Friday 24, January 2025
जिंदगी को ढंग से जीने की शिक्षा | Jandagi Ko Dhang Se Jine Ki Siksha
अखंड ज्योति का कागज़ गुरुदेव स्वयं बनाते थे | डॉ. चिन्मय पण्ड्या जी |
गायत्रीतीर्थ शांतिकुंज, नित्य दर्शन
आज का सद्चिंतन (बोर्ड)
आज का सद्वाक्य
नित्य शांतिकुंज वीडियो दर्शन
!! आज के दिव्य दर्शन 24 January 2025 !! !! गायत्री तीर्थ शांतिकुञ्ज हरिद्वार !!
!! परम पूज्य गुरुदेव पं श्रीराम शर्मा आचार्य जी का अमृत सन्देश !!
परम् पूज्य गुरुदेव का अमृत संदेश
आप लोगों ने कई बार देखा है, ऐसे-ऐसे आप गलती करते हैं, और मुंह फाड़ के इतना बड़ा मुंह फाड़ देते हैं, जैसे मगरमच्छ फाड़ता है, और आप बैठे रहते हैं, गुरु जी, सर खुजाते रहते हैं, और जैसे नवाब हो, ऐसा मुंह फाड़ते हैं, जैसे ये खा लेंगे, क्या करेंगे, क्या कर लेंगे? गुस्सा आएगा तो क्या कर लेंगे? यह भी नहीं बनता कि यह असभ्यता की निशानी है। मुंह फाड़ना हो तो मुंह के आगे कम से कम यह तो कर लो कि मोहल्ले वाले के सामने हैं, इसका मतलब यह है कि आदमी जो फॉलो नहीं कर पा रहा है और समझ नहीं पा रहा है, जाने क्या कहें और क्यों कहें। ऐसा मालूम पड़ता है कि ऊब आ रही है, व्याख्यानों में आदमी अक्सर बैठे रहते हैं, झपकी लेते रहते हैं। इसका मतलब क्या है? एक ही मतलब है कि कोई फर्क नहीं आ रहा और मजा नहीं आ रहा। यह कह रहा है कि क्या मुसीबत में हमको फंसा दिया, चलो जल्दी से उठो, भागो, यहां से। इस तरीके से क्या करना पड़ेगा? हमें यह जो व्याख्यान हैं, वह मुश्किल हैं, कठिन हैं। आप इसे फॉलो कर पाएंगे कि नहीं कर पाएंगे, हम नहीं समझ पा रहे हैं अभी, लेकिन आगे आपको जनता में हम भेजने वाले हैं, वह जनता के लिए कथानकों के माध्यम से, दृष्टांतों के माध्यम से, उदाहरणों के माध्यम से हम समझाएंगे।
पंडित श्रीराम शर्मा
अखण्ड-ज्योति से
अखण्ड-ज्योति की प्रकाश प्रेरणा से अनेकों महत्वपूर्ण और दर्शनीय सेवा संस्थाओं की निर्धारण हुआ है। वे अपने-अपने प्रयोजन को आशातीत सफलता के साथ सम्पन्न कर रहे हैं। उनमें से मथुरा में विनिर्मित गायत्री तपोभूमि युग निर्माण योजना से प्रज्ञा परिवार का हर सदस्य परिचित है। आचार्य जी की जन्मभूमि में स्थित शक्तिपीठ से जुड़े लड़कों के इण्टरमीडिएट कालेज लड़कियों के इण्टर महाविद्यालय तो अधिकाँश ने देखे है। इसके अतिरिक्त देश के कोने-कोने में विनिर्मित चौबीस सौ प्रज्ञा संस्थानों की गणना होती है। इन सभी को दूसरे शब्दों में “चेतना विस्तार केन्द्र” कहना चाहिए। इन सभी में प्रधानतया जन-मानस के परिष्कार को प्रशिक्षण ही अपनी-अपनी सुविधा और शैली से अनुशासन में बद्ध रहकर चलता है।
हरिद्वार का शांतिकुंज-गायत्री तीर्थ और ब्रह्मवर्चस देखने में इमारतों की दृष्टि से अपनी स्वतंत्र इकाई जैसे दीखते है। पर यदि कोई इनके निर्माण का मूलभूत आधार गहराई में उतरकर देखे तो वे सभी अखण्ड-ज्योति के अण्डे-बच्चे दिखाई पड़ेंगे। यहाँ यह समझ लेना भी आवश्यक होगा कि वह पत्रिका मात्र नहीं है, उसमें लेखक का सूत्र संचालक का दिव्य प्राण भी आदि से अन्त तक घुला है अन्यथा मात्र सफेद कागज को काला करके न कहीं किसी न इतनी बड़ी युग-सृजेताओं की सेवा वाहिनी खड़ी की है और न इतने ऊँचे स्तर के इतनी बड़ी संख्या में सहायक-सहयोगी अनुयायी ही मिले है। फिर इन अनुयायियों की भी यह विशेषता है कि जिस लक्ष्य को उनने हृदयंगम किया है। उसके लिए निरन्तर प्राणपण से मरते-खपते भी रहते है।
देश के कोने-कोने में बिखरी हुई प्रज्ञा पीठें, हरिद्वार और मथुरा की संस्थाएँ जो कार्य करती दीखती है उनके पीछे इन्हीं सहयोगियों का रीछ-वानरों जैसा भी और अंगद-हनुमान, नल-नील जैसा पराक्रम एवं त्याग काम करता देखा जा सकता है। यह सब अनायास ही नहीं हो गया। उन्हें बनाने, पकाने और शानदार बनाने में कोई अदृश्य ऊर्जा काम करती देखी जा सकती है। उसकी तेजस्विता और यथार्थता हजारों बार हजारों कसौटियों पर कसी जाती रही है और सौ टंच सोने की तरह खरी उतरती रही है। चमत्कार उसी का है। कौतूहलवर्धक कौतुक तो मदारी, बाजीगर भी दिखा लेते है पर व्यक्तित्व को साधारण से असाधारण बनाकर उन्हें कठिन कार्य क्षेत्र में उतार देना ऐसा कार्य है जिसकी तुलना करने के लिए किसी सामयिक प्रजापति की ही कल्पना उठती है; बुद्ध के धर्मचक्र प्रवर्तन और गान्धी के सत्याग्रह आन्दोलन का स्मरण दिलाती है।
.... क्रमशः जारी
पं श्रीराम शर्मा आचार्य
अखण्ड ज्योति जनवरी पृष्ठ 28
| Newer Post | Home | Older Post |
