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Tuesday 21, October 2025

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देवत्व केवल पूजा में नहीं, व्यवहार में है | Devatav Keval Pooja Mei Nhi Vyavhar Mei Hai पंडित श्रीराम शर्मा आचार्य

देवत्व केवल पूजा में नहीं, व्यवहार में है | Devatav Keval Pooja Mei Nhi Vyavhar Mei Hai पंडित श्रीराम शर्मा आचार्य

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हमारा चिन्तन कैसा हो | Hamara Chintan Kesa Ho | Dr Chinmay Pandya

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गायत्रीतीर्थ शांतिकुंज, नित्य दर्शन

गायत्री माता
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गायत्री माता - अखंड दीपक
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चरण पादुका
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चरण पादुका
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सजल श्रद्धा - प्रखर प्रज्ञा (समाधि स्थल)
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प्रज्ञेश्वर महादेव - देव संस्कृति विश्वविद्यालय
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शिव मंदिर - शांतिकुंज
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हनुमान मंदिर - शांतिकुंज
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आज का सद्चिंतन (बोर्ड)

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आज का सद्वाक्य

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नित्य शांतिकुंज वीडियो दर्शन


!! शांतिकुंज दर्शन 21 October 2025 !! गायत्री तीर्थ शांतिकुञ्ज हरिद्वार !!

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अमृतवाणी:- क्या भजन करने से सब कुछ ठीक हो जाता है पं श्रीराम शर्मा आचार्य जी

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परम् पूज्य गुरुदेव का अमृत संदेश



भगवान और भक्त का ब्याह होता है। ब्याह में शर्त यह है — भक्त की मर्जी के मुताबिक भगवान को चलना चाहिए, भक्त की मर्जी पूरी करनी चाहिए, भक्त की कामना पूरी करनी चाहिए।
है शर्म, लिहाज? आप वो बनते हैं, भक्त बनते हैं या बॉस बनते हैं?
बॉस बनेंगे न?
हम आपके बॉस बनते हैं? यह क्या बना रखा है आपने?
भगत, भगत, भगत, भगत... भगत बनता है तू? भगत बन! तू आइंदा भगत का नाम मत लेना।
आप कह रहे हैं — हम आपके बॉस बनना चाहते हैं। हनुमान जी से कहना, "स्वामी जी, हम आपके बॉस बनना चाहते हैं। हम आपको मिठाई खिला सकते हैं।" बोलिए, आपको हुकुम मानना मंजूर है कि नहीं?
फिर आपका हनुमान यही कहेगा न — "रामचंद्र जी से तो मत मानना।"
मित्रों, इस तरीके से मनःस्थिति उपासक की होनी चाहिए। उपासक की मनःस्थिति का स्वरूप क्या होना चाहिए — यह मैं बताता हूँ आपको। और ऐसी भक्ति आप करेंगे तो मैं आपको विश्वास दिलाता हूँ कि आपकी उपासना सार्थक होती चली जाएगी। आपकी उपासना सार्थक होती चली जाएगी।
आपको क्या करना चाहिए? क्या करना चाहिए आपको?
मैं सबेरे ध्यान कराता हूँ, और मैं आपको भक्ति के मौलिक सिद्धांत बताता हूँ।
भक्ति के मौलिक सिद्धांत हैं — समर्पण, विसर्जन, विलय, समन्वय, समापन, शरणागति।
इसका अर्थ — इसका अर्थ यह है: भगवान की प्रेरणाएँ, भगवान की इच्छाएँ, भगवान की विचारधाराएँ — वो हमारे लिए मार्गदर्शक होनी चाहिए। मार्गदर्शक होनी चाहिए।
और हमको उस रास्ते पर चलना चाहिए, जिस रास्ते पर चलने के लिए भगवान ने हमको बहुमूल्य जिंदगी दी। उस रास्ते पर चलने की तैयारी कीजिए।
आपको जहाँ से क, ख, ग, घ — न... काहे का भक्ति का?
भजन पीछे करना। भजन बाद में करना। भजन को रोको। भजन को फेंक! जल्दी मत करो भजन।
भजन करने से पहले उसके सिद्धांत समझ। सिद्धांत तेरी समझ में आ जाए, फिलॉसफी तेरी समझ में आ जाए — तब करना।
समझ में न आ जाए तो बेटे, बेकार मत समय खराब कर। इससे अच्छा तू रेडियो सुना कर।
भजन करने से — क्योंकि गाली भी नहीं देगा भगवान को।
अभी तो तू भजन करेगा, ग्यारह माला जप करेगा। बैठ, काहे लिए बाबूजी?
"यह मनोकामना पूरी नहीं की हमारी, यह भी नहीं की, और हमारी यह भी नहीं की। और हमारा यह भी बीमा नहीं लिया गुरूजी।"
जो कोई भजन करता है, भजन करता है, वो फिर बीमार तो नहीं होता? वो गरीबी तो नहीं आती?
बेटे, तुझे मालूम नहीं है — भगवान जब लेता है, तो सारा कचूमर निकाल लेता है भक्तों का। भक्तों का!
कोई कहता है — बीमा नहीं मिलता?
बीमा मिलता है?
मैं कहता हूँ — कचूमर निकाल लेता है।
जो कुछ भी चीजें हैं, वो सब की सब अपने हवाले करता है। रख हमारे पास, रख हमारे पास।
जमीन कहती है — "बीज रख हमारे पास में।" क्या है तेरे पास?
"नहीं महाराज जी, वो तो संपत्ति देती रहती है। लक्ष्मी आती है।"
हाँ, देती तो है। पर देती तो है बाद में। पहले रखवा लेती है।
जमीन देती है? हाँ, जमीन देती है। पर देने की शर्त यह है कि — जो कुछ है, हमारे हवाले कर।
बीज को पहले गला देती है। और मिटा देती है। और खत्म कर देती है।
मिटा देने और खत्म करने के बाद में फिर देना शुरू करती है जमीन। फिर ज़रा सी बीज को बना देती है — अंकुर। अंकुर को बना देती है — पौधा। पौधे को बना देती है — पेड़। और पेड़ के बाद में बना देती है।
पर पहली शर्त यह है — पहले खर्च करना पड़ता है।

 

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अखण्ड-ज्योति से



यदि तुम अनुभव करते हो कि मैं जीवित हूँ, जवान हूँ और क्रियाशील हूँ तो उठो जीवित मनुष्यों की जिन्दगी जीने का प्रयत्न करो। निर्दोष, सर्वांगपूर्ण, आनन्दमय और उन्नतिशील जीवन पसन्द करो। जीवित प्राणियों की स्वाभाविक इच्छा मजबूत बनने की, महान बनने की और सुखी बनने की होती है, तुम्हें भी ऐसी ही आकाँक्षाओं से भरा पूरा होना चाहिए।

उठो, अपने चारों ओर नव जीवन के बीज बोओ। पवित्रता का वातावरण निर्माण करो। यदि तुम दूसरों को धोखा दोगे, झूठ बोलोगे, षड़यंत्र रचोगे, तो इससे अपने आप को ही पतित बनाओगे, अपने को ही छोटा, तुच्छ और कमीना साबित करोगे। किसी दूसरे का अपनी सारी शक्तियाँ लगाकर भी तुम अधिक अनिष्ट नहीं कर सकते परन्तु इन हरकतों से अपना सर्वनाश जरूर कर सकते हो।

ईमानदारी पर कायम रहो और उचित साधनों से अपनी उन्नति के लिए प्रयत्न करो। अपनी ताकत को संसार के सामने प्रकट करो क्योंकि बलवानों को ही सुखी और उन्नतिशील जीवन जीने का अधिकार है। यदि अपनी शक्ति का कोई सबूत पेश नहीं कर सकोगे तो दुनिया तुम्हें एक असहाय, अनाथ, दुर्बल और अभागा समझेगी और तुम्हारे नाम के साथ ‘बेचारा’ की उपाधि जोड़ देगी।

इसलिए मैं कहता हूँ कि-संघर्ष करो! जीवित रहने के लिए संघर्ष करो!! अपने अधिकारों को प्राप्त करने और उनकी रक्षा के लिए संघर्ष करो!!! विश्वास रखो इस आत्मोन्नति के धर्मयुद्ध में तुम्हें वह आनंद मिलेगा, जो दुनिया की और किसी चीज से नहीं मिल सकता। जीवितों की भाँति जीवित रहने के चन्द घंटे, मुर्दा जिन्दगी के हजार वर्षों से बेहतर है।

अखण्ड ज्योति 1945 जनवरी

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