Friday 23, January 2026
None None, None None
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SHRAVAN
पितु-मातु सहायक स्वामि सखा, तुम ही एक नाथ हमारे हो | Pitu Matu Sahayak Swami Sakha Tumhi Ek Nath
अमृत सन्देश:- बाह्य सुंदरता, आतंरिक चेतना से है | Bahari Sundarta Antarik Chetna Se Hai
गायत्रीतीर्थ शांतिकुंज, नित्य दर्शन
आज का सद्चिंतन (बोर्ड)
आज का सद्वाक्य
नित्य शांतिकुंज वीडियो दर्शन
!! शांतिकुंज दर्शन 24 January 2025 !! गायत्री तीर्थ शांतिकुञ्ज हरिद्वार !!
आपसे मेरी व्यक्तिगत अपील
परम् पूज्य गुरुदेव का अमृत संदेश
आपसे व्यक्तिगत अपील है मेरी, कि आप व्यक्तिगत रूप से, अकेले, एकाकी बिना किसी की सहायता और अपेक्षा के पहले हमने स्वाध्याय मंडल बनाए थे, उसमें उसमें यह शर्त थी, की पांच सहयोगी इकट्ठे कर लीजिए, अब इसमें क्या शर्त है? अब कोई शर्त नहीं है। आप अकेले काम कीजिए बस, अकेले काम कीजिए, अकेले काम कर सकेंगे, तो आप हीरो के हार हो जाएंगे, हीरो का हार पहन कर के, अपनी छाती से लगाए रहेंगे आपको, अपने कलेजे से लगाए रहेंगे आपको, आपको भूल जाएंगे, अरे हम संभाल कर रखेंगे बाबा,रात को कोई चोर, चुरा ले गया तो कैसे हो जाएगा? इसको हम तिजोरी में रखेंगे, लाकर में रखेंगे, बहुत साफ करके रखेंगे, इसको इसका दिन-रात ध्यान रखेंगे, इतना हीरे हमारे पास, हीरे की अंगूठी होती है। तो आदमी ध्यान रखते हैं। हीरे के क्या नाम है? नाक की लोंग औरतों के पास होती है, उसका ध्यान रखती हैं। हर वक्त वही ध्यान आती रहती हैं, और आप हीरे अगर हमारी निगाह में रहेंगे,हमारे सामने रहेंगे, तो आप को हम याद नहीं करगें, आपको संभालेंगे नहीं, आपके लिए कुछ देंगे नहीं, फिर आपके लिए भी कुछ देंगे, हमारे पास कुछ चीजें हैं, हम बहुत दिन से तलाश करते फिर रहे हैं।
पहले भी हमने दिया है लोगों को, पर क्या दिया है? किसी को बेटा दे दिया, किसी का मुकदमा जितवा दिया, किसी का खांसी दूर कर दी, अरे तो बाबा इससे क्या, क्या बना कुछ, कुछ बना क्या? इससे क्या बना? दो वर्ष पहले मर जाता तो क्या? नौकरी में तरक्की करा दी, अगर आपको ₹100 ज्यादा हो गए, 100 कम मिलते तो, जिंदा रहते,कि नहीं रहते, और गरीब लोग दुनिया में जिंदा है कि नहीं, जिंदा है वह तो मखोल था। जो आपको दिया। और जो आपने लिया अब तक हमसे, वही दिल्लगीबाजी थी।
अखण्ड-ज्योति से
स्फटिक मणि को रंगीन मकान में रख दिया जाय या उसके निकट कोई रंगीन पदार्थ रख दिया जाय तो वह मणि भी रंगीन छाया के कारण रंगीन ही दिखाई पड़ने लगती है। परन्तु यदि उन कारणों को हटा दिया जाय तो वह शुद्ध निर्मल एवं स्वच्छ रूप में ही दिखाई देती है। इसी प्रकार नारी जब बुरी परिस्थिति में पड़ी होती है तब वह बुरी, दोषयुक्त दिखाई पड़ती है परन्तु जैसे ही उस परिस्थिति का अन्त होता है वैसे ही वह निर्मल एवं निर्दोष हो जाती है।
नारी लक्ष्मी का साक्षात अवतार है। भगवान् मनु का कथन पूर्ण सत्य है कि जहाँ नारी का सम्मान होता है वहाँ देवता निवास करते हैं अर्थात् सुख शान्ति के समस्त उपकरण उपस्थित रहते हैं। सम्मानित एवं सन्तुष्ट नारी अनेक सुविधाओं तथा सुव्यवस्थाओं का केन्द्र बन जाती है। उसके साथ गरीबी में भी अमीरी का आनन्द बरसता है। धन दौलत निर्जीव लक्ष्मी है। किन्तु स्त्री तो लक्ष्मी जी की सजीव प्रतिमा है उसके प्रति समुचित आदर का, सहयोग का एवं सन्तुष्ट रखने का सदैव ध्यान रखा जाना चाहिए।
नारी में नर की अपेक्षा सहृदयता, दयालुता, उदारता, सेवा, परमार्थ एवं पवित्रता की भावना अत्यधिक है। उसका कार्यक्षेत्र संकुचित करके घर तक ही सीमाबद्ध कर देने के कारण ही संसार में स्वार्थपरता, हिंसा, निष्ठुरता, अनीति एवं विलासिता की बाढ़ आई हुई है। यदि राष्ट्रों का सामाजिक और राजनैतिक नेतृत्व नारी के हाथ में हो तो उसका मातृ हृदय अपने सौंदर्य के कारण सर्वत्र सुख शान्ति की स्थापना कर दे।
नारी के द्वारा अनन्त उपकार एवं असाधारण सहयोग प्राप्त करने के उपरान्त नर के ऊपर अनेक पवित्र उत्तरदायित्व आते हैं, उसे स्वावलम्बी, सुशिक्षित, स्वस्थ, प्रसन्न एवं सन्तुष्ट बनाने के लिए नर को सदैव प्रयत्नशील रहना चाहिए। मारना पीटना, अपमानजनक व्यवहार करना, हीन दृष्टि से देखना, उसे अपनी सम्पत्ति समझना सर्वथा अधार्मिक व्यवहार है ऐसा गायत्री के ‘रे’ अक्षर में स्पष्ट किया गया है।
नारी के स्वाभाविक असाधारण गुणों के कारण यही सम्भावना सदा ही बनी रहती है उसके छोटे मोटे दोषों को आसानी से सुधारा जा सकता है। गाय में दैवी तत्व अधिक होने से उसे अवध्य माना गया है। ब्राह्मण को सताना अन्य जीवों को सताने की अपेक्षा अधिक पाप है। इसी प्रकार नारी और बालक को भी गौ ब्राह्मण की तुलना में रखा गया है। बच्चों से कोई गलती हो या उसके स्वभाव में कोई दोष हो तो उसके प्रति क्षमा, उदारता और वात्सल्य पूर्ण तरीकों से ही सुधारा जाता है।
कोई सहृदय अभिभावक अपने पथभ्रष्ट बालक के प्रति प्रतिहिंसा का भाव नहीं रखता और न उसे सताने या पीड़ित करने का भाव मन में लाता है, हमारी यही भावना नारी के प्रति होनी चाहिये। क्योंकि मुद्दतों से नारी जाति जिन परिस्थितियों में रहती आ रही है उन्होंने उसे भी बौद्धिक दृष्टि से एक प्रकार का बालक ही बना दिया है। नारी पर हाथ उठाना कायरता का लक्षण माना गया है। उसके स्त्रीधन का अपहरण करना, उसकी प्रतिष्ठा को नष्ट करना या घातक आक्रमण करना तो अत्यन्त ही निकृष्ट कोटि का, पुरुषत्व को कलंकित करने वाला कुकृत्य है।
आज नारी जाति में भी जहाँ तहाँ चरित्र दोष, कटु व्यवहार आदि बुराइयाँ दृष्टिगोचर होने लगी हैं। इसमें प्रधान दोष उन परिस्थितियों का है जो उनमें यह विकार पैदा करती हैं। पुरुष समाज चारित्रिक दृष्टि से नारी की अपेक्षा हजार गुना अधिक पतित है उसी की छाया से नारी भी अपवित्र बनती है तब लोग उन कारणों तथा पुरुषों का तो दोष नहीं देखते बेचारी बालबुद्धि नारी पर बरस पड़ते है और उस पर अमानुषिक अत्याचार करते हैं इस प्रक्रिया से अविश्वास, असन्तोष, कटुता, द्वेष, पाप और प्रतिहिंसा की ही वृद्धि होती है। इन तत्वों को पारिवारिक जीवन में बढ़ाने वाले लोग अपना और समाज का अहित ही करते हैं।
स्त्री को जीतने और सुधारने का एकमात्र अस्त्र उनके प्रति गहरी ममता, आत्मीयता, उदारता, करुणा, एवं हित कामना ही है। जिसके मन में यह भावना होंगी वह नारी की बुरी से बुरी आदतों को स्वल्प प्रयास से दूर करके उसके पूर्ण अनुकूल एवं उपयोगी बना सकेगा। इसके विपरीत जो उससे विरानेपन का, बदले का, अनुदारता का, स्वामित्व का एवं उसकी कमजोरों से नाजायज लाभ उठाने का प्रयत्न करते हैं वे उसे कदापि नहीं सुधार सकते हैं और वरन् ऐसे प्रयत्नों से उलटा विद्वेष बढ़ाते हैं और अपने भविष्य को अन्धकारमय बना लेते हैं।
अखण्ड ज्योति 1952 फरवरी, पृष्ठ 2
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