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Sunday 23, March 2025

कृष्ण पक्ष दशमी, चैत्र 2025




पंचांग 24/03/2025 • March 24, 2025

चैत्र कृष्ण पक्ष दशमी, कालयुक्त संवत्सर विक्रम संवत 2082, शक संवत 1946 (क्रोधी संवत्सर), फाल्गुन | दशमी तिथि 05:05 AM तक उपरांत एकादशी | नक्षत्र उत्तराषाढ़ा 04:26 AM तक उपरांत श्रवण | परिघ योग 04:44 PM तक, उसके बाद शिव योग | करण वणिज 05:28 PM तक, बाद विष्टि 05:05 AM तक, बाद बव |

मार्च 24 सोमवार को राहु 07:51 AM से 09:21 AM तक है | 10:24 AM तक चन्द्रमा धनु उपरांत मकर राशि पर संचार करेगा |

 

सूर्योदय 6:20 AM सूर्यास्त 6:26 PM चन्द्रोदय 2:48 AM चन्द्रास्त 12:58 PM अयन उत्तरायण द्रिक ऋतु वसंत

 

  1. विक्रम संवत - 2082, कालयुक्त
  2. शक सम्वत - 1946, क्रोधी
  3. पूर्णिमांत - चैत्र
  4. अमांत - फाल्गुन

तिथि

  1. कृष्ण पक्ष दशमी   - Mar 24 05:38 AM – Mar 25 05:05 AM
  2. कृष्ण पक्ष एकादशी   - Mar 25 05:05 AM – Mar 26 03:45 AM

नक्षत्र

  1. उत्तराषाढ़ा - Mar 24 04:18 AM – Mar 25 04:26 AM
  2. श्रवण - Mar 25 04:26 AM – Mar 26 03:49 AM


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बन्धनों से प्रीति कैसी? बन्धनों से प्रीति कैसी?, Bandhano Se Priti Kais | Mata Bhagwati Devi Bhajan

बन्धनों से प्रीति कैसी? बन्धनों से प्रीति कैसी?, Bandhano Se Priti Kais | Mata Bhagwati Devi Bhajan

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 गायत्री माता का ध्यान क्यों महत्वपूर्ण है ? Gayatri Mata Ka Dhyan Mehtavpurn Kyun Hai

गायत्री माता का ध्यान क्यों महत्वपूर्ण है ? Gayatri Mata Ka Dhyan Mehtavpurn Kyun Hai

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गायत्रीतीर्थ शांतिकुंज, नित्य दर्शन

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गायत्री माता - अखंड दीपक
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चरण पादुका
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चरण पादुका
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सजल श्रद्धा - प्रखर प्रज्ञा (समाधि स्थल)
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प्रज्ञेश्वर महादेव - देव संस्कृति विश्वविद्यालय
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शिव मंदिर - शांतिकुंज
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हनुमान मंदिर - शांतिकुंज
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आज का सद्चिंतन (बोर्ड)

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आज का सद्वाक्य

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नित्य शांतिकुंज वीडियो दर्शन


!! आज के दिव्य दर्शन 24 March 2025 !! !! गायत्री तीर्थ शांतिकुञ्ज हरिद्वार !!

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!! परम पूज्य गुरुदेव पं श्रीराम शर्मा आचार्य जी का अमृत सन्देश !!

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परम् पूज्य गुरुदेव का अमृत संदेश



एक बार असली रुद्राक्ष की माला थी मेरे पास, कोई दे गया था, कहां से न जाने। एक व्यक्ति आए, किसी ने बता दिया, "इनको गुरुजी के पास असली रुद्राक्ष की माला है, इसीलिए सारे करामात इनके पास हैं, सारी सिद्धियां असली रुद्राक्ष की माला में निकलती हैं।" बार-बार आते और ये कहते, "गुरुजी, इंदिरा गांधी नेपाल गईं थीं, तो एक असली रुद्राक्ष उनको मिल गया था, बस उसी से प्रधानमंत्री बन गईं, उसी से उनको सिद्धि चमत्कार आ गईं।" मैंने कहा, "भाई, हो जाता है, हो भी सकता है, मुझे मालूम नहीं है।"
"नहीं महाराज जी, कहीं असली रुद्राक्ष की माला किसी को मिल जाए, तो बस सब कुछ हो जाता है।" तो मैंने कहा, "बेटे, कैसे हो जाता है, बता।" "महाराज जी, आपके बारे में मुझे सब बता रहे थे, आप गए थे हिमालय तो असली रुद्राक्ष की माला लेने, फिर क्या हुआ? असली रुद्राक्ष की माला आपके पास आ गई, तो सब सिद्धियां आपके पास आ गईं। ऐसे ही एक दाना हमको भी कहीं से मिल जाए, तो फिर बड़ा अच्छा हो, कैसे असली रुद्राक्ष की माला का।"
फिर आए दूसरे दिन, फिर वो यहां-वहां की बात करने के बाद, फिर वही माला रुद्राक्ष की माला। मैं समझ गया, इनका मतलब यह है कि असली रुद्राक्ष की माला जो मेरे पास है, मैं इन्हें दे दूं। ये मतलब है। तो बेटा, देख, ऐसा है, तेरा असली रुद्राक्ष की माला पे ज्यादा विश्वास है, और मेरा पास फिर कहीं से आ जाएगी, न हो जाएगी, तो मैं अपने ऐसे गिन लूंगा, उंगलियों पे राम नाम गिन लूंगा।
"तू यह मेरी ले माला।" "हां, हां महाराज जी, फिर आपके पास से तो लक्ष्मी चली जाएगी और शंकर चले जाएंगे।"
"बेटा, चले जाने दे, तू तेरे घर में आ जाएंगे, तो फिर मैं बुला लूंगा। मेरे पास ठहराने का भी इंतजाम नहीं है, शंकर भगवान आएंगे तो चाय पानी का इंतजाम तो वहां हो जाएगा। तेरे घर में काम मेरा बन जाएगा, तू लेजा भाई।"
"अरे नहीं महाराज जी, ऐसे क्यों कहते हैं?"
"नहीं, तू ले जा, मैं क्या कहूं तुझे, तू ले जरूर ले जा।"
ले जाकर के बहुत दिन बाद आया। "नहीं, क्यों भाई, क्या हुआ रुद्राक्ष की माला का?"
"आ, आ महाराज जी, कोई खास बात नहीं है, पहले जैसे थे वैसे ही हैं।"

पं श्रीराम शर्मा आचार्य
 

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अखण्ड-ज्योति से



मित्रो ! तुम व्यर्थ में दूसरों के अनर्थकारी संदेशों को ग्रहण कर लेते हो। तुम वह सच मान बैठते हो, जो दूसरे कहते हैं। तुम स्वयं अपने आप को दु:खी करते हो और कहते हो कि दूसरे लोग हमें चैन नहीं लेने देते। तुम स्वयं ही दु:ख का कारण हो, स्वयं ही अपने शत्रु हो। जो किसी ने कुछ बक दिया, तुमने मान लिया यही कारण है कि तुम उद्विग्न रहते हो।

सच्चा मनुष्य एक बार उत्तम संकल्प करने के लिए यह नहीं देखता कि लोग क्या कह रहे हैं। वह अपनी धुन का पक्का होता है। सुकरात के सामने जहर का प्याला रखा गया, पर उसकी राय को कोई न बदल सका। बंदा बैरागी को भेड़ों की खाल पहना कर काले मुँह गली-गली फिराया गया, किंतु उसने दूसरों की राय न मानी।
    

 दूसरे के इशारों पर नाचना, दूसरों के सहारे पर निर्भर रहना, दूसरों की झूठी टीका-टिप्पणी से उद्विग्न होना, मानसिक दुर्बलता है। जब तक मनुष्य स्वयं अपना स्वामी नहीं बन जाता, तब तक उसका संपूर्ण विकास नहीं हो सकता। दूसरों का अनुकरण करने से मनुष्य अपनी मौलिकता से हाथ धो बैठता है।

स्वयं विचार करना सीखो। दूसरों के बहकावे में न आओ। कर्त्तव्य-पथ पर बढ़ते हुए, दूसरे क्या करते हैं, इसकी चिंता न करो। यदि ऐसा करने का साहस तुम में नहीं है, तो जीवन भर दासत्व के बंधनों में जकड़े रहोगे।

 पं श्रीराम शर्मा आचार्य

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