Wednesday 24, September 2025
अमृतवाणी:- उपासना से हम निहाल हो गए | Upasana Se Hum Nihal Ho Gaye | Pt Shriram Sharma Acharya
गायत्री मन्त्र का अर्थ |Gayatri Mantra Ka Arth
"गायत्री उपासना और साधना में संयम की भूमिका"
बुजुगों से शिष्टाचार बरतो। श्रीराम शर्मा आचार्य जी
अमृतवाणी:- साधना के सूत्र - भाग 1
Maa Chandraghanta
"नवरात्रि का तृतीय दिवस — माँ चंद्रघंटा"
हमें भक्ति दो माँ, हमें शक्ति दो माँ | Hame Bhakti Do Maa Hame Shakti Do Maa | Stuti Pandya
अमृत सन्देश:- भक्ति क्यों बनाती है इंसान को भगवान ? | Bhakti Kyun Banati Hai Insan Ko Bhagwan
गायत्रीतीर्थ शांतिकुंज, नित्य दर्शन
आज का सद्चिंतन (बोर्ड)
आज का सद्वाक्य
नित्य शांतिकुंज वीडियो दर्शन
!! शांतिकुंज दर्शन 24 September 2025 !! गायत्री तीर्थ शांतिकुञ्ज हरिद्वार !!ew.mp4
अमृतवाणी: गायत्री माता – ब्राह्मण की कामधेनु पंडित श्रीराम शर्मा आचार्य
परम् पूज्य गुरुदेव का अमृत संदेश
गायत्री ब्राह्यण की कामधेनु है, ब्राह्यणत्व गायत्री का बच्चा हो करके उनका हंस हो करके हमने जो दूध पिया है, राजहंस हो करके हमने अपने कंधे पर गायत्री माता को बिठाया है। गायत्री माता को हम लिए लिए फिरते हैं। हनुमान जी ने रामचंद्र जी और लक्ष्मण दोनों को अपने कंधे पर बिठाया था और दोनों को लिए-लिए फिरते थे और कहते थे रामचंद्र तो खिलौना है, रामचंद्र तो बच्चा है। रामचंद्र को तो हम गोदी में खिलाएंगे और लक्ष्मण जी को हम गोदी में खिलाएंगे। हनुमान का फोटो जो बाजार में बिकता है, हनुमान तो बड़ा विशालकाय है। रामचंद्र ऐसे बैठे हैं बच्चा जैसे, लक्ष्मण जी बच्चा जैसे। काहे पर बैठे हैं? कंधे पर बैठे हैं, गोदी में बैठे हैं। लक्ष्मण जी और हनुमान जी गोदी में लिए फिरते हैं रामचंद्र।
लक्ष्मण जी को महाराज जी यह क्या बात है? यह यह तो बड़ी अपमान हो गया भगवान बड़े हैं, भला भगवान का ये हनुमान तो है बंदर और भगवान और रामचंद्र जी लक्ष्मण जी एक शेष जी के अवतार और एक विष्णु जी के अवतार दोनों अवतारों को लिए फिरता है। हाँ लिए फिरता है यह बड़ा यह बड़ा है क्यों फिर क्या बात है हनुमान में? यह हनुमान ब्राह्यणत्व ब्राह्यण ब्राह्यण तो नहीं है। यह यह वंश का कौन है? वंश का बेटे मालूम नहीं है। वंश तो यह कहते थे वो थे क्या नाम है वानर, वानर जंगली कौम थी कोई जंगली कौम थी कोई जैसे भील कोई होते हैं इस तरह के इस तरह के इतिहासकारों ने यह बताया है। वानर जो थे उस जमाने की कोई जंगली कौम थी जैसे आजकल कौल भील किरात वगैरह होते हैं इस टाइप के कोई थे। वानर अछूत हो गए थे संभव है अछूत ही रहे होंगे शूद्र ही रहें होंगे लेकिन लेकिन वो कौन थे ये ब्राह्मण थे।
ब्राह्मण कौन होता है? ब्राह्मण की परिभाषा कल परसों आपको कहता रहा। ब्राह्मण की परिभाषा तीन लक्षण बताए गए तीन लक्षण कह ले चाहे एक लक्षण कह ले। असल में यह ब्राह्मणत्व की परिभाषा में आ जाते हैं श्रद्धा, श्रद्धा यह ब्राह्मण की परिभाषा में समाहित है और चरित्र यह ब्राह्मण की परिभाषा में समाहित है और ऊँचा उद्देश्य यह ब्राह्मण की परिभाषा में समाहित है। यह तीन चीजें अगर आदमी के भीतर मिल जाए तो उसको ब्राह्मण कहते हैं। यह ब्राह्मण की परिभाषा संक्षेप में अगर आप सुनना चाहते हों कल और परसों मैं क्या कहता रहा। मैंने ब्राह्मणत्व की परिभाषा की और यह कहा कि ब्राह्मणत्व आप में आएगा तो आप बच्चे के तरीके से दूध अपनी माँ का पियेंगे। माँ आपके लिए दूध का पात्र लेकर के फिरती रहे बच्चे को तलाश करती फिरेगी। बच्चा भी जंगल में तलाश करता था माँ माँ माँ माँ और माँ भी तलाश करती फिर रही थी। माँ तुम किसे तलाश करती फिरती और बच्चा तलाश करता फिरे आप काहे को फिरती हैं? हम इसलिए फिरती हैं कि हमारा बच्चा हमारा बच्चा कहीं होगा हमारा बच्चा कहीं प्यासा होगा हमारा बच्चा कहीं भूखा होगा हमारे बच्चे की न जाने रखवाली हो रही होगी कि नहीं होगी हमारे बच्चे पर कहीं भेड़ियों ने हमला तो नहीं कर दिया होगा हमारा बच्चा जाने कहाँ चला गया होगा जंगल में।
माँ अपने बच्चे को गाय अपने बछड़े को तलाश करने के लिए तलाश करती फिरती है। बछड़ा भी माँ को तलाश कर रहा था और माँ और माँ गाय भी तलाश कर रही थी दोनों एक दूसरे को तलाश कर रहे थे जब दोनों मिले तब प्यार की सीमा नहीं रही। बस बछड़ा जो था खट से चला गया दूध दूध पीने के लिए और गाय ने खट से अपनी टांगें चैड़ी कर दी और चाटने भी लगी
अखण्ड-ज्योति से
वस्तुतः शक्ति का विस्तार, वैभव एवं लीला अनंत है। सृष्टि की तमाम व्यापकता एवं विविधता के मूल में एक ही शक्ति विद्यमान है, इसे ब्रह्म की क्रियाशक्ति के रूप में, आदिशक्ति के रूप में जाना जाता है। यही विविध अवसरों पर, विविध प्रयोजनों के लिए अलग-अलग नाम, रूप एवं शक्ति धारण करके प्रकट होती है। प्रकृति की जितनी भी शक्तियाँ हैं, वे सब इसी की अभिव्यक्ति हैं। इनका स्फुरण, उद्भव एवं जन्म इसी शक्ति के गर्भ से होता है।
सृष्टि का पोषण एवं संवर्द्धन इसी के बल पर होता है। यही इसकी रक्षा करती है। यही ब्रह्मा, विष्णु एवं महेश की जननी है। सृष्टिकर्ता इस सृजनकारिणी शक्ति से हीन होने पर सृष्टिकर्ता नहीं रह जाता है। स्कंद पुराण में उल्लेख आता है कि शक्ति से विहीन शिव शव के समान हो जाते हैं, शिव का शिवत्व महाशक्ति के सान्निध्य से ही जाग्रत् होता है। देवी के रूप को सर्वत्र व्याप्त देखा जा सकता है। समस्त प्राणियों में यही चेतना, बुद्धि, स्मृति, धृति, शक्ति, श्रद्धा, कांति, तुष्टि, दया आदि रूपों में स्थित है। प्रत्येक प्राणी के भीतर मातृशक्ति एवं मातृप्रवृत्ति के रूप में ही प्रवाहित और प्रकाशित है। यह विविध रूपधारिणी है।
सत, रज एवं तम गुणों के आधार पर यह क्रमशः महासरस्वती, महालक्ष्मी एवं महाकाली के रूप में अभिव्यक्त होती है। ठस्तुतः विविध नाम-रूपों में विर्वनित देवी के स्वरूप मूलतः एक ब्राह्मी शक्ति में सिमट जाते हैं, जिसे प्रचलित रूप में गायत्री नाम से जाना जाता है। नवरात्रि के पावन पर्व पर प्राचीनकाल में गायत्री उपासना का ही एकमात्र प्रसंग मिलता है। विभिन्नताएँ मध्यकाल के अंधेर युग की उपज हैं, जिसमें शक्ति-देवियों के नाम पर अनेक रूप सामने आए। फिर भी प्रधानता गायत्री की ही रही है। सनातन परंपराओं की पूरी तरह अवमानना सांप्रदायिक अँधेरों के ज्वार में भी न हो सकी।
सनातन संस्कृति में तो पूरी तरह एकरूपता, एकनिष्ठा, एक दिशा, एक लक्ष्य का ही निर्धारण था। ज्ञान और विज्ञान के आधार वेद थे और उपासना का समूचा विधि-विधान गायत्री की धुरी पर टिका हुआ था। उन दिनों सर्वसाधारण के लिए दैनिक संध्या वंदन में गायत्री मंत्र ही उपासना का मेरुदंड था। योगी-तपस्वी इसी के सहारे अपना महान् लक्ष्य प्राप्त करते थे। देवताओं और अवतारों के लिए भी शक्ति का स्रोत यही थी।
नवरात्रि के अवसर पर गायत्री मंत्र को केंद्र बनाकर विशिष्ट शक्ति साधना-अनुष्ठान संपन्न किए जाते थे। नवरात्रि की ऋतु संधि की वेला स्वयं में विशिष्टता लिए होती है। इस समय समूची प्रकृत्ति अपने चरम उत्कर्ष पर होती है। इन्हीं दिनों काया अपने अंदर इकट्ठे विजातीय तत्त्व को बाहर फेंकने के लिए जोर मारती है। आध्यात्मिक साधनाओं के लिए भी इस ऋतु संधि-नवरात्रि से बढ़कर और कोई अवसर नहीं हो सकता। यदि इसके साथ युगसंधि का दुर्लभ सुयोग भी जुड़ा हो, क। इसका महत्त्व शतगुणित हो जाता है। इसलिए नवरात्रि के इस पुण्य पर्ज को हाथ से न जाने दिया जाए व समुचित तैयारी के साथ इसकी आत्मशोधन एवं आत्मोत्कर्ष साधना में भागीदार हुआ जाए, तो यह समझदारी वाला कदम होगा।
पं श्रीराम शर्मा आचार्य
अखण्ड ज्योति अक्टूबर 2000
| Newer Post | Home | Older Post |
