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Monday 20, October 2025

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प्रकाश व खुशियों के महापर्व दीपावली में आपके जीवन में सुख, शांति एवं समृद्धि आये शुभ दीपावली की आप सभी को हार्दिक शुभकामनाएँ

प्रकाश व खुशियों के महापर्व दीपावली में आपके जीवन में सुख, शांति एवं समृद्धि आये शुभ दीपावली की आप सभी को हार्दिक शुभकामनाएँ

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एक दीपक… जो अंधकार मिटा दे  शुभ दीपावली की अनंत शुभकामनाएँ।

एक दीपक… जो अंधकार मिटा दे शुभ दीपावली की अनंत शुभकामनाएँ।

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अमृत सन्देश:-  दुख का असली कारण आपकी ही कल्पनाएँ | Dukh Ka Asli Karan Aapki Hi Kalpnayen पंडित श्रीराम शर्मा आचार्य

अमृत सन्देश:- दुख का असली कारण आपकी ही कल्पनाएँ | Dukh Ka Asli Karan Aapki Hi Kalpnayen पंडित श्रीराम शर्मा आचार्य

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 Gayatri Mantra Rules You Never Knew Existed! | गायत्री मंत्र जप के आवश्यक नियम शर्तें व अनुशासन |

Gayatri Mantra Rules You Never Knew Existed! | गायत्री मंत्र जप के आवश्यक नियम शर्तें व अनुशासन |

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गायत्रीतीर्थ शांतिकुंज, नित्य दर्शन

गायत्री माता
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गायत्री माता - अखंड दीपक
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चरण पादुका
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चरण पादुका
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सजल श्रद्धा - प्रखर प्रज्ञा (समाधि स्थल)
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प्रज्ञेश्वर महादेव - देव संस्कृति विश्वविद्यालय
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शिव मंदिर - शांतिकुंज
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हनुमान मंदिर - शांतिकुंज
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आज का सद्चिंतन (बोर्ड)

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आज का सद्वाक्य

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नित्य शांतिकुंज वीडियो दर्शन


!! शांतिकुंज दर्शन 19 October 2025 !! गायत्री तीर्थ शांतिकुञ्ज हरिद्वार !!

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अमृतवाणी:- मेरी आंखे या भगवान की आंखे पं श्रीराम शर्मा आचार्य जी

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परम् पूज्य गुरुदेव का अमृत संदेश



तू भगवान को देख सके।
मैं देखता हूँ कि भगवान का करंट आता है, तो मेरे प्रत्येक कण में भगवान आता है। आँखों में भगवान आता है, आँखों में भगवान आता है। मैं यह देखता हूँ अपने भीतर कि मेरे दिमाग में भगवान आता है। दिमाग इस तरह का है — इसकी चिंतन की दिशा और धाराएँ इस तरह की नहीं हैं जैसे कि दैत्यों की होनी चाहिए, राक्षसों की होनी चाहिए, स्वार्थियों की होनी चाहिए, घटिया आदमी की होनी चाहिए। ऐसा मेरा वचन बिल्कुल गायब हो जाता है।
ऐसा मालूम पड़ता है कि कोई कंप्यूटर पूरी तरीके से ऐसे मालिक के हाथ में चला गया है कि अपनी मनमर्जी से चला जाए। टाइपराइटर की मशीन जब टाइपिस्ट के हाथ में दे देते हैं, तो टाइपिस्ट जिस तरीके से चाहता है, उसको खटाखट सब छापता हुआ चला जाता है। और उसकी मर्जी है — चाहे वो गालियाँ छापे, चाहे वो अच्छा छापे — उसकी मर्जी है।
हम अपने टाइपराइटर को, कंप्यूटर को, हम भगवान के सुपुर्द कर देते हैं और ये कहते हैं — इसके अंदर जो भी विचार चलते हैं, इसके अंदर जो विचार करने की शक्तियाँ हैं, आप कृपा कीजिए, अपनी मर्जी के मुताबिक चलाइए। उपासना का मतलब यह होता है। उपासना का मतलब यह होता है। उपासना का मतलब पास बैठना होता है। पास बैठने का मतलब — पास बैठने का मतलब अपनी इच्छाओं को और अपनी महत्वाकांक्षाओं को भगवान के सुपुर्द कर देने का होता है। न कि — न कि भगवान को अपनी मर्जी के मुताबिक चलाने का।
भगवान को अपने को सुपुर्द कर देना — सुपुर्द कर देना नहीं होता।
और कोई लड़की, कोई लड़की ब्याह करे किसी पति से। और आप क्या ऐसी लड़की से ब्याह करना चाहेंगे जो यह कहे — "हम आपसे ब्याह करने को तैयार हैं।" अच्छा साहब, ठीक है, कह दिया उन्होंने। लेकिन आपको पूरी शर्तें माननी पड़ेंगी।
क्या करना पड़ेगा?
आपको हमारी मर्जी पे चलना पड़ेगा। क्या-क्या मर्जी पर चलें आपकी?
एक तो काम यह करना पड़ेगा कि हमारे रोज-रोज कपड़े आपको धोने पड़ेंगे। हमारे पेटीकोट से लेकर के सारे कपड़े, आपको रोज धोने पड़ेंगे। बोलिए, आप हमारी मर्जी पर चलेंगे कि नहीं?
एक काम।
दूसरा काम ये — आपको हमारे लिए सबेरे बेड टी बनाने से लेकर रात को खाना पकाने तक, हमारे लिए खाना, गरम-गरम भोजन बनाकर ही देना पड़ेगा।
बोलिए, आप शादी करने को तैयार हैं कि नहीं?
नहीं! इस पर तो विचार करेंगे।
विचार करेंगे — आपको हमारा कहना अलग मानना पड़ेगा। आप हमसे ब्याह तो कर लेंगे, पर कहना आप हमारा मानेंगे नहीं?
हमने तो मना कर दिया भाई — ऐसा रिश्ता मेरी आँखों में, यह विचार करता हूँ — जब भगवान का करंट आता है, तब मेरी आँखें मेरी नहीं हैं, बल्कि यह भगवान की आँखें हैं। भगवान की आँखों को जिस तरीके से देखना चाहिए — दुनिया के संबंध में, लड़कियों के संबंध में, अमुक के संबंध में, तमुक के संबंध में — मैं देखता हूँ। यह आँखें हमारी, भगवान की आँखें हैं। और यह गांधारी की आँखें हैं। और यह अर्जुन की आँखें हैं। और यह शिवाजी की आँखें हैं, जिन्होंने हमेशा दिव्य ही देखा, दिव्य ही देखा।
फिर हमको मालूम पड़ता है कि यह वो आँखें हैं जो भगवान ने अर्जुन के माथे में लगा दी थीं। यह हमारी वो आँखें हैं, जिसमें उसने कहा था भगवान ने — "दिव्यं ददामि ते चक्षुः।" मैं तेरे लिए दिव्य चक्षु देता हूँ जिससे भी हमको नहीं चाहिए।
नहीं साहब! हम तो यह समझते थे कि हमारी बहू आएगी, तो हमारे काम आएगी। कुछ हमारा काम करा देगी।
यह क्या आफत थी?
हमें क्या मालूम था कि ऐसी बहू आएगी जो उसी पर ही चलना पड़ेगा हमे?
हमको आपसे ब्याह नहीं करना है।

 

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अखण्ड-ज्योति से



प्रत्येक मनुष्य यह जानता है कि इस जगत में बिना हाथ हिलाये कुछ नहीं होता। एक तिनके के भी दो टुकड़े नहीं हो सकते। बहुत कम लोग ऐसे मिलेंगे जो स्वयं विचार करना जानते हों। वे दूसरों के विचारों के दास हैं। हमेशा दूसरों की सम्मति पर ही वे अपना जीवन व्यवहार चलाते हैं। उनको अपने ऊपर विश्वास नहीं। ऐसे लोग दुःख और विपत्ति के समय दूसरों की सहानुभूति, दया और करुणा की मार्ग प्रतीक्षा करते हैं। वे अपनी बुद्धि को और अपनी निजता को खो बैठे हैं। इस प्रकार के मनुष्य हमेशा अपने विचारों को बदलते रहते हैं और दुर्भाग्य का रोना रोते रहते हैं।

ऐसे मनुष्य सदा अपने भाग्य को दोष देते रहते हैं। उनके जीवन का उद्देश्य कभी पूरा नहीं हो सकता। जो दूसरों के सहारे पर निर्भर रहते हैं वे किसी बात का निश्चय नहीं कर सकते और कठिनता से किसी बात पर स्थिर रहते हैं, क्योंकि हमेशा दूसरों के विचारों के अनुसार ही कार्य करते हैं।

जब तक मनुष्य अपना स्वामी आप नहीं हो जाता तब तक उसके जीवन का संपूर्ण विकास नहीं हो सकता।

जीवन में उन्नति करने के लिए सबसे पहले इस बात को समझने की आवश्यकता है कि जीवन संग्राम में जो रुकावटें आती हैं उनको दूर हटा दें। संसार में ऐसे मनुष्यों की कमी नहीं जो दूसरों के विचारों के अनुसार काम करते हैं, जो दूसरों की आज्ञा का पालन करते हैं। इस प्रकार दूसरों का अनुकरण करने से मनुष्य अपनी मौलिकता से हाथ धो बैठते हैं। मनुष्य की उन्नति अपनी शक्तियों के विकास से होती है, न कि अंधानुकरण से।

*स्वयं विचार करने से ही मनुष्य में नए-नए विचार पैदा होते हैं और उसकी मानसिक शक्तियों का विकास भी होता है। ऐसे मनुष्य के द्वारा ही समाज का कल्याण हो सकता है।
तुम अपने भावी के सृष्टा हो। तुम अपने जीवन को उन्नत और पूर्ण बना सकते हो। दूसरे किसी की सत्ता तुम पर चल नहीं सकती। ब्रह्माण्ड में कोई ऐसी शक्ति नहीं जो तुम पर अधिकार कर सके।*

तुम्हारे भीतर ऐसी महान शक्ति छिपी हुई है कि इसका ज्ञान होने पर तुम दूसरों के आश्रित नहीं रह सकते। तुमको यह प्रतीत हो जाना चाहिए कि भाग्य तुम्हारे आधीन है और पुरुषार्थ से तुम अपने जीवन को श्रेष्ठतम बना सकते हो।

इस निश्चय को अधिक-अधिक पुष्ट करो और फिर इस निश्चय के अनुसार अपने जीवन को उच्च बनाने के लिए जीवन-संग्राम में कूद पड़ो। अपने जीवन रथ की बागडोर अपने हाथ में लेकर श्रद्धा से उत्साह से अपने उच्च उद्देश्य को लक्ष्य में रख कर अपने रथ को आगे बढ़ाते चलो और तुम अपनी परिस्थितियों पर अधिकार कर सकोगे।

 पं श्रीराम शर्मा आचार्य
 अखण्ड ज्योति 1945 जनवरी

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