Sunday 22, June 2025
निरोग रहने के स्वर्ण सूत्र | Nirog Rehne Ke Swarn Sutra | पं श्रीराम शर्मा आचार्य जी
अन्नमय कोश की सरल साधना पद्धति भाग-2 | गायत्री की पंचकोशी साधना एवं उपलब्धियां | वांग्मय No 13 पृष्ठ ४.९९ Annamay Kosh Ki Saral Sadhana Padhdhati | Vangmay No 13 Page 4.19
तृष्णा नष्ट होने के साथ ही विपत्तियाँ भी नष्ट होती हैं। जितनी अधिक तृष्णा उतनी ही बड़ी आपत्ति गुरुदेव पं श्रीराम शर्मा आचार्य जी
इटली की राजधानी रोम में भारत की गौरवपूर्ण प्रस्तुति |
खाली मस्तिष्क शैतान की दुकान की कहावत सोलह आने सच है। जो फालतू बैठा रहेगा, उसके मस्तिष्क में अनावश्यक और अवांछनीय बातें घूमती रहेंगी और कुछ न कुछ अनुचित, अनुपयुक्त करने तथा उद्विग्न, संत्रस्त रहने की विपत्तियाँ मोल लेगा।
आत्मा को देखें, खोजें और समझें | Aatma Ko Dekhen Khojen Aur Samajhe
साधना से सिद्धि में आसन व दिशा का भी महत्त्व | Aasan Evam Disha Ka Bhi Mahatva | Guru Gita
अमृत सन्देश:- ईश्वर की कृपा कैसे मिलती है ? Ehswar Ki Kripa Kaise Milti Hai पंडित श्रीराम शर्मा आचार्य
गायत्रीतीर्थ शांतिकुंज, नित्य दर्शन
आज का सद्चिंतन (बोर्ड)
आज का सद्वाक्य
नित्य शांतिकुंज वीडियो दर्शन
!! महाकाल महादेव मंदिर Mahadev_Mandir गायत्री तीर्थ शांतिकुञ्ज हरिद्वार 22 June 2025
!! गायत्री माता मंदिर Gayatri Mata Mandir गायत्री तीर्थ शांतिकुञ्ज हरिद्वार 22 June 2025
!! सप्त ऋषि मंदिर गायत्री तीर्थ शांतिकुञ्ज हरिद्वार 22 June 2025
!! परम पूज्य गुरुदेव का कक्ष 22 June 2025 गायत्री तीर्थ शांतिकुञ्ज हरिद्वार !!
!! अखण्ड दीपक Akhand_Deepak (1926 से प्रज्ज्वलित) चरण पादुका गायत्री तीर्थ शांतिकुञ्ज हरिद्वार 22 June 2025
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!! शांतिकुंज दर्शन 22 June 2025 !! गायत्री तीर्थ शांतिकुञ्ज हरिद्वार !!
!! प्रज्ञेश्वर महादेव मंदिर Prageshwar Mahadev 22 June 2025
अमृतवाणी: तपस्वी परंपरा की पुनर्प्रतिष्ठा पं श्रीराम शर्मा आचार्य जी
परम् पूज्य गुरुदेव का अमृत संदेश
महर्षि रमण का आपने नाम सुना है? अच्छा महर्षि रमण क्या थे? बताइए, वह मौन रहते थे और मौन रहकर के भी ऐसा एक तप कर रहे थे जिससे कि हिंदुस्तान की आजादी का काम पूरा हो जाए। केवल राजेंद्र बाबू हिंदुस्तान के जो बनाए गए थे राष्ट्रपति, तो वह उनको गांधी जी ने सलाह दी थी। अच्छा तुम्हारे ऊपर बड़ा जिम्मेदारी का काम है, अब जाकर के तुम रमण से, मेरा आशीर्वाद लेकर के आओ। तब राजेंद्र बाबू उनका आशीर्वाद लेने गए थे।
पूरी ताकत थी उनकी, तमाम ताकत थी। बहुत ताकत थी। आइंस्टीन का नाम आपने सुना है? आइंस्टीन वह जिन्होंने कि एटम ऍनर्जी की खोज की थी। उनका भी ऐसे ही था, वह भी अकेले रहते थे। उनके पास कोई नहीं जा सकता था। उनके यहां उनसे किसी को मिलना हो तो विजिटिंग कार्ड तो भेजे जा सकते थे, उसमें लेटर बॉक्स में पड़े रहते थे।
पर उनके चिंतन में कोई दखल नहीं देता था, कोई हस्तक्षेप नहीं करता था। वह जब अपने चिंतन में लगे रहते थे तो लगे ही रहते थे। चाहे दुनिया का कोई बड़े से बड़ा आदमी आए, वह किसी के लिए अपना काम हर्ज नहीं करते थे। फिर जब उनको टाइम फुर्सत होती थी, तो वह नौकरों को बुलाते थे, सामान मंगाते थे, खाने-पीने की चीजें मंगाते थे, मिलने जुलने की बात करते थे।
यह उनकी इच्छा के ऊपर था। लेकिन कोई अपनी इच्छा से उनको हिला नहीं सकता था। वह अपनी इच्छा से चाहे सो करते थे। यह किसकी बात कह रहे हैं? यह आइंस्टीन की बात कह रहे हैं। हमारे ऋषियों का भी ऐसे ही था। वह भी गुफाओं में रहते थे, बड़े-बड़े काम करते थे, बड़े शानदार काम करते थे।
और वह गुफाओं में रहते थे क्यों साहब? गुफाओं में क्या था? गुफाओं में मिठाइयां थी वहां तो सिनेमा होता था? गुफाओं में क्या होता था? गुफाओं में क्या होता था? कुछ नहीं होता था। अकेले बैठे रहते थे, अकेले में उनके काम में कोई हस्तक्षेप न करने पाए, कोई उनके काम में विघ्न न डालने पाए, इसलिए वह गुफाओं में बैठे रहते थे।
और वही बैठ कर के शोध कार्य करते थे, तपस्या का काम करते थे, शक्ति उपार्जन का काम करते थे। ठीक उसी परंपरा को फिर से हमें नए ढंग से काम को लाने के लिए फिर अपना काम शुरू कर दिया है। अब हमारा जो काम है, अब आप समझिए कि इसी तरीके से, इससे मिलता-जुलता काम है। मिलता जुलता काम है और हमें इस काम को करने के लिए अब संलग्न हो गए हैं।
संलग्न हो गए हैं और बराबर उस काम को करते हुए चले जाएंगे। चले जाएंगे। इतना जो समय है, बाकी का बचा हुआ समय, बड़ी जिम्मेदारी का समय है, बड़ा महत्व का समय है।
अखण्ड-ज्योति से
जब हम किसी वस्तु की पूरी-पूरी कीमत चुका देते हैं तभी हम उसके पूर्णतया स्वामी होते हैं। उसी तरह जब हमें किसी वस्तु को प्राप्त करने की पूर्ण योग्यता होती है। तभी वह वस्तु हमारे और हमारे अनुगामियों के पास बहुत समय तक टिकती है। ऐसी सफलता को ही हम स्थायी सफलता कह सकते हैं।
संसार के पदार्थों की प्राप्ति के लिए हमें उनके अनुरूप ही पुरुषार्थ प्रकट करना पड़ता है और यह पुरुषार्थ ही हमारी सफलता को स्थिर बनाता है। मान लीजिए किसी परतंत्र राष्ट्र को स्वतन्त्र होना है तो उसे इस कार्य के लिए अपनी अन्तः शक्ति को संगठित करना पड़ेगा, उसे अपनी कमजोरियों को दूर करना पड़ेगा। किन्तु यदि उसे स्वतंत्रता प्राप्ति का यह राजमार्ग स्वीकार न हो और वह बाह्य शक्तियों की सहायता से उसे प्राप्त करना चाहे तो हम कहेंगे कि उस राष्ट्र की वह स्वतंत्रता स्थिर न रहेगी और उस राष्ट्र के पुनः परतंत्र हो जाने की सम्भावना बनी रहेगी।
मनुष्य की उद्देश्य-सिद्धि उसकी कार्य-शक्ति पर निर्भर है। उद्देश्य-सिद्धि उसके जीवन का प्रधान लक्ष्य है किन्तु उसके लिए वह अपनी कार्य-शक्ति का किस तरह प्रयोग करता है वह भी कम महत्वपूर्ण नहीं है। उद्देश्य सिद्धि तब ही स्थायी होगी जब कि उसकी कार्य-शक्ति का उचित प्रयोग होगा। साध्य हमें तब ही सुखदायी हो सकता है जब कि साधन भी न्यायसंगत हो। “येन केन प्रकारेण प्रसिद्धो पुरुषो भवेत्” वाली नीति यहाँ कभी स्थायी सफलता न देगी।
... समाप्त
अखण्ड ज्योति 1995 अगस्त पृष्ठ 31
पं श्रीराम शर्मा आचार्य
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