Saturday 25, January 2025
छोटी उम्र में अनुशासन का महत्त्व | Choti Umar Me Anushanshan Ka Mehtav
ज्योति कलश यात्रा का उद्देश्य | Jyoti Kalash Yatra Ka Uddsheya
24 बार गायत्री महामंत्र गुरुदेव पं श्रीराम शर्मा आचार्य जी के स्वर में | 24 Time Gayatri Mantra
अमृत वर्षा रसानुभूति ध्यान साधना | Amrit Varsha Rasanubhuti Dhyan Sadhna
गायत्रीतीर्थ शांतिकुंज, नित्य दर्शन
आज का सद्चिंतन (बोर्ड)
आज का सद्वाक्य
नित्य शांतिकुंज वीडियो दर्शन
!! आज के दिव्य दर्शन 25 January 2025 !! !! गायत्री तीर्थ शांतिकुञ्ज हरिद्वार !!
!! परम पूज्य गुरुदेव पं श्रीराम शर्मा आचार्य जी का अमृत सन्देश !!
परम् पूज्य गुरुदेव का अमृत संदेश
चारों वेदों में कुल मंत्र कितने हैं? 20 हजार हैं, लेकिन उन 20 हजार मंत्रों की व्याख्या करने के लिए और समझाने के लिए ऋषियों को बहुत चीजें मालूम पड़ीं कि यह बड़ी मुश्किल से वेदों के सिद्धांत को समझना बड़ा मुश्किल होता है। इसके लिए क्या करना पड़ेगा? उदाहरणों के माध्यम से और दृष्टांतों के माध्यम से समझाएं। इसीलिए उन्होंने पुराणों को लिखना शुरू कर दिया। पुराणों में क्या है? पुराणों में, मित्रों, कहानी और किस्से हैं। पुराणों में कहानी और किस्से हैं। कहानी और किस्से हैं। कहानी और किस्से के सच्चे स्वरूप को उन्होंने देखा और सफलता यहां तक देखी। एक बड़ा वाला प्लान बनाया महाभारत, जिसका नाम है महाभारत। महाभारत किससे और कहानियों की किताब है। इसमें क्या है? इसमें एक लाख श्लोक हैं। एक लाख श्लोक किसको कहते हैं? चारों वेदों को मिला कर पांचवीं बना कर उतना बड़ा एक किताब है। क्या नाम है महाभारत? महाभारत भी एक काम टेढ़ा है, फिर इसको भी निशाना बनाया गया। उसके 18 पुराण बनाए गए और 18 पुराणों को अगर हम वेदों की तुलना करना शुरू कर दें, तो मैं समझता हूं कि वेदों से 100 गुना, 100 गुना उको होना चाहिए, जिनको 18 पुराण कहते हैं।
पंडित श्रीराम शर्मा आचार्य
अखण्ड-ज्योति से
इन दोनों की सफलता का श्रेय समर्पित प्रतिभाओं को ही दिया जाता है। वे अपने आप ही नहीं उपज पड़ी थीं, वरन किन्हीं चतुर चितेरों द्वारा गढ़ी गई थीं। अपने को कुछ बना लेना एक बात है, किन्तु अपने समकक्ष सहधर्मी-सहकर्मी विनिर्मित कर देना सर्वथा दूसरी। ऐसी संस्थापनाएँ यदा-कदा ही कोई विरले कर पाते है। उन्हीं को देखकर सर्वसाधारण को यह अनुभव होता है कि परिष्कृत व्यक्तित्वों की कार्य क्षमता किस स्तर की कितनी सक्षम होती है और वह जनमानस के उलटी दिशा में बहते प्रवाह को किस सीमा तक उलट सकने में समर्थ होती है।
कई सोचते है कि वर्तमान विभूतियाँ सफलताएँ गुरु जी-माताजी की प्रचण्ड जीवन साधना और प्रबल पुरुषार्थ को दिशाबद्ध रखने का प्रतिफल है। जबकि बात दूसरी है। शरीर ही प्रत्यक्षतः सारे क्रियाकृत्य करते दीखता है, पर सूक्ष्मदर्शी जानते है कि यह उसके भीतर अदृश्य रूप से विद्यमान प्राण चेतना का प्रतिफल है। जिन्हें मिशन के सूत्र संचालक की सराहना करने का मन करें उन्हें एक क्षण रुकना चाहिए और खोजना चाहिए कि क्या एकाकी व्यक्ति बिना किसी अदृश्य सहायता के लंका जलाने, पहाड़ उखाड़ने और समुद्र लाँघने जैसे चमत्कार दिखा सकता है। उपरोक्त घटनाएँ हनुमान के शरीर द्वारा भले ही सम्पन्न की गई हो; पर उनके पीछे राम का अदृश्य अनुदान काम कर रहा था। निजी रूप से तो हनुमान वही सामान्य वानर थे जो बालि के भय से भयभीत जान बचाने के लिए छिपे हुए सुग्रीव की टहल चाकरी करते थे और राम-लक्ष्मण के उस क्षेत्र में पहुँचने पर वेष बदल कर नव आगन्तुकों की टोह लेने पहुँचे थे।
बीज के वृक्ष बनने का चमत्कार सभी देखते है, पर अनेक बार क्षुद्र को महान, नर को नारायण, पुरुष को पुरुषोत्तम बनते भी देखा जाता है। ऐसे कायाकल्पों में किसी अदृश्य सत्ता की परोक्ष भूमिका काम करती पाई जाती है। शिवाजी और चन्द्रगुप्त किन्हीं अदृश्य सूत्र संचालकों के अनुग्रह से वैसा कुछ करने में समर्थ हुए, जिसके लिए उन्हें असाधारण श्रेय और यश मिला। विवेकानन्द की कथा-गाथा भी ठीक ऐसी ही है।
.... क्रमशः जारी
पं श्रीराम शर्मा आचार्य
अखण्ड ज्योति जनवरी पृष्ठ 28
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