Monday 25, August 2025
लगन | Lagan | Pt Shriram Sharma Acharya | Motivational Short Story
न किसी को कैद करें न कैदी बनें | Na kisi ko kaid kare na kaidi bane
ईश्वरीय शक्तियों में गायत्री की महत्ता | Eshwariya Shaktiyon Mei Gayatri Ki Mehtatta
तुम्हारे पद्म चरणों में, नमन सौ बार है गुरुवर।
अमृतवाणी:- भगवान भीतर है, बाहर नहीं : आत्म परिष्कार - भाग 3 | पं श्रीराम शर्मा आचार्य जी
इस अखिल ब्रह्माण्ड में, बिखरे पड़े हैं प्राण मेरे | Is Akhil Brahmand Me | Mata Bhagwati Devi Bhajan
अमृतवाणी:- प्राण निकल जाए तो क्या बचेगा | Pran Nikal Jaye To Kya Bachega पंडित श्रीराम शर्मा आचार्य
गायत्रीतीर्थ शांतिकुंज, नित्य दर्शन
आज का सद्चिंतन (बोर्ड)
आज का सद्वाक्य
नित्य शांतिकुंज वीडियो दर्शन
!! शांतिकुंज दर्शन 25 August 2025 !! गायत्री तीर्थ शांतिकुञ्ज हरिद्वार !!
अमृतवाणी: विचार और कर्म का समन्वय ही सच्चा प्रभाव है पंडित श्रीराम शर्मा आचार्य
परम् पूज्य गुरुदेव का अमृत संदेश
जो आदमी अपने आप से शुरू कर देता है, उसको सफलता मिल जाती है। जो पराए से सफलता की उम्मीदें करता रहता है — "आप यह कीजिए, आप ज्ञानवान बन जाइए, आप तपस्वी बन जाइए, आप महात्मा बन जाइए और हम, हम जैसे हैं वैसे ही रहेंगे" — तब तक, बेटे, आपकी बात कोई नहीं सुनेगा। केवल मजाक उड़ाया जाएगा।
और जिस दिन आप ये कहेंगे — "आपको करना हो तो करना, ना करना हो तो नहीं करना। हम करेंगे। हम करेंगे और देखिए, हम करके दिखाते हैं, दिखाते हैं।" — जिस दिन आप इस तरह का निश्चय कर लेंगे, मेरा विश्वास है कि आपके अंदर क्षमताएं हैं, आपके अंदर लोगों पर प्रभाव डालने की शक्ति जरूर पैदा हो जाएगी।
और जहां कहीं भी जाएंगे — आपको बात करना आता हो चाहे ना आता हो, बोलना आता हो चाहे ना आता हो, आपको कथा कहनी आती हो चाहे ना आती हो — आपका प्रभाव जरूर पड़ जाएगा। जरूर पड़ जाएगा।
इसलिए आप में से प्रत्येक आदमी को मैं चाहता हूं, इस तरीके से आप यहां से विचार करके जाएं। फिर आप कुछ करेंगे क्या?
करने के लिए, हमारी पुरानी पीढ़ियों के लिए एक काम काफी था। कौन सा? धर्मोपदेश, एक कथा कहना, भागवत की कथा कहना, सत्यनारायण की कथा कहना, गंगा जी नहाना, भगवान जी के दर्शन करना और सत्यनारायण स्वामी की कथा कहलवाना — एक काम काफी था।
हमारी पहली वाली पीढ़ियां जो हमारे बुजुर्ग थे, उनके लिए यह इतना काफी था क्योंकि ना उन जमाने में चालाकियां थीं, ना उन जमाने में चोरियां थीं, ना उन जमाने में बदकारियां थीं, ना उस जमाने में बदमाशियां थीं।
अब हमारे लिए एक नया काम आ गया है, बेटे। हमारी एक नई आफत आ गई है। जिस जमाने में हम जिंदा रह रहे हैं, उसमें हमको दो काम करने पड़ेंगे। क्या काम करने पड़ेंगे?
वो काम करने पड़ेंगे, जो भगवान ने अवतार जब कभी भी लिए हैं, ऐसे ही गंदे समय में लिए हैं जैसे गंदे समय में हम और आप पैदा हुए हैं। भगवान में से प्रत्येक भगवान को दो काम करने पड़े हैं। एक ही अवतार को दो काम ना करने पड़े हों — ऐसा नहीं है कि कोई एक काम करके चला गया हो। कथा करके चला गया हो, अनुष्ठान करा के चला गया हो, जप करके चला गया हो, तीर्थ यात्रा करके चला गया हो — ऐसा, बेटा, एक भी भगवान हमको दिखाई नहीं पड़ता।
पं श्रीराम शर्मा आचार्य
अखण्ड-ज्योति से
प्रज्ञावतार ही निष्कलंक अवतार हैं। उसके प्रतिपादनों और समर्थकों को लोक श्रद्धा कैसे मिले? इसके रचनात्मक आधार तो कितने ही हैं, पर एक विरोधात्मक आधार भी हैं .. आसुरी आक्रमण। इसके पश्चात् ही किसी महान् व्यक्ति या आन्दोलन को प्रौढ़ता का पता चलता हैं। कलंक कालिका का दौर और अवरोध आक्रमणों का क्रम ही वह स्थिति उत्पन्न करेगा। जिससे निष्कलंक भगवान का सर्वत्र जय-जयकार होने लगे।
यह क्रम अपने अभियान में भी निश्चित रूप से चलेगा। चलता भी रहा है। प्रतिगामी निहित स्वार्थ द्वारा तरह-तरह के आक्षेप लगाये जाते रहे हैं। बदनाम करने का कोई अवसर उन्होंने नहीं छोड़ा। अश्रद्धा उत्पन्न करने के लिए जो कुछ कहा जा सकता था - जो कुछ किया या कराया जा सकता था, उसमें की कुछ कमी नहीं रहने दी गई हैं। यह सारा उत्पात उन आसुरी तत्वों हैं जो अवांछनियताओं की सड़ी कीचड़ में ही डाँस, मच्छरों की तरह अपनी जिन्दगी देखते हैं। कुछ ईर्ष्यालु हैं, जिन्हें अपने अतिरिक्त किसी अन्य का यश वर्चस्व सहन ही नहीं होता। इसके अतिरिक्त सड़े टिमाटरों का भी एक वर्ग हैं जो पेट में रहने वाले कीड़ों की-चारपाई पर साथ सोने वाले खटमलों की-आस्तीन में पलने वाले साँपों की तरह आश्रय पाते हैं वहीं खोखला भी करते हैं। बिच्छू अपनी माँ के पेट का माँस खाकर ही बढ़ते और पलते हैं, माता का प्राण हरण करने के उपरान्त ही जन्म धारण करते हैं। कृतघ्नों और विश्वासघातियों का वर्ग इस युग में जिस तेजी से पनपा हैं उतना संभवतः इतिहास भी इससे पहले कभी भी नहीं देखा गया।
अवाँछनीयता हर क्षेत्र में अड्डा डाले और जड़ जमाये बैठी हैं। युग परिवर्तन की प्रक्रिया भी उसे उखाड़ने की उसी क्रम अनुपात से चलेगी जिससे कि सृजनात्मक सत्प्रवृत्तियों का संवर्धन। ऐसी दिशा में दुष्प्रवृत्तियों के सामने जीवन-मरण का प्रश्न उपस्थित होगा। अभियान को जब तक दुर्बल समझा जायगा तब तक उसे उपहास उपेक्षा का पात्र बने रहने दिया जायगा। व्यंग तिरस्कार बरसते रहेंगे। किन्तु जब उसकी समर्थता और सफलता का आभास होने लगेगा तो विरोध एवं आक्रमण का सिलसिला चल पड़ेगा। अन्ततः वह देवासुर संग्राम उतना ही प्रचण्ड हो जायगा जितना कि सृजन प्रत्यावर्तन। इसके लिए प्रत्येक सृजन शिल्पी को पहले से ही तैयार रहना होगा।
किसान का मुख्य काम अन्न उपजाना है, विभुक्षा का समाधान करना हैं। तो भी उसे इस कार्य क्षेत्र में आये दिन सर्प, बिच्छुओं, दीमकों, सुअर, भेड़ियों से मुठभेड़ के साधन सँजोकर रखने होते हैं। स्वयं श्रेष्ठ कर्म से निरत हैं। यह इस बात की गारंटी नहीं कि दुष्ट दुरात्माओं के आक्रमण होंगे ही नहीं। सज्जनता सामने से ही अनाक्रम दीखती है, पर परोक्ष रूप से उसमें भी दुष्टता की विघातक सामर्थ्य परिणाम में भरी पड़ी है। असुर वस्तुस्थिति को समझता हैं इसलिए देव पर कुछ प्रत्यक्ष कारण न रहने पर भी आक्रमण करने से चूकता नहीं। प्रकाश के उदय में अन्धकार की मृत्यु है। इसलिए सूर्योदय से पूर्व एक बार सघन तमिस्रा जमा होती है और प्रकाश से जूझने का उपक्रम करती हैं, भले ही उसे अन्ततः मुँह की ही क्यों न खानी पड़े।
युग निर्माण अभियान की प्रज्ञावतार प्रक्रिया उन समस्त सम्भावनाओं से भरी हुई है। सहयोग उसे प्रचुर परिणाम में मिलना हैं किन्तु ऐसी घटनाएँ भी कम नहीं होंगी जा प्रत्यक्ष आक्रमण में कठिनाई और परोक्ष दुरभिसन्धि रचने में सरलता देखकर उसी मार्ग को अपनाये। अन्तः क्षेत्र से उभरने वाले और बाहरी क्षेत्र से आक्रमण करने वाली दोनों ही स्तर की दुरभिसन्धियों से अभियान की सुरक्षा का प्रबन्ध करना चाहिए। इस संदर्भ में बरती जाने वाली जागरूकता, साहसिकता एवं शूर-वीरता उतनी ही आवश्यक हैं जितनी कि सृजन प्रयोजनों के लिए बरती जाने वाली उदार सेवा-साधना एवं भाव भरी परमार्थ परायणता।
.... क्रमशः जारी
पं श्रीराम शर्मा आचार्य
अखण्ड ज्योति अगस्त 1979 पृष्ठ 55
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