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Saturday 25, October 2025

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अमृत सन्देश:-  बंधन तोड़ो, जीवनमुक्त बनो | Bandhan Todo, Jivanmukt Bano पंडित श्रीराम शर्मा आचार्य

अमृत सन्देश:- बंधन तोड़ो, जीवनमुक्त बनो | Bandhan Todo, Jivanmukt Bano पंडित श्रीराम शर्मा आचार्य

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 जीवन का उद्देश्य क्या है | Jeevan Ka Uddeshya Kya Hai | Dr Chinmay Pandya, Rishi Chintan

जीवन का उद्देश्य क्या है | Jeevan Ka Uddeshya Kya Hai | Dr Chinmay Pandya, Rishi Chintan

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गायत्रीतीर्थ शांतिकुंज, नित्य दर्शन

गायत्री माता
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गायत्री माता - अखंड दीपक
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चरण पादुका
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चरण पादुका
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प्रज्ञेश्वर महादेव - देव संस्कृति विश्वविद्यालय
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शिव मंदिर - शांतिकुंज
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हनुमान मंदिर - शांतिकुंज
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आज का सद्चिंतन (बोर्ड)

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आज का सद्वाक्य

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नित्य शांतिकुंज वीडियो दर्शन


!! शांतिकुंज दर्शन 25 October 2025 !! गायत्री तीर्थ शांतिकुञ्ज हरिद्वार !!

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अमृतवाणी:- सच्चे प्रेम का सिद्धांत क्या है_ पं श्रीराम शर्मा आचार्य जी

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परम् पूज्य गुरुदेव का अमृत संदेश



मित्रों, भक्त की मनोकामना इसी प्रकार की होती है भगवान के लिए कि — आप क्या कर सकते हैं?
जिसको हम प्यार करते हैं, भक्ति मीन्स प्यार।
और प्यार का सिद्धांत क्या है?
प्यार का सिद्धांत सिर्फ एक है।
प्यार का सिद्धांत एक है — प्यार करने वाला दिया करता है।
प्यार करने वाला क्या दे सकता है?
प्यार करने वाला सिर्फ एक काम कर सकता है — वो है प्यार।
हम आपको प्यार करते हैं, हम आपको प्यार करते हैं, हम आपको प्यार करते हैं।
इसलिए हमारे ऊपर कर्तव्य और फर्ज की जिम्मेदारी आती है।
क्यों?
हम दुख देंगे?
हमारे पास क्या है?
जो भी हो बेटे, हम नहीं जानते हमारे पास क्या है।
कुछ होगा तो हम दिए बिना रह नहीं सकते।
क्यों?
क्योंकि हम आपको प्यार करते हैं।
प्यार करते हैं।
प्यार हमेशा देना माँगता है।
लेने की बात नहीं बन सकती।
ले नहीं सकते।
किसी लड़की से प्यार करते हैं?
लड़की से प्यार करते हैं, तो आप उसको अच्छे नंबरों से उत्तीर्ण कराने के लिए किताबें लाकर दीजिए।
किताबें लाकर दे दिया कीजिए।
जब उसकी ब्याह-शादी का समय आए, तब आप यह तलाश कीजिए — उसका बाप बेचारा गरीब है, आपका कोई मित्र है — उसको ऐसी जगह पर ब्याह-शादी करा दीजिए जहाँ कम पैसे में अच्छे घर में जा पहुँचे।
आप उसकी मदद कीजिए।
उसकी ख्याति, यश, कीर्ति को सुरक्षित रखें।
जो आपका कीर्ति, यश, गरिमा प्राप्त करते हैं — आप यह कहते हैं इससे हमारी मित्रता है?
मित्रता नहीं है आपकी।
ऐसी मित्रता तो भेड़िए में और खरगोश के बच्चे में भी होती है।
भेड़िया उससे बात कीजिए — "खरगोश के बच्चे तो बहुत प्यारे लगते हैं।"
और करते क्या हैं?
उनको बस... आप तो समझते नहीं,
जो भी खरगोश का बच्चा मिलता है — खट! खा जाते हैं।
अच्छा, आपको क्या अच्छा लगता है?
हमको जलेबी अच्छी लगती है।
आप क्या करते हैं जलेबियों का, गुरूजी?
जैसे ही मिलती है — गप! खा जाते हैं।
अच्छा, आपको क्या अच्छा लगता है?
हमको पानी का गोलगप्पा अच्छा लगता है।
करते क्या हैं?
आजकल पानी के गोलगप्पे से बड़ा प्यार है।
हमको प्यार तो है,
पर आप पानी के गोलगप्पे का करते क्या हैं?
बस पानी में डुबोया, उठाया और गप! पेट में लिया।
यह कैसा प्यार हुआ?
यह कैसा प्यार हुआ?
और भगवान?
भगवान क्या है? पानी का गोलगप्पा?
गप!
भगवान क्या है? जलेबी?
गप!
भगवान क्या है? खरगोश का बच्चा?
गप!
यह कैसा प्यार हुआ?
प्यार में सिर्फ एक ही चीज रहती है — देना, देना, देना।
भगवान को सबके सम्मुख आपने आपको पेश करते हैं और पूछते हैं —
"हे! प्रियतम, हम आपको देंगे।"
"हम आपको देंगे।"
नाचीज हैं।
हम नहीं जानते।
छोटे हैं।
हम जानते हैं।
हम आपको देंगे।

परम पूज्य गुरुदेव पं श्रीराम शर्मा आचार्य 

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अखण्ड-ज्योति से



विनोद-हास्य की आदत प्रकृति की अमूल्य देन है। साधकों को आध्यात्मिक मार्ग में आगे बढ़ने में यह सहायता करती है, यह मन की खिन्नता को दूर करती है और मनुष्य को प्रसन्न रखती है। यह दूसरों को भी प्रफुलित और आनन्दित करती है। परन्तु आपको ऐसा हास्य कभी नहीं करना चाहिए जिससे दूसरों को दुःख हो। आपका हास्य ऐसा होना चाहिए। जिससे दूसरों को शिक्षा और सुधार का अवसर मिले। आपका हास्य आध्यात्मिक उपदेश का भी काम करे। मनुष्य को हल्की मधुर हँसी हँसना चाहिए। उजड्डेपन की ठेकेदार असभ्य हँसी से बचना चाहिये । इस से साधक की आध्यात्मिक उन्नति रुक जाती हैं। मन की गम्भीरता नष्ट हो जाती है। महात्मा अपने नेत्रों में ही मुस्कराते और हंसते है जो वास्तव में महत्वपूर्ण आकर्षक होता है। बुद्धिमान साधक ही इसको समझ सकते है। बालकों जैसे छिछोरे और मूर्ख मत बनो।

थोड़ी सी भी उद्विग्नता और चिड़चिड़ेपन का मन पर और सूक्ष्म शरीर पर बड़ा प्रभाव पड़ता है। साधकों को अपने चित्त में इस प्रकार की कुवृत्तियाँ प्रकट नहीं होने देना चाहिए। यदि आप इनकी ओर से कुछ भी असावधान हुए तो फिर यही वृत्तियाँ भयंकर क्रोध का रूप किसी समय भी धारण कर ले सकती है। उन्हें अंकुरित होते ही क्षमा, प्रेम और सहानुभूति के द्वारा मसल डालना चाहिए। मन में तनिक भी अशान्ति नहीं होनी चाहिए। मन को बिल्कुल शान्त और स्थिर रहना चाहिये। तब ही ध्यान सम्भव है।

जिस प्रकार शैतान घोड़ा सवार को अपने ही साथ कुपथ की ओर ले जाता है उसी प्रकार क्रोध का वेग भी इस संयम रहित शुद्ध जीव को क्रोध वेश में पथ भ्रष्ट कर देता है। वह क्रोध का शिकार ही बन जाता है। जिस प्रकार कुशल घुड़सवार घोड़े काबू रखता हुआ निरापद अपने निर्दिष्ट स्थान पर पहुँच जाता है। उसी प्रकार आत्मसंयमी मनुष्य क्रोधावेश को दबाकर शान्ति प्राप्त करता है। और जीवन के लक्ष्य को पहुँच जाता है।

भयंकर क्रोध-वेश से स्थूल शरीर की नाड़ी मण्डलियाँ छिन्न-भिन्न हो जाती हैं। और सूक्ष्म शरीर पर इसका बड़ा गहरा स्थायी प्रभाव पड़ता है। सूक्ष्म शरीर से काले-काले तीर के समान ये लहरे निकला करती हैं। जिन परमाणुओं ने स्पेन का फ्लू पैदा किया था वे भले नष्ट हो जायें परन्तु अनेक देशों में दीर्घ काल तक उनका कार्यरूप इन्फ्लुएंजा जारी रहेगा। इसी प्रकार मन में क्रोध का प्रभाव भले ही थोड़ी देर में शान्त हो जाये परन्तु लिंग शरीर में इसका असर कई दिनों बल्कि सप्ताहों तक बना रहता है। थोड़ा सा भी उद्वेग जो मन में पाँच मिनट रहे तो लिंग शरीर में दो तीन दिन के लिए उसका प्रभाव बना रहता है। भयंकर क्रोध का आक्रमण शरीर में अत्यधिक सूजन पैदा कर देगा। जिससे लिंग शरीर में एक जख्म पैदा हो जायगा जो कई महीनों में अच्छा होगा। क्या अब आपने क्रोध का विनाशकारी परिणाम समझ लिया। क्रोध के शिकार मत बनें। इसे क्षमा, प्रेम दया सहानुभूति, विचार और दूसरों के विचारों का आदर करके दमन करो।

चिन्ता, खेद, अपवित्र विचार, क्रोध या घृणा, मन या लिंग शरीर पर एक प्रकार की काली तह जमा देते हैं। यह काली तह का आवरण सद्गुणों का लाभकारी प्रभाव अन्दर प्रवेश नहीं होने देती और असद्गगुणों को अपना काम कराने में सहायक बनी रहती है। चिन्ता मन और सूक्ष्म शरीर को बड़ी हानि पहुँचाती है। चिन्ता करने से शक्ति क्षीण हो जाती है। और कुछ लाभ होता नहीं बड़ी कुशलतापूर्वक आत्म निरीक्षण द्वारा तथा मन को निरंतर ध्येय में संलग्न रखकर चिन्ता को निर्मूल करना चाहियें।

अपने प्रयत्न में कमी मत करो। दिव्य ज्योति के दीप को जलने दो। अब आप ध्येय के समीप पहुँच गये हो। अब प्रकाश मिल गया है। अथवा धैर्य पूर्ण साधन की शक्ति से अध्यात्मिक मार्ग में आपने बहुत ऊँचे-ऊँचे पर्वत पार कर लिए हैं। यह बड़ी ही सराहनीय बात है। आपने बेशक बड़ी उन्नति की है। पर अभी आपको अभी एक और चोटी पर चढ़ना है। और एक तंग घाटी में से पार होना है इसके लिये और भी धैर्यपूर्ण प्रयत्न और शक्ति की आवश्यकता है। आपके सात्विक अहंकार को भी घुला डालना होगा। सविकल्प समाधि की आनन्द पूर्ण अवस्था को भी उल्लंघन कर जाना होगा। ब्रह्माकार वृत्ति को भी समाप्त करना होगा। तभी आप निश्चय पूर्वक भूमावस्था को प्राप्त करोगे जो कि जीवन का सर्वोच्च लक्ष्य है।

अखण्ड ज्योति 1951 मई

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