मेदारी है।
नहीं साहब, यह जिम्मेदारी नहीं है? तो मैं एक बात कहता हूँ—मैं आपको शांति नहीं मिलेगी।
अखण्ड-ज्योति से
कष्ट पीड़ित, कामनाग्रस्त, ऋद्धि सिद्धि के आकाँक्षी, स्वर्ग मुक्ति के फेर में पड़े हुए, विरक्त , निराश व्यक्ति भी हमारे संपर्क में आते रहते हैं। ऐसे कितने ही लोगों से हमारे सम्बन्ध भी हैं, पर उनसे कुछ आशा हमें नहीं रहती। जो अपने निजी गोरखधन्धे में इतने अधिक उलझे हुए हैं कि ईश्वर, देवता, साधु, गुरु किसी का भी उपयोग अपने लाभ के लिए करने का ताना-बाना बुनते रहते हैं, वे बेचारे सचमुच दयनीय हैं।
जो लेने के लिए निरन्तर लालायित हैं, उन गरीबों के पास देने के लिए है ही क्या? देगा वह—जिसका हृदय विशाल है, जिसमें उदारता और परमार्थ की भावना विद्यमान है। समाज, युग, देश, धर्म, संस्कृति के प्रति अपने उत्तरदायित्व की जिसमें कर्तव्य-बुद्धि जम गई होगी—वही लोक-कल्याण की बात सोच सकेगा और वही वैसा कुछ कर सकेगा। आज के व्यक्ति वादी, स्वार्थ परायण युग में ऐसे लोग चिराग लेकर ढूँढ़ने पड़ेंगे। पूजा उपासना के क्षेत्र में अनेक व्यक्ति अपने आपको अध्यात्म-वादी कहते मानते रहते हैं पर उनकी सीमा अपने आप तक ही सीमित है। इसलिए तत्वतः वे भी संकीर्ण व्यक्ति वादी ही कहे जा सकते हैं।
हमारी परम्परा पूजा उपासना की अवश्य है पर व्यक्ति बाद की नहीं। अध्यात्म को हमने सदा उदारता, सेवा और प्रस्ताव की कसौटी से कसा है और स्वार्थी को खोटा एवं परमार्थी को खरा कहा है। अखण्ड-ज्योति परिवार में दोनों ही प्रकार के खरे-खोटे लोग मौजूद हैं। अब इनमें से उन खरे लोगों की तलाश की जा रही है जो हमारे हाथ में लगी हुई मशाल को जलाये रखने में अपना हाथ लगा सकें, हमारे कंधे पर लदे हुए बोझ को हलका करने में अपना कंधा लगा सकें।
ऐसे ही लोग हमारे प्रतिनिधि या उत्तराधिकारी होंगे। इस छाँट में जो लोग आ जावेंगे उनसे हम आशा लगाये रहेंगे कि मिशन का प्रकाश एवं प्रवाह आगे बढ़ाते रहने में उनका श्रम एवं स्नेह अनवरत रूप से मिलता रहेगा। हमारी आशा के केन्द्र यही लोग हो सकते हैं। और उन्हें ही हमारा सच्चा वात्सल्य भी मिल सकता है। बातों से नहीं काम से ही किसी की निष्ठा परखी जाती है और जो निष्ठावान् हैं उनको दूसरों का हृदय जीतने में सफलता मिलती है। हमारे लिए भी हमारे निष्ठावान् परिजन ही प्राणप्रिय हो सकते हैं।
लोक सेवा की कसौटी पर जो खरे उतर सकें, ऐसे ही लोगों को परमार्थी माना जा सकता है। आध्यात्मिक पात्रता इसी कसौटी पर परखी जाती है। हमारे उस देव ने अपनी अनन्त अनुकम्पा का प्रसाद हमें दिया है। अपनी तपश्चर्या और आध्यात्मिक पूँजी का भी एक बड़ा अंश हमें सौंपा है। अब समय आ गया जब कि हमें भी अपनी आध्यात्मिक कमाई का वितरण अपने पीछे वालों को वितरित करना होगा।
पर यह क्रिया अधिकारी पात्रों में ही की जायगी, यह पात्रता हमें भी परखनी है और वह इसी कसौटी पर परख रहे हैं कि किस के मन में लोक सेवा करने की उदारता विद्यमान है। इसी गुण का परिचय देकर किसी समय हमने अपनी पात्रता सिद्ध की थी अब यही कसौटी उन लोगों के लिए काम आयेगी जो हमारी आध्यात्मिक पूँजी के लिए अपनी दावेदारी प्रस्तुत करना चाहेंगे।
पं श्रीराम शर्मा आचार्य
अखण्ड ज्योति दिसम्बर 1964 पृष्ठ 50-51
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