Sunday 26, October 2025
दुःख का कारण पाप ही नहीं है Dukh Ka Karan Pap Hi Nahin Hai, Gahana Karmano Gati
अमृत सन्देश:- मिल-जुलकर रहिए, बाँटकर खाइए । Mil-julkar Rahiye, Baantkar Khaeiye. पंडित श्रीराम शर्मा आचार्य
गायत्रीतीर्थ शांतिकुंज, नित्य दर्शन
आज का सद्चिंतन (बोर्ड)
आज का सद्वाक्य
नित्य शांतिकुंज वीडियो दर्शन
!! प्रज्ञेश्वर महादेव मंदिर #Prageshwar_Mahadev 26 October 2025 !!
!! महाकाल महादेव मंदिर शांतिकुञ्ज हरिद्वार 26 October 2025 !!
!! सप्त ऋषि मंदिर गायत्री तीर्थ शांतिकुञ्ज हरिद्वार 26 October 2025 !!
!! शांतिकुंज दर्शन 26 October 2025 !! गायत्री तीर्थ शांतिकुञ्ज हरिद्वार !!
!! देवात्मा हिमालय मंदिर Devatma Himalaya Mandir गायत्री तीर्थ शांतिकुञ्ज हरिद्वार 26 October 2025 !!
!! परम पूज्य गुरुदेव का कक्ष गायत्री तीर्थ शांतिकुञ्ज हरिद्वार 26 October 2025 !!
!! अखण्ड दीपक #Akhand_Deepak (1926 से प्रज्ज्वलित) चरण पादुका गायत्री तीर्थ शांतिकुञ्ज हरिद्वार 26 October 2025 !!
!! #गायत्री_माता_मंदिर #Gayatri_Mata_Mandir गायत्री तीर्थ शांतिकुञ्ज हरिद्वार 26 October 2025 !!
अमृतवाणी:- जो तुम करोगे वही लौटेगापं श्रीराम शर्मा आचार्य जी
परम् पूज्य गुरुदेव का अमृत संदेश
देने की वृत्ति जिस दिन हमारे भीतर आ जाती है, उस दिन भक्ति हमारे भीतर आ जाती है।
भगवान के प्रति जब जाते हैं, और यह पूछते हैं कि आप आज्ञा दीजिए, हम क्या दें आपको?
बेटे, भगवान यह कहता है — आपको देने की जरूरत नहीं है, हम आपको देंगे।
मैंने भगवान के दो नाम पसंद किए हैं, और वो दोनों नाम मुझे बहुत प्यारे हैं, और मुझे मालूम पड़ता है वो दोनों नाम सही हैं।
कौन-कौन से?
एक का नाम है — प्रतिछाया, और एक का नाम है — प्रतिध्वनि।
प्रतिछाया क्या?
प्रतिछाया बेटे, शीशे को कहते हैं।
शीशा सामने रख लेते हैं, शीशे में हम जैसी अपनी शक्ल बनाते हैं, वैसे ही दिखाई पड़ता है।
भाई साहब, नमस्कार।
आईना के सामने से कहता है — नमस्कार, मार दूंगा घूँसा, अभी ठीक करूंगा।
शीशा बोलेगा — मार दूंगा घूँसा।
जब निकालते हैं जीभ, वो भी निकाल देता है शीशे वाला।
जीभ, जीभ आप दिखाते हैं, वो भी दिखाता है।
यह क्या चक्कर है?
भगवान बेटे बिल्कुल भगवान बिल्कुल ऐसा ही है।
जैसे हम भगवान कैसा हो सकता है?
जैसे आप बिल्कुल ऐसा आपके लिए कैसा सलूक करेगा?
जैसे आप भगवान के लिए करते हैं।
इसलिए यह क्या हो गया?
इसका नाम है — दर्पण।
दिल के आईने में है तस्वीर।
ए यार, जरा गर्दन उठाई देख ली।
जैसे भी कुछ है, बिल्कुल दर्पण हैं हमारे लिए।
और कौन है?
और है बेटा — प्रतिध्वनि।
प्रतिध्वनि किसे कहते हैं?
गुंबज की आवाज को उसको कहते हैं — ईको।
ईको क्या होती है?
ईको बेटे कहते हैं — प्रतिध्वनि को।
बड़े-बड़े गुंबज होते हैं, उसमें आवाज आते हैं — जय हो, जय हो।
बेवकूफ, बेवकूफ कौन कहता है?
वो गुंबज कहता है।
मुझसे भगवान कौन है?
गुंबज भगवान से हम यह कहते हैं — लाइये... लाइये... यहाँ देने को कुछ नहीं है।
यह देने को कुछ नहीं है।
और जब हम अपनी आवाज बदल देते हैं, तब जब हम यह कहते हैं — हम आपकी आज्ञा से चलेंगे।
तो वो गुंबज कहता है — हम आपकी आज्ञा से चलेंगे।
और जब हम यह कहते हैं — हमारी कामना खत्म हो गई, और हम आपकी मर्जी पर चलेंगे, और हम आपके हैं।
तो भगवान यह कहता है — आपकी मर्जी पर चलेंगे, और हम आपके हैं।
भगवान यह कहता है — मित्रो!
भगवान चौराहे पर बिक्री के लिए खड़ा हुआ है, और यह पूछता है — आप में से कोई खरीदना चाहे तो खरीद लीजिए।
आप में से कोई हमको खरीदना चाहे तो खरीद लीजिए।
राजा हरिश्चंद्र बिके थे चौराहे पर खड़े होकर, और कीमत देकर।
हम भी खरीद लेंगे आपको, और कीमत देकर।
पंडित खरीद लेंगे।
भगवान चौराहे पर खड़ा हुआ है, और यह कहता है — आप में से कोई आदमी मुझें खरीदने का इच्छुक हो, तो आप खरीद सकते हैं।
भगवान बिकाऊ खड़ा हुआ है।
क्या कीमत हो सकती है?
बेटे, एक ही कीमत है — आप अपने आपको भगवान के हाथों बेच दीजिए।
परम पूज्य गुरुदेव पं श्रीराम शर्मा आचार्य
अखण्ड-ज्योति से
“तुम्हारे पाँव के नीचे दबी चींटी का वही हाल होता है, जो यदि तुम हाथी के नीचे दब जाओ तो तुम्हारा हो। दूसरे के दुख को अपने दुख से तुलना किये बिना, हम उसकी प्रकृत अवस्था का ज्ञान प्राप्त नहीं कर सकते।”
किसी बादशाह को ऐसा भयंकर रोग था, जिसका यहाँ वर्णन करना उचित नहीं है। कई यूनानी हकीमों ने मिल कर यह राय ठहराई कि एक खास तरह के आदमी के पीत के सिवाय इस बीमारी का और इलाज नहीं है। बादशाह ने इस तरह के आदमी की तलाश करने का हुक्म दिया। लोगों ने एक किसान के लड़के में वह सब गुण मौजूद पाये। बादशाह ने उस लड़के के माँ-बाप को बुलवाया और उन्हें बहुत सा इनाम देकर राजी कर लिया। काजी ने यह फैसला किया कि बादशाह को बीमारी से आराम करने के लिए एक रिआया का खून बहाना न्याय संगत है। जब जल्लाद ने उसे मारने की तैयारी की, तब वह बालक आकाश की ओर देख कर हँसा।
बादशाह ने उस बालक से पूछा, “इस अवस्था में ऐसी क्या बात हुई, जिससे तुझे खुशी हुई? “उसने जवाब दिया “बालक माँ-बाप के प्रेम पर निर्भर रहते हैं, मुकदमों का समावंश काजी करता है। मेरे माता-पिता की मति थोथे साँसारिक लोभ से भ्रष्ट हो गई है कि मेरा खून बहाने पर राजी हो गये हैं। काजी ने मुझे प्राण दण्ड की सजा दे दी है और बादशाह, अपनी स्वास्थ्य-रक्षा के लिये, मेरी मृत्यु पर राजी हो गये हैं। ऐसी दशा में, अब ईश्वर के सिवाय किसकी शरण जाऊं? “बादशाह इस बात को सुनकर बहुत ही दुखी हुये और आंखों में आंसू भर कर बोला, “निर्दोष मनुष्य का खून बहाने की अपेक्षा मेरा ही मर जाना अच्छा है।” बादशाह ने उस बालक के सिर और आंखें चूम कर गले से लगाया और उसको बहुत सा इनाम देकर छोड़ दिया।
लोग कहते हैं, कि बादशाह उसी सप्ताह रोग मुक्त हो गया। इस किस्से से ठीक मेल खाता हुआ एक पद मुझे याद पड़ता है। फलीवान महावत ने नील नदी के किनारे सुनाया था, “अगर तुम्हें अपने पैर के नीचे दबी हुई चींटी की अवस्था का ज्ञान हो, तो तुमको समझना चाहिए कि चींटी की वैसी हालत है जैसी हाथी के पैर के नीचे दबने पर तुम्हारी हो।”
तात्पर्य यह है कि हमें सब जीवों को अपने समान समझना चाहिये। दूसरों को कष्ट न पहुँचाते समय इस बात का ख्याल रखना चाहिये, कि यदि हमें कोई ऐसा ही कष्ट दे तो हमें कैसा दुख होगा।
अखण्ड ज्योति 1951 मई
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