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Friday 24, October 2025

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एकाग्रता की शक्ति और उसका सुनियोजन | Ekagrata Ki Shakti Aur Uska Niyojan | Pt Shriram Sharma Acharya

एकाग्रता की शक्ति और उसका सुनियोजन | Ekagrata Ki Shakti Aur Uska Niyojan | Pt Shriram Sharma Acharya

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अमृत सन्देश:-  बंधन तोड़ो, जीवनमुक्त बनो | Bandhan Todo, Jivanmukt Bano पंडित श्रीराम शर्मा आचार्य

अमृत सन्देश:- बंधन तोड़ो, जीवनमुक्त बनो | Bandhan Todo, Jivanmukt Bano पंडित श्रीराम शर्मा आचार्य

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गायत्रीतीर्थ शांतिकुंज, नित्य दर्शन

गायत्री माता
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गायत्री माता - अखंड दीपक
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चरण पादुका
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चरण पादुका
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आज का सद्चिंतन (बोर्ड)

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आज का सद्वाक्य

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नित्य शांतिकुंज वीडियो दर्शन


!! शांतिकुंज दर्शन 24 October 2025 !! गायत्री तीर्थ शांतिकुञ्ज हरिद्वार !!

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अमृतवाणी:- हमारी उपासनाएँ कैसी होनी चाहिए. पं श्रीराम शर्मा आचार्य जी

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परम् पूज्य गुरुदेव का अमृत संदेश



  हमारी उपासनाएँ कैसी होनी चाहिए?
कठपुतली जैसी होनी चाहिए।
कठपुतली अपने धागों को बाजीगर की उँगलियों के पास बाँध देती है और बाजीगर अपनी उँगलियों को चलाना शुरू करता है, तो कठपुतली ठीक उसी इशारे पर नाचना शुरू कर देती है।
दुनिया समझती है — कठपुतली कैसा बढ़िया खेल दिखाती चली जाती है, कितना बढ़िया तमाशा दिखाती चली जाती है।
वास्तव में लकड़ी के टुकड़े हैं, क्या तमाशा दिखा सकते हैं?
असल में जो तमाशा दिखाता है, बाजीगर दिखाता है, और बाजीगर और कठपुतली के बीच में जो धागे जुड़े हुए हैं, असल में करामात उनके अंदर है, ताकि बाजीगर अपनी मर्जी के मुताबिक कठपुतली को चला देता है।
आप सुपुर्द कीजिए भगवान को।
आप सुपुर्द कीजिए भगवान को और यह कहिए —
"आप अपनी मर्जी पर चलाइए, आप हुकुम दीजिए और हम आपकी आज्ञा का पालन करेंगे।"
जिस दिन आपकी यह हैसियत हो जाएगी, आप भगवान से यह कहेंगे कि —
"हम आपसे कुछ माँगने के लिए नहीं आए।
हम आपसे कुछ चाहने के लिए नहीं आए।
हम आपसे एक ही प्रार्थना करने के लिए आए हैं —
आप हमें हुकुम दीजिए और हमको आगे बढ़ाइए।"
रवींद्रनाथ टैगोर का एक बंगला गीत है, जो मुझे बहुत प्यारा और बहुत पसंद है।
वह बंगला गीत उन्होंने गाया —
"हे भगवान, हमने सुना है आप लोगों की मनोकामनाएँ पूरी किया करते हो, संपत्ति दिया करते हो।
अगर ये बात सही है तो मेरी प्रार्थना है कि आप हमको मनोकामना कभी पूरी न करें।
कोई संपत्ति न दें।"
क्यों?
अगर आप संपत्तियाँ देने लगेंगे तो हम लोगों के पुरुषार्थ खत्म हो जाएँगे।
फिर हमारा पुरुषार्थ कहाँ खुलेगा?
फिर हमको आपके स्वर्ग के सामने भिखारी होना पड़ेगा।
फिर हमको लक्ष्मी का उपार्जन करने के लिए, और पौरुष को जगाने के लिए, जो हमारे अंदर क्षमता का विकास करता है — वह माद्दा खत्म हो जाएगा और हम घाटे में रहेंगे।
आप वस्तु दे देंगे, लेकिन हमारा दिवाला निकाल लेंगे और हमारा पुरुषार्थ खत्म कर देंगे।
इसलिए, अगर आपको ये आदत हो कि आप लोगों को लक्ष्मी देते हो, तो हमको मत देना।
और रविंद्रनाथ टैगोर ने गाया —
"हमने सुना है कि आप मुसीबतें लोगों की दूर कर देते हैं।
अगर ये बात सही हो, तो आप कृपा करके हमारी मुसीबतें मत दूर कर देना।"
क्यों?
इन मुसीबतों से टक्कर खा करके, मुसीबतों से टक्कर खा करके आदमी मजबूत बनता है।
पत्थर पर घिसा जाने के बाद, पत्थर पर घिसा जाने के बाद में फिर तलवार की नोंक तेज हो जाती है।
जितने भी दुनिया के महापुरुष हुए हैं, उनमें से प्रत्येक का यश और गौरव का इतिहास, उसकी मुसीबतों का इतिहास है।
हरिश्चंद्र का इतिहास — उसकी मुसीबतों का इतिहास है।
ध्रुव का इतिहास — उसकी मुसीबतों का इतिहास है।
जितने भी महामानव दुनिया के पर्दे पर हुए हैं — चाहे वो भक्त हुए हों या कोई भी — उन्होंने धर्म के लिए, कर्तव्यों के लिए, इतनी मुसीबतें उठाई हैं।
हम कैसे मानें आपको कि आप भक्त हैं कि नहीं?
इसीलिए रवींद्रनाथ टैगोर ने गाया —
"अगर आप ऐसे हो कि मुसीबतें दूर करते हो, तो कृपा करके हमें हमारी मुसीबत मत दूर करें।
हम अपनी मुसीबतों से टक्कर लेंगे, टक्कर लेंगे।
और टक्कर ले करके, इस जन्म में नहीं तो अगले जन्म में, हम अपने अंदर वो मजबूती और साहस पैदा कर लेंगे,
ताकि हम मुसीबतों से टक्कर ले सकें।
और जिस वजह से मुसीबतें आती हैं, उन वजहों को दूर कर लें — इतनी अक्ल हमारे अंदर आ जाएगी।"
इसलिए फिर मत करना...
जो रविंद्रनाथ टैगोर ने गाया —
"अगर आप वास्तव में ही किसी के ऊपर कृपा करते हों,
एक कृपा कर देना मेरे ऊपर —
कि जब हम पाप की पंक्ति में गिरने लगें,
तो अपनी लंबी वाली भुजाएँ फैलाना
और हमको उस पतन के गर्त में गिरने से
आप उबार लेना और बचा लेना।"
बस, इतनी कृपा आपकी बहुत है।
बाकी काम हम कर लेंगे।
बाकी हम आपकी कोई सहायता नहीं चाहते।
आप पतन और पाप के गर्त में गिरने से हमको बचा लीजिए।
बस, बस, बस, बस... काफी है। आपकी कृपा इतनी काफी है।
और हमें आपकी कृपा कोई नहीं चाहिए।

परम पूज्य गुरुदेव पं श्रीराम शर्मा आचार्य 

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अखण्ड-ज्योति से




मनुष्य के हृदय में कितनी शक्ति पड़ी है, इसका भान हमें रोज की प्रार्थना से होता है। यह एक बड़ी शक्ति है। अपने खुद पर काबू रखने की शक्ति से बढ़कर दुनियाँ में दूसरी कोई शक्ति नहीं है। दुनियाँ को जीतने वाले बड़े बहादुर कहलाये, लेकिन अपनी इन्द्रिय तथा मन को जीतने वाले, उनको वश में करने वाले वीर नहीं, महावीर कहलाये। आज दुनिया के देशों के बीच परस्पर सम्बन्ध इतना दृढ़ हो गया है कि किसी देश के मनुष्य की अच्छी कृति सीमित नहीं रहेगी, बल्कि देश देश में फैल जायेगी और अगर हम अपने पर काबू नहीं रख सकेंगे, कुछ गलत काम कर लेंगे तो वह गलती और वह पाप भी सीमित नहीं रहेगा, व्याप्त हो जायेगा ऐसी हालत में इन्द्रिय निग्रह और मनः संयम का महत्व बहुत बढ़ गया है और हरेक देश के नागरिकों और ग्रामीणों पर व्यक्तिगत और सामूहिक तौर पर बड़ी भारी जिम्मेदारी आती है।

जब मैं शाँति की बात कहता हूँ तो इसका मतलब यह नहीं कि समाज में इतने दुख होते हुए भी सहन करते चला जाना, गरीबों के प्रति सहानुभूति नहीं रखना, अड़ोसी-पड़ोसी की परवाह नहीं करना और समस्याओं के हल करने का उपाय नहीं ढूँढ़ना।

यह असम्भव वस्तु है कि समाज में अनेक प्रकार के दुख और विषमता मौजूद होते हुये भी उसके लिए कोई प्रयत्न न करें तो भी समाज में शाँति रहेगी। अगर ऐसा संभव हुआ और बुरी हालत में भी समाज शान्त रहा तो मैं उसे तमोगुणी समाज, जड़ समाज, मानवता से गिरा हुआ समाज कहूँगा। सच्चा देहाती वही है जो खुद शाँत रह कर सारे समाज के दुख निवारण के लिए सतत् प्रयत्न करता रहता है। जो सचमुच में आत्मानुभवी पुरुष होता है वह तो निरन्तर कृति करता रहता है “कहा गया है “वसन्तवल्लोकहितं चरन्तः” वह बसंत ऋतु के समान लोकहित के लिए सतत् कर्म करता रहता है। अपने लिए कुछ भी नहीं चाहता है। सेवा करने में ही समाधान चाहता है। काल की आकांक्षा नहीं रखता है और सब लोगों के दुख निवारण में मातृवत् वात्सल्य से लगा रहता है। ऐसा जो निरंतर सेवक है, वही निवृत्तमार्गी है, देहाती है। आज हिन्दुस्तान में निवृत्ति का जो गलत अर्थ किया जाता है कि ये सारे सुख-दुख मिथ्या हैं, इसलिए उनकी परवाह क्यों करते हो? हमेशा शाँत रहना चाहिए। यह तो आत्मवंचना है या प्रवंचना निवृत्ति मार्ग के शिरोमणि शंकराचार्य हिन्दुस्तान भर घूमते रहे। गाँव-गाँव और घर-घर जाकर लोगों में ज्ञान बाँटते रहे। इस तरह निरन्तर परिश्रम करके बत्तीस साल की उम्र में वे चले गये।

जहाँ समस्यायें मौजूद हैं ओर उन समस्याओं के निवारण के लिए कोशिश की जा रही है, वहीं पर शाँति की कीमत है। अगर शाँति का अर्थ यह हो कि वर्तमान ढाँचे को रखना, आज के जैसे समाज को कायम रखना तो वह शाँति बिलकुल निकम्मी है। हिन्दुस्तान में इतनी समस्यायें, दुख और विषमताएँ मौजूद हैं, तब भी मैं आपको शाँति रखने के लिए कहता हूँ तो इसका मतलब यह नहीं कि आप दुख सहन करते रहें बल्कि उसका अर्थ यह है कि आपको वीर पुरुष के समान उसका मुकाबला करना चाहिये। उन समस्याओं का निवारण शान्ति के तरीके से करना चाहिए और यह दिखा देना चाहिये कि शाँति में शक्ति पड़ी है और उससे समस्यायें हल हो सकती हैं। आज तक तो लोगों ने यही मान रखा है कि अगर शाँति है तो समस्यायें जारी रहती हैं। हल नहीं होतीं और अगर उन्हें।

 अखण्ड ज्योति 1961 फरवरी

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