Sunday 24, August 2025
भाव के भूखे है भगवान | Bhav Ke Bhuke Hai Bhagwan Pragya Puran Story | #shots #Motivational #story
Fourth and final pilgrimage to the Himalayas Part 01 | My Life its & Legacy Message
किन लोगों को वानप्रस्थ क्षेत्र में प्रवेश नहीं करना चाहिए? | समस्या का समाधान ऋषि चिंतन से
प्राणी से नहीं उसके दुष्कर्मों से शत्रुता रखो। श्रीराम शर्मा आचार्य जी
आत्मदेव की उपासना | Aatmadev Ki Upasna | ऋषि चिंतन के सानिध्य में
Ep:-11 आओ गुरु को करें हम नमन | Aao Guru Ko Karen Hum Naman | Guru Gita, Rishi Chintan
उपासना का एक क्रिया पक्ष | Upasana Ka Ek Kriyatmak Paksh
गायत्रीतीर्थ शांतिकुंज, नित्य दर्शन
आज का सद्चिंतन (बोर्ड)
आज का सद्वाक्य
नित्य शांतिकुंज वीडियो दर्शन
!! प्रज्ञेश्वर महादेव मंदिर #Prageshwar_Mahadev 24 August 2025 !!
!! महाकाल महादेव मंदिर शांतिकुञ्ज हरिद्वार 24 August 2025 !!
!! सप्त ऋषि मंदिर गायत्री तीर्थ शांतिकुञ्ज हरिद्वार 24 August 2025 !!
!! शांतिकुंज दर्शन 24 August 2025 !! गायत्री तीर्थ शांतिकुञ्ज हरिद्वार !!
!! #गायत्री_माता_मंदिर #Gayatri_Mata_Mandir गायत्री तीर्थ शांतिकुञ्ज हरिद्वार 24 August 2025 !!
नए युग का निर्माण कैसे होगा | Naye Yug ka Nirman Kaise Hoga
!! देवात्मा हिमालय मंदिर Devatma Himalaya Mandir गायत्री तीर्थ शांतिकुञ्ज हरिद्वार 24 August 2025 !!
!! अखण्ड दीपक #Akhand_Deepak (1926 से प्रज्ज्वलित) चरण पादुका गायत्री तीर्थ शांतिकुञ्ज हरिद्वार 24 August 2025 !!
!! परम पूज्य गुरुदेव का कक्ष गायत्री तीर्थ शांतिकुञ्ज हरिद्वार 24 August 2025 !!
परम् पूज्य गुरुदेव का अमृत संदेश
हर आदमी अपनी जिंदगी में ऐसे एक हिस्सा, जिसको मैं अंशदान कहता हूं, हर आदमी को अपना हिस्सा देना पड़ेगा, और अपना हक और अपना अपना पाठ अदा करना पड़ेगा। इसके लिए आपको आगे-आगे आना चाहिए। आपको आगे-आगे आना चाहिए क्योंकि आप मार्गदर्शक हैं, क्योंकि आप नेता हैं, क्योंकि आप समाज को आगे बढ़ाने के लिए चल रहे हैं, क्योंकि आप समाज को दिशा देने के लिए चल रहे हैं। इसलिए क्या करना है, लोगों को यह व्यवहारिक रूप से करके दिखाना आपका काम है।
शिक्षण नहीं, शिक्षण नहीं, नमूना पेश करना पड़ेगा। शिक्षण से नहीं चलेगा। हम व्याख्यान देंगे बेटे, व्याख्यान से कोई काम नहीं चलेगा। हम कथा कहेंगे, कथा से बेटे कोई काम नहीं चलेगा। कथा से क्या काम चलेगा? कथा से कोई काम नहीं चलेगा। जो काम चलेगा वह आपकी कथा सार्थक तब होगी, जब आप अपनी जिंदगी का नमूना पेश करते हुए क्रिया और विचारों का समन्वय पेश करेंगे, तो आपकी कथा का कोई असर पड़ेगा। अगर आपकी क्रिया और विचारों का समन्वय नहीं है, तो बेटे, मैं यह कहता हूं, कोई असर आपका नहीं पड़ेगा।
वैश्या का असर होता है लोगों के ऊपर। वैश्या अपनी जिंदगी में सौ भड़ुवे पैदा कर देती है, क्योंकि उसके विचार और कर्म एक हैं। जो उसके दिमाग में दुराचार की और व्यभिचार की वृत्ति है, वही उसके शरीर में भी है। शरीर से और मन से वो एक है। एक होने से आदमी में ताकत पैदा होती है, कुव्वत पैदा होती है, और वेश्या अपने ढांचे में सैकड़ों आदमियों को ढाल ले जाती है। शराबी अपने ढांचे में ढेरों को ढाल लेते हैं। जुआँरी अपने ढांचे में ढेरों को ढाल लेते हैं। ये लोग ढाल लेते हैं, लेकिन हम, हम किसी को नहीं ढाल पाए।
कथा तो हमने बहुत सारी कही। कहीं भागवत की कथा कही, कहीं रामायण की कथा कही, कहीं अमुक की कथा कही, और हमारी कथा की वजह से कोई भी न हनुमान पैदा हो सका, न अर्जुन पैदा हो सका, न तुलसीदास पैदा हो सके, न सूरदास पैदा हो सके। कोई पैदा न हो सका। हमारी कथा कैसी निकम्मी — न उसमें कोई जान है, न कोई उसमें जीवन है, न उसमें कोई प्रकाश है, न कोई उसमें प्रेरणा है। जीव की लप-लप, लप-लप, लप-लप, लप-लप, बेकार की लप-लप, लप-लप हम करते रहते हैं सिद्धांतों की दुहाई, आदर्शों की दुहाई।
तेरी जिंदगी क्या है, ये बता। भगवान की भक्ति तेरी जिंदगी में कैसे है? अपनी जिंदगी में भगवान की भक्ति को उतार करके दिखा। हम, हम चलेंगे तेरे पीछे। गांधी जी ने अपनी जिंदगी में एक सत्याग्रही का जीवन जी करके दिखाया। लोगों ने कहा, "चलिए, हम भी चलेंगे आपके पीछे-पीछे।" भगवान बुद्ध ने एक त्यागी का, सन्यासी का जीवन जिया और दिखाया कि हमारे भीतर और बाहर हम एक हैं। ढेरों के ढेरों आदमी चले पीछे-पीछे।
आपके पीछे क्यों नहीं चलेंगे? जरूर चलेंगे। क्योंकि जब आप नया युग के नया प्रकाश देने वाले चले हैं, तो बेटे, आपको बात यहां से करनी पड़ेगी कि नया युग बनाने के लिए, नए युग के निर्माण के लिए जो समय की जरूरत पड़ेगी, अकल की जरूरत पड़ेगी, पैसे की जरूरत पड़ेगी — वो कहां से लाएंगे हम, बताइए। हम कहां से करेंगे चंदा? किसके ऊपर दबाव डालेंगे? किसके ऊपर प्रेस करेंगे? कहां से हम प्रेस करेंगे? कौन देगा फिर? कब तक देगा? किसको?
मांगने से? मांगने से नहीं। स्वेच्छा से, स्वेच्छा से, स्वेच्छा से, स्वेच्छा से जो अनुदान उत्पन्न होंगे, नया युग उसी से आरंभ होगा। और उसी के आधार पर आगे बढ़ना संभव होगा।
अखण्ड-ज्योति से
दुरभिसंधियों के रचने वाले हर सफलता के बाद साहस के साथ अपने दुष्कर्मों को निर्द्वंद्व होकर बढ़ाते है। निष्ठावानों से टकराने पर उनके दाँत खट्टे होते है। आक्रमण महंगा पड़ता है और भविष्य के लिए उनकी हिम्मत टूट जाती हैं। लोक तिरस्कार के कारण वे मुँह दिखाने लायक नहीं रहते।
यह उदाहरण दूसरों के सामने भी प्रस्तुत होता हैं और श्रेष्ठता से अकारण टकराने का प्रतिफल क्या होता हैं इसका पता न केवल आततायियों को वरन् उस वर्ग के अन्य लोगों का साहस तोड़ने के लिए भी पर्याप्त होता हैं। अपयश और तिरस्कार का दण्ड जेल फाँसी से भी महंगा पड़ता है। ऐसी स्थिति श्रेष्ठ व्यक्तियों या आन्दोलनों से ही टकराने पर बनती हैं। सामान्य लोगों के बीच तो आक्रमण प्रत्याक्रमण के क्रम आये दिन चलते ही रहते हैं।
अन्ध श्रद्धाओं का समर्थन भी जोखिम भरा हैं। किसी के साथ अनगढ़ अधकचरे, अपरिपक्वों की मण्डली हो तो वह उसे जन-शक्ति समझने की भूल करता रहता है। किसकी श्रद्धा एवं आत्मीयता कितनी गहरी है, इसका पता चलाने का एक मापदण्ड यह भी हैं कि अफवाहों या आरोपों पर तो विश्वास कर लिया जाय, किन्तु सदाशयता पक्षधर अनेकानेक घटनाओं का क्षण भर में भुला दिया जाय। जो अफवाहों की फूँक से उड़ सकते हैं वे वस्तुतः बहुत ही हलके और उथले होते है। ऐसे लोगों का साथ किसी बड़े ही प्रयोजन के लिए कभी कारगर सिद्ध नहीं हो सकता। उन्हें कभी भी, कोई भी, कुछ भी कहकर विचलित कर सकता है। ऐसे विवेकहीन लोगों की छँटनी कर देने के लिए कुचक्रियों द्वारा लगाये गये आरोप या आक्रमण बहुत ही उपयोगी सिद्ध होते है।
योद्धाओं की मण्डली में शूरवीरों का स्तर ही काम आता है, शंकालु, अविश्वास, कायर प्रकृति के सैनिकों की संख्या भी पराजय का एक बड़ा कारण होती हैं। ऐसे मूढ़मतियों को अनाज में से भूसा अलगकर देने की तरह यह आक्रमणकारिता बहुत ही सहायक सिद्धा होती हैं। दूरभिसंधियां के प्रति जन-आक्रोश उभरने से सहयोगियों का समर्थन और भी अधिक बढ़ जाता हैं उस उभार से सुधारात्मक आन्दोलनों का पक्ष सबल ही होता है।
कुसमय पर ही अपने पराये की परीक्षा होती हैं। इस कार्य को आततायी जितनी अच्छी तरह सम्पन्न करते हैं उतना कोई और नहीं। अस्थिर मति और प्रकृति के साथियों से पीछा छूट जाना और विवेकवानों का समर्थन सहयोग बढ़ना जिन प्रतिरोधों के कारण सम्भव होता हैं वह आक्रमणों को उत्तेजना उत्पन्न हुए सम्भव ही नहीं होता।
.... क्रमशः जारी
पं श्रीराम शर्मा आचार्य
अखण्ड ज्योति अगस्त 1979 पृष्ठ 54
| Newer Post | Home | Older Post |
