Tuesday 23, September 2025
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!! शांतिकुंज दर्शन 23 September 2025 !! गायत्री तीर्थ शांतिकुञ्ज हरिद्वार !!ew.mp4
अमृतवाणी: गायत्री ही कामधेनु है पंडित श्रीराम शर्मा आचार्य
परम् पूज्य गुरुदेव का अमृत संदेश
किसी से यह कहा जाए — "भगत जी आराम में हैं, भगत जी आ...", भगत जी माने? भगत जी माने बेवकूफ! भगत जी कौन होता है? बेवकूफ तो हैं! हाँ, यह तो बड़े भगत जी हैं — "ए... भगत जी हैं, यह बैठे रहते हैं।" काठ का उल्लू है, कुछ नहीं।
भगत जी का अपमान, भगत जी का तिरस्कार — इसलिए होता है कि उनका उद्देश्य ऊँचा नहीं है। छोटा वाला उद्देश्य, घृणा वाला उद्देश्य, नीच वाला उद्देश्य, निकम्मा वाला उद्देश्य, पेट पालने वाला उद्देश्य, मालदार बनने वाला उद्देश्य, अहंकार की पूर्ति करने वाले उद्देश्य। ऐसे उद्देश्यों के लिए वह फिरता है और माँगता है भगवान से।
ऊँची चीज माँग, ऊँची चीज! ऊँची चीज से भगवान की भक्ति की इज्जत, भगवान की इज्जत होती है। भगवान की आँखों में और भगवान बड़ी से बड़ी चीज देने को तत्पर हो जाता है।
मैं क्या कह रहा था — कल आपको बता रहा था कि ऊँचा उद्देश्य लेकर के आप भक्ति करें, चरित्रवान हो करके भक्ति करें और अपने अंतःकरण में श्रद्धा का ऊँचा रस और तत्वज्ञान मिलाकर के करें, तो आपको चमत्कार मिल जाएगा।
मैंने एक पुस्तक छापी थी सबसे पहले। गायत्री की पहली पुस्तक जो मेरी छपी थी — उसका नाम था "ब्राह्मण की कामधेनु गायत्री"।
पहली पुस्तक, छह आने मूल्य की थी। उसमें मैंने लिखा था — यह कामधेनु है, मनुष्य की कामनाओं को पूरा कर सकती है, निहाल कर सकती है। लेकिन साथ में एक शर्त लगी हुई थी — क्या? यह ब्राह्मण की कामधेनु है।
क्यों साहब? बनिए की हो सकती है? नहीं साहब, बनिए की नहीं हो सकती। कायस्थ की? कायस्थ की भी नहीं। ठाकुर की? ठाकुर की भी नहीं — ब्राह्मण की कामधेनु है।
इस पर लोगों ने किताब को उछालना शुरू कर दिया — "देखिए जो हम कहते थे, वही गुरुजी ने कहा है।" यह तो ब्राह्मण की है! कोई और पढ़ेगा — बनिया पढ़ेगा तो नरक में जाएगा, कायस्थ पढ़ेगा तो नरक में जाएगा, ठाकुर पढ़ेगा तो पढ़ नहीं सकता। केवल ब्राह्मण की है, कान में कहने की है — ब्राह्मण की है!
धत्त तेरी की! मैंने ये क्या कर डाला? आपने ब्राह्मण बना दिया — मालवीय जी ने? मैं क्या कहने वाला था? ये क्या हो गया! उलटे का पुलटा हो गया।
फिर मैंने दोबारा जब किताब छापी — उसमें से ब्राह्मण शब्द निकाल दिया।
अब उसका नाम है — "गायत्री ही कामधेनु है"। यही किताब अब बाजार में उपलब्ध है।
अखण्ड-ज्योति से
परमसत्ता को माँ के रूप में देखने और उस रूप में उसकी आराधना करने का प्रचलन भारतीय संस्कृति की एक मौलिक विशेषता है, जि की मिसाल विश्व के अन्य धर्मों या आस्था-परंपराओं में खोज पाना दुर्लभ है। वहाँ ईश्वर को पिता या जगत् के स्वामी के रूप में ही देखा और पूजा जाता है, माँ के रूप में नहीं। श्री अरविंद की दृष्टि में यह भारत की ही विशेषता है। नवरात्रि के रूप में तो इसकी आराधना का विशिष्ट पर्व मनाया जाता है। इसे शक्ति पर्व भी कहा जाता है। भारत में आदिकाल से चला आ रहा शक्ति पूजा का यह पर्व आज भी अगम्य आस्था के साथ जारी है। हमारी संस्कृति का प्रत्येक कालखंड इसकी चर्चा, विवेचना एवं साधना से भरा पड़ा है।
भारतीय संस्कृति के आदि ग्रंथ ऋग्वेद के दशम मंडल में एक पूरा सूक्त शक्ति उपासना पर है, जिसमें शक्ति की व्यापकता का सुंदर विवेचन किया गया है, "मैं ही ब्रह्मद्वेषी को मारने के लिए रुद्र का धनुष चढ़ाती हूँ। मैं ही सेनाओं को मैदान में लाकर खड़ा करती हूँ। मैं ही आकाश और पृथ्वी में सर्वत्र व्याप्त हूँ। मैं ही संपूर्ण जगत् की अधीश्वरी हूँ। मैं परब्रह्म को अपने से अभिन्न रूप में जानने वाली पूजनीय देवताओं में प्रधान हूँ। संपूर्ण भूतों में मेरा प्रवेश है।" इसी तरह ऋग्वेद के देवी सूक्त, उषा सूक्त तथा सामवेद के रात्रि सूक्त में शक्ति साधना का उल्लेख आता है।
कुरुक्षेत्र में महाभारत युद्ध' आरंभ होने से पूर्व भगवान् श्रीकृष्ण ने दुर्गा की उपासना की थी, ताकि युद्ध में अर्जुन विजयी हो। भगवान् राम द्वारा दुर्गा उपासना का उल्लेख अनेक रामकथाओं में मिलता है। बौद्ध धर्म में मातृ शक्ति की पूजा विविध रूपों में प्रचलित रही है। बौद्ध तंत्रों में तो शक्ति को शीर्ष स्थान प्राप्त रहा है। पुराणों में शक्ति उपासना की महिमा का विस्तार से वर्णन है।
देवी भागवत में शक्ति के लिए अनन्य भक्ति भाव प्रदर्शित किया गया है। मार्कण्डेय पुराण में शक्ति की व्यापकता का उल्लेख तीन रूपों में किया गया है, महाकाली, महालक्ष्मी और महासरस्वती। महादुर्गा आसुरी शक्तियों की संहारक हैं, अहंकार का नाश करती हैं और ज्ञान की खड्ग से अज्ञान को नष्ट करती हैं। महासरस्वती विवेक की देवी हैं। विद्या, साहित्य, संगीत, विवेक और ज्ञान की अधिष्ठात्री हैं। महालक्ष्मी ऐश्वर्य की देवी हैं। मार्कण्डेय पुराण में देवी माहात्म्य की विशद विवेचना को 'दुर्गा सप्तशती' नाम दिया गया है। स्कंद पुराण में दुर्गा के आविर्भाव का वर्णन है।
ब्रह्मपुराण-ब्रह्मवैवर्त पुराण आदि में भी देवी के अवतरण का उल्लेख मिलता है। मार्कण्डेय पुराण के अनुसार, ब्रह्माजी मार्कण्डेय ऋषि को कहते हैं कि देवी का पहला रूप शैलपुत्री है। इस क्रम में अन्य रूप ब्रह्मचारिणी, चंद्रघंटा, कुष्मांडा, स्कंदमाता, कात्यायनी, कालरात्रि, महागौरी और सिद्धिदात्री हैं। इन रूपों को नौ दुर्गा के रूप में पूजा जाता है। दुर्गा की उत्पत्ति के संदर्भ में शिव पुराण में रुद्र संहिता के पंचम अध्याय में सुंदर आख्यान मिलता है।।
पं श्रीराम शर्मा आचार्य
अखण्ड ज्योति अक्टूबर 2000
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