Thursday 25, September 2025
अमृतवाणी:- उपासना का क्रियात्मक स्वरूप : भाग 1 | गायत्री के पीछे का रहस्य क्या है?
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चिन्ता करना व्यर्थ है। श्रीराम शर्मा आचार्य जी
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गायत्रीतीर्थ शांतिकुंज, नित्य दर्शन
आज का सद्चिंतन (बोर्ड)
आज का सद्वाक्य
नित्य शांतिकुंज वीडियो दर्शन
!! परम पूज्य गुरुदेव का कक्ष गायत्री तीर्थ शांतिकुञ्ज हरिद्वार 25 September 2025 !!
!! अखण्ड दीपक #Akhand_Deepak (1926 से प्रज्ज्वलित) चरण पादुका गायत्री तीर्थ शांतिकुञ्ज हरिद्वार 25 September 2025 !!
!! शांतिकुंज दर्शन 25 September 2025 !! गायत्री तीर्थ शांतिकुञ्ज हरिद्वार !!
अमृतवाणी: गायत्री का ज्ञान-विज्ञान पंडित श्रीराम शर्मा आचार्य
परम् पूज्य गुरुदेव का अमृत संदेश
गायत्री मंत्र जो संसार का सबसे महत्वपूर्ण मंत्र है, इसका ज्ञान और विज्ञान दोनों ही आदमी के भौतिक और आध्यात्मिक दोनों ही जीवनों को निहाल करते हैं। भौतिक जीवन को निहाल करता है कौन? गायत्री का विज्ञान, विज्ञान नहीं, अनुष्ठान, जप, तप, साधना, उपासना यह विज्ञान है। यह साइंस है। गायत्री की साइंस का क्या परिणाम है? साइंस का परिणाम है आदमी के भौतिक जीवन को सुखी और समुन्नत बनाना। और ज्ञान का अर्थ क्या है? ज्ञान का अर्थ है मनुष्य की जीवात्मा में देवात्मा का उदय करना, ऋषि का उदय करना, भगवान का उदय करना भीतर।
यही तो कहते रहे हैं आपसे मनुष्य के भीतर देवत्व का उदय अर्थात अर्थात मनुष्य की जीवात्मा और मनुष्य की अंतरात्मा का परिष्कार इसका नाम है देवत्व और धरती पर स्वर्ग का अवतरण क्या है बताइए जरा? संसार की भौतिक परिस्थितियाँ भौतिक परिस्थितियों का सुख और शांति से भर जाना यह विज्ञान का काम है और यह ज्ञान का काम है। यह ब्रह्मविद्या का काम है और यह ब्रह्मवर्चस का काम है। ब्रह्मवर्चस का नाम है तेज और ब्रह्मविद्या ब्रह्मविद्या का नाम ब्रह्मविद्या का नाम है शांति। जिसको हम मुक्ति कह सकते हैं, स्वर्ग कह सकते हैं, शांति कह सकते हैं, भगवान का साक्षात्कार कह सकते हैं, आत्मा की परमात्मा में परिणति कह सकते हैं। अर्थात यह दोनों भाग आ जाते हैं गायत्री के ज्ञान और विज्ञान की।
ये महिमा मैं आपको कल परसों से आप को दो दिन मैं समझाने की कोशिश करता रहा और मैंने कल एक चीज की जानकारी भी दी आपको। गायत्री का भौतिक लाभ क्या हो सकता है? भौतिक लाभ क्या हो सकता है? भौतिक लाभ मिल सकता है, हाँ मिल सकता है। कल हमने अपने व्यक्तिगत जीवन की व्यक्तिगत जीवन की घटनाओं को बताया कि हमको भौतिक जीवन में। अब आध्यात्मिक जीवन की बताइए। आध्यात्मिक जीवन की हम नहीं बता सकते आपको। क्यों नहीं बता सकते? कि न आप हमारे हमारे अंतरंग को पहचान सकते हैं, न आपको अपने अंतरंग को दिखाने की क्षमता आपको है।
भौतिक आपको बता दिया हमने, किताब लिख दी हमने, यह बना दिया संगठन कर दिया यह भौतिक था तो बता दिया। आप बताइए अंतरंग को अंतरंग को हम नहीं बता सकते और ना आप जान सकते हैं। जानने के लिए जानने के लिए आपकी आँखें होनी चाहिए। दिव्यं ददामि ते चक्षुरू हम तुझें दिव्य चक्षु देते हैं देखने के लिए। दिव्य चक्षु आपके भीतर नहीं हैं इसीलिए हम सिर्फ इतना ही बताते हैं हम एक पंडित हैं और हम एक व्यक्ति हैं और गायत्री उपासक हैं और हमारे वरदान और आशीर्वाद से भला हो जाता है आदमियों का और आदमी के बाल बच्चे हो जाते हैं और बीमारी दूर हो जाती है और नौकरी में उन्नति हो जाती है और यह हो जाता है। तो महाराज जी इतना क्या बता रहे हैं बेटे? विज्ञान बताया रहा हूँ। क्या बताया रहे हैं बेटे? यह विज्ञान नही हो सकता। यह हमारा विज्ञान का परिणाम और हमारे ज्ञान का ज्ञान का हम नहीं बता सकते।
अखण्ड-ज्योति से
नवरात्रि साधना में २४,००० मंत्र जप वाले लघु अनुष्ठान के नियमों का पालन करना होता है। इसमें २७ माला नियमित जपनी पड़ती हैं। जो सामान्यतः ३ घंटे में पूरी हो जाती हैं। इस अवधि में उपवास के नियम का पालन कड़ाई से किया जाए, तो बेहतर है, अन्यथा ब्रह्मचर्य रहने वाला अनिवार्य नियम टूट सकता है। उपवास कई स्तर का हो सकता है, फल-दूध, शाकाहार, खिचड़ी-दलिया आदि। मसाला इन दिनों छोड़ देना चाहिए। बिना नमक एवं शक्कर का भोजन भी एक प्रकार का उपवास ही है। अपनी शारीरिक एवं मानसिक स्थिति के अनुरूप उपवास का क्रम बनाना चाहिए। नियम के क्रम में नौ दिवस तक पूर्ण ब्रह्मचर्य का पालन किया जाए।
इसके अतिरिक्त तीन अन्य नियम हैं, १ कोमल शैय्या का त्याग अर्थात् भूमि शयन या तख्त पर सोना, २- अपनी शारीरिक सेवाएँ अपने हाथों करना, ३-हिंसा युक्त पदार्थों का त्याग, चमड़े की वस्तुओं का त्याग। इन पाँच नियमों के अतिरिक्त जप का शतांश हवन किया जाना चाहिए। पूर्णाहुति के बाद प्रसाद वितरण, कन्या-भोज आदि अपनी सामर्थ्यानुसार उत्तम है। जो उपर्युक्त अनुष्ठान न कर सकते हों, वे २४ गायत्री चालीसा पाठ करके या २४०० गायत्री मंत्र लिखकर भी सरल अनुष्ठान कर सकते हैं। इसके साथ ऊपर बताए गए नियमों का पालन किया जा सके, तो अति उत्तम है।
शक्ति पर्व के इस पावन अवसर पर महांपूर्णाहुति की वेला में किया गया साधनात्मक पुरुषार्थ हमारे आत्मोत्कर्ष की दिशा में मील का पत्थर साबित हो सकता है। अवतरित शक्ति का एक अंश, उस ज्ञान को सक्रियता में बदल सकता है। जो शक्ति के अभाव में भारी बोझ बना हुआ है, जिसके नीचे हम दबे-पिसे जा रहे हैं। इस शक्ति का एक अंश उस भक्ति के लिए ईंधन का काम कर सकता है, जिसके अभाव में भक्ति कोरी भावुकता बनकर उपहास का पात्र बनी हुई है, इस शक्ति का एक अंश उस श्रद्धा को निष्ठा में बदलकर इसकी सार्थकता सिद्ध कर सकता है, जो शक्ति के अभाव में कुंठित होकर दम तोड़ रही है। आइए हम नवरात्रि के इस पर्व पर साधनात्मक पुरुषार्थ में संकल्पित भागीदारी लेकर इसे सफल बनाएँ।
पं श्रीराम शर्मा आचार्य
अखण्ड ज्योति अक्टूबर 2000
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