Saturday 23, August 2025
संकट के क्षण | Sankat Ke Kshn | Dr. Pranav Pandya जीवन पथ के प्रदीप
उपवास के प्रकार | Upvas Ke Prakar | Gayatri Ki Panch Koshi Sadhna
सीता गायत्री | Sita Gayatri | Vivah Pancham Special Mantra, पवित्रता, मधुरता, सात्विकता शील, नम्रता।
अमृत सन्देश:- गायत्री मंत्र के तीन चरण | Gayatri Mantra Ke Teen Charan
गायत्रीतीर्थ शांतिकुंज, नित्य दर्शन
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!! शांतिकुंज दर्शन 23 August 2025 !! गायत्री तीर्थ शांतिकुञ्ज हरिद्वार !!
जीवन को सार्थक कैसे बनाएं ? | Jivan Ko Sarthak kaise Banaye
परम् पूज्य गुरुदेव का अमृत संदेश
जीवन की सार्थकता के लिए, हमको अपना आदर्श चरित्र बनाने के लिए, लोगों के सामने अपना नमूना पेश करने के लिए क्या करना चाहिए? और समाज को सुखी और समुन्नत बनाने के लिए क्या करना चाहिए? यह आपको इसका प्लानिंग करना चाहिए, और उसके लिए योजना बनानी चाहिए—और उसका श्रम का उपयोग कैसे करेंगे, समय का उपयोग कैसे करेंगे। कैसे करेंगे आप? इस तरीके से बंटवारा बनाकर के ले जाना—और आप यहां से आगे जाकर ईमानदार आदमी की तरीके से जीना।
क्योंकि आपको लोगों के सामने नमूना पेश करना है। नए युग के लिए आपको ढेरों के ढेरों सामान की जरूरत होगी, ढेरों के ढेरों अक्ल चाहिए, ढेरों के ढेरों समय चाहिए। बिगाड़ने के लिए कितना सामान चाहिए, तो बनाने के लिए कितना सामान चाहिए! बनाने के लिए ढेरों सामान चाहिए। बिगाड़ने में तो थोड़ी सी चाहिए।
हमने दुनिया को बिगाड़ा है और हम बिगाड़ रहे हैं। बिगाड़ने के लिए जितनी अक्ल, सिनेमा हमने खोला है, और सिनेमा की वजह से कितना पैसा हमने लगाया है—अक्ल लगाई है, कितने आदमी होशियार इकट्ठे किए हैं, नट इकट्ठे किए हैं, गायन करने वाले इकट्ठे किए हैं, कलाकार इकट्ठे किए हैं। तब इतनी मेहनत करने के बाद, हमने अपने इन बच्चे और बच्चियों को हिप्पी बनना सिखाया है।
हमारा बेटा, जो हिप्पी हो गया है, बाल रखाए फिरता है इधर से उधर। और इसके बारे में पता ही नहीं चलता कि यह लड़का है या लड़की है। पता ही नहीं चलता! बेटे, यह आफत जो पैदा की है, हमने बड़ी मेहनत से की है। अपने सिनेमा बनाया, और लड़के‑लड़कियों के दिमागों में यह खुराफ़ातें पैदा की — कि जिनका शौर्य था, जिनका साहस था, जिनका पराक्रम, जिनका तेज था — सब गायब हो गया।
और जनानियों की तरह, जन‑खो के तरीके से ये मालूम पड़ता है कि यह लड़का है या लड़की है — न सामने कोई तेज है चेहरे पर, वही बनावट, वही श्रृंगार। रंडियां जिस तरीके से श्रृंगार करती हैं, रहती हैं—सारे दिन बालों के श्रृंगार। यह पीढ़ी हमने दी है, बेटे। यह पीढ़ी देने की हमारी जिम्मेदारी है। हमने ढेरों पैसा खर्च किया है और करोड़ों रुपए की संपत्ति लगाई है। तब हमने अपनी इन पीढ़ियों को खराब किया है।
पीढ़ियों को खराब किया, और बनाने के लिए बहुत चाहिए — बहुत चाहिए, बहुत सी अक्ल चाहिए, बहुत सारा धन चाहिए। यह कहां से आएगा? जनसाधारण के जीवन से निकल कर आएगा। एक आदमी का काम नहीं है। यह बिल्डर सेठ का काम नहीं है, और यह टाटा का काम नहीं है, और यह किसी अमीर आदमी का काम नहीं है। यह जनसाधारण का काम है।
हर आदमी अपनी जिंदगी में ऐसे एक हिस्से—जिसको मैं अंशदान कहता हूं—हर आदमी को अपना हिस्सा देना पड़ेगा, और अपना हक और अपना पाठ अदा करना पड़ेगा। इसके लिए आपको आगे‑आगे आना चाहिए। आपको आगे आना चाहिए क्योंकि आप मार्गदर्शक हैं, क्योंकि आप नेता हैं, क्योंकि आप समाज को आगे बढ़ाने के लिए चल रहे हैं, क्योंकि आप समाज को दिशा देने के लिए चल रहे हैं। इसलिए क्या करना है? लोगों को यह व्यवहारिक रूप से करके दिखाना—आपका काम है।
अखण्ड-ज्योति से
ईसा को अपराधी ठहराया और शूली पर लटकाया गया। सुकरात को जहर का प्याला पीना पड़ा। दयानन्द को विष दिया गया। गाँधी को गोली से उड़ाया गया। व्याध ने कृष्ण के प्राण हरण किये। गुरु गोविंद सिंह के अबोध बालकों को जल्लादों के सुपुर्द किया गया। मीरा निर्दोष होते हुए भी उत्पीड़न सहती रहीं। जहाँ तक अपराधों, आक्रमणों और प्रताड़नाओं का सम्बन्ध हैं वहाँ तक जो जितना उच्चस्तरीय आत्मवेत्ता हुआ है उसे उतना ही अधिक भार सहन करना पड़ा है।
भगवान बुद्ध की जीवन गाथा पढ़ने से पता चलता है कि पुरातन पंथी और ईर्ष्यालु उनके प्राणघाती शत्रु बने हुए थे। उन्होंने अंगुलिमाल को आक्रमण के लिए उकसाया था। चरित्र हनन के लिए ढेरों दुरभिसंधियाँ रची थी। समर्थकों में अश्रद्धा उत्पन्न करने के लिए जो षड़यन्त्र रचे जा सकते थे उसमें कुछ कसर नहीं छोड़ी गई थी। गाँधी को विरोध होता रहा। उन पर पैसा बटोरने और हड़पने का लांछन लगाने वालों की संख्या आरम्भ में तो अत्यधिक थी, प्रताप बढ़ने के बाद ही वह घटने लगी थी। अन्ततः उन्हें गोली से ही उड़ा दिया गया। मध्यकाल में सन्तों में से प्रायः प्रत्येक को शत्रुओं की प्रताड़नाएं सहनी पड़ी हैं। आद्य शंकराचार्य, चैतन्य महाप्रभु, नामदेव, एकनाथ, तुकाराम, ज्ञानेश्वर, रामदास, गुरु गोविंदसिंह, बन्दा वैरागी आदि इसके जी-जागते प्रमाण हैं।
संसार के सुधारकों में प्रत्येक को प्रायः ऐसे ही आक्रमण न्यूनाधिक मात्रा में सहने पड़े है। संगठित अभियानों को नष्ट करने के लिए कार्यकर्त्ताओं में फूट डालने, बदनाम करने, बल प्रयोग से आतंकित करने, जैसे प्रयत्न सर्वत्र हुए है। ऐसा क्यों होता है यह विचारणीय हैं। सुधारक पक्ष को अवरोधों का सामना करने पर उनकी हिम्मत टूट जाने, साधनों के अभाव से प्रगति क्रम शिथिल या समाप्त हो जाने जैसे प्रत्यक्ष खतरे तो हैं, किन्तु परोक्ष रूप से इसके लाभ भी बहुत हैं।
व्यक्ति की श्रद्धा एवं निष्ठा कितनी सच्ची और कितनी ऊँची हैं इसका पता इसी कसौटी पर कसने से लगता हैं कि आदर्शों का निर्वाह कितनी कठिनाई सहन करने तक किया जाता रहा। अग्नि तपाये जाने और कसौटी पर कसे जाने से कम में, सोने के खरे-खोटे होने का पता चलता ही नहीं। आदर्शों के लिए बलिदान से ही महा-मानवों की अन्तःश्रद्धा परखी जाती है और उसी अनुपात से उनकी प्रामाणिकता को लोक-मान्यता मिलती हैं। जिसे कोई कठिनाई नहीं सहनी पड़ी ऐसे सस्ते नेता सादा सन्देह और आशंका का विषय बने रहते हैं। श्रद्धा और सहायता किसी पर कभी पर तभी बरसती हैं जब वह अपनी निष्ठा का प्रभाव प्रतिकूलताओं से टकरा कर प्रस्तुत करता हैं।
.... क्रमशः जारी
पं श्रीराम शर्मा आचार्य
अखण्ड ज्योति अगस्त 1979 पृष्ठ 53
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