Friday 26, September 2025
अमृतवाणी:- उपासना का क्रियात्मक स्वरूप : भाग 2 | त्रिपदा गायत्री के तीन चरण Upasana Ka Kriyatmak Swaroop Part 2 परम पूज्य गुरुदेव पं श्रीराम शर्मा आचार्य जी
आंतरिक जागरण ही महानता की असली शक्ति है
"विवेक: जीवन का सच्चा मार्गदर्शक और मित्र"
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सर्वाधिक प्रभावशाली शारदीय नवरात्र – साधना | परम पूज्य गुरुदेव पं श्रीराम शर्मा आचार्य जी
अमृत सन्देश:- क्या भक्त और भगवान एक होते हैं? | Kya Bhakt Aur Bhagwan Ek Hote Hai
गायत्रीतीर्थ शांतिकुंज, नित्य दर्शन
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अमृतवाणी: त्रिपदा गायत्री का रहस्य पंडित श्रीराम शर्मा आचार्य
!! शांतिकुंज दर्शन 26 September 2025 !! गायत्री तीर्थ शांतिकुञ्ज हरिद्वार !!
परम् पूज्य गुरुदेव का अमृत संदेश
आप बताइए, अंतरंग को हम नहीं बता सकते और न आप जान सकते हैं। जानने के लिए आपकी आँखें होनी चाहिए। "दिव्यं ददामि ते चक्षुः", तुझे दिव्य चक्षु देते हैं। देखने के लिए दिव्य चक्षु आपके भीतर नहीं हैं। इसीलिए हम सिर्फ इतना ही बताते हैं कि हम एक पंडित हैं, एक व्यक्ति हैं और गायत्री उपासक हैं।
हमारे वरदान और आशीर्वाद से आदमियों का भला हो जाता है। आदमी के बाल-बच्चे हो जाते हैं, बीमारी दूर हो जाती है और नौकरी में उन्नति हो जाती है। यह सब हो जाता है।
"महाराज जी, इतना क्या बता रहे हैं?"
बेटे, विज्ञान बता रहे हैं। और क्या बताएँ? यह बेटा, विज्ञान है। यह हमारे विज्ञान का परिणाम है, और हमारे ज्ञान का।
ज्ञान का हम नहीं बता सकते। ज्ञान को हम कैसे बताएँ तुझे?
"आपके गुरुजी कैसे हैं?"
600 वर्ष के हो गए हैं।
"कितने लंबे हैं?" — इतने लंबे हैं।
"दाढ़ी कितनी बड़ी है?" — इतनी बड़ी है।
"और बताइए?" — बस हो गया। और क्या बताएँ?
"नहीं महाराज जी, उनकी जीवात्मा को बताइए। जीवात्मा से सुनने की इच्छा है।"
पर उसका कोई प्रभाव तुम्हारे ऊपर पड़ने वाला नहीं है। प्रभाव पड़ने वाला है, किन्तु तुम यही पूछते रहते हो — "हमको कोई दिखा ले, हमको लिवा लाना, हमको दिखा लाना। आपके गुरुजी कहाँ रहते हैं, दिखा लाना।"
मूर्ख कहीं का! क्या दिखा लाना? शक्ल दिखा लाएँगे? हाँ, शक्ल दिखा लाएँगे।
भौतिक — भौतिक ही आदमी की दृष्टि है। इसलिए कल हमने भौतिक इसका स्वरूप बता दिया था। गायत्री मंत्र का भौतिक स्वरूप क्या हो सकता है, और उससे भौतिक लाभ क्या हो सकते हैं।
आध्यात्मिक लाभ इससे लाखों गुना, करोड़ों गुना ज्यादा हैं। जड़ जमीन में होती है, दिखाई नहीं देती, पर होती है। पेड़ जितना बड़ा होता है, उतनी ही गहरी उसकी जड़ होती है। जड़ दिखती है? नहीं, हमें नहीं दिखती।
बेटे, बरगद का वृक्ष जितना ऊपर से बड़ा होता है, ठीक उतनी ही गहरी उसकी जड़ होती है।
आप खुदाई करके देखिए — मोटी जड़ें, महीन जड़ें, बारीक जड़ें — सब कितनी लंबाई में फैली हुई होती हैं। ठीक उतनी ही लंबाई में, जितनी कि वह वृक्ष बाहर फैला हुआ होता है।
आदमी का भौतिक विस्तार — जिसे आप रिद्धियाँ, सिद्धियाँ, चमत्कार, वैभव या वर्चस्व कह सकते हैं — वह जितना बड़ा होगा, ठीक उसी अनुपात में, उसी गहराई का उसका अंतरंग भी होगा।
अंतरंग कैसा हो सकता है? यह हम तुम्हें बता रहे थे। बहिरंग समझाने के बाद अब अंतरंग। हमने पिछले दो-तीन दिनों की व्याख्याओं में बताया कि अध्यात्म का अंतरंग क्या हो सकता है।
त्रिपदा गायत्री — यह क्या हो सकती है?
त्रिपदा, यानी तीन चरण —
जो हमारे रिश्तों से संबंध रखते हैं,
जो हमारे चिंतन से,
हमारे दृष्टिकोण से,
और हमारी आस्थाओं से संबंध रखते हैं।
अखण्ड-ज्योति से
नवरात्रि को देवत्व के स्वर्ग से धरती पर उतरने का विशेष पर्व माना जाता है। उस अवसर पर सुसंस्कारी आत्माएँ अपने भीतर समुद्र मंथन जैसी हलचलें उभरती देखते हैं। जो उन्हें सुनियोजित कर सके वे वैसी ही रत्नराशि उपलब्ध करते हैं जैसी कि पौराणिककाल में उपलब्ध हुई मानी जाती है। इन दिनों परिष्कृत अंतराल में ऐसी उमंगे भी उठती हैं जिनका अनुसरण सम्भव हो सके तो दैवी अनुग्रह पाने का नहीं देवोपम बनने का अवसर भी मिलता है।
यों ईश्वरीय अनुग्रह सत्पात्रों पर सदा ही बरसता है, पर ऐसे कुछ विशेष अवसर भी आते हैं, जिनमें अधिक लाभान्वित होने का अवसर मिल सके। इन अवसरों को पावन पर्व कहते हैं। नवरात्रियों का पर्व मुहूर्तों में विशेष स्थान है। उस अवसर पर देव प्रकृति की आत्माएँ किसी अदृश्य प्रेरणा से प्रेरित होकर आत्म-कल्याण एवं लोकमंगल के क्रिया-कलापों में अनायास ही रस लेने लगती हैं।
बसन्त आते ही कोयल कूकती और तितलियाँ फुदकती दृष्टिगोचर होती हैं और भौंरे गूँजते हैं जबकि अन्य ऋतुओं में उनके दर्शन भी दुर्लभ रहते हैं। वर्षा आते ही मेंढक बोलते हैं और मोर नाचने लगते हैं जबकि साल के अन्य महीनों में उनकी गतिविधियाँ कदाचित ही दृष्टिगोचर होती हैं। आँधी तूफान और चक्रवातों का दौर गर्मी के दिनों में रहता है। ग्रीष्म का तापमान बदलते ही उनमें से किसी का पता नहीं चलता। ठीक यही बात नवरात्रियों के समय पर भी लागू होती हैं। प्रातः काल और सायंकाल की तरह इन दिनों की भी विशेष परिस्थितियाँ होती हैं, उनसे सूक्ष्म जगत के दिव्य प्रवाह उभरते और मानवी चेतना को प्रभावित करते हैं।
न केवल प्रभावित करने वाली वरन् अनुकूल उत्पन्न करने वाली परिस्थितियाँ भी अनायास ही बनती हैं इसे समय की विशेषता कह सकते हैं। जीवधारियों में से अधिकाँश को इन्हीं दिनों प्रजनन की उत्तेजना सताती है और वे गर्भाधान सम्पन्न कर लेते हैं। इसमें प्राणी तो कठपुतली की तरह अपना रोल पूरा करता है, सूत्र-संचालन तो किसी ऐसे अविज्ञात मर्मस्थल से होता है जिसे सूक्ष्म जगत या अंतर्जगत के नाम से मनीषी व्याख्या-विवेचना करते रहते हैं। नवरात्रियों में कुछ ऐसा वातावरण रहता है जिसमें आत्मिक प्रगति के लिए प्रेरणा और अनुकूलता की सहज शुभेच्छा बनते देखी जाती है।
पं श्रीराम शर्मा आचार्य
अखण्ड ज्योति अक्टूबर 1996
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