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Thursday 23, October 2025

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क्या केवल अपने लिए जीना मानसिक नर्क है ? Kya Kewal Apne Liye Jina Mansik Narak Hai पंडित श्रीराम शर्मा आचार्य

क्या केवल अपने लिए जीना मानसिक नर्क है ? Kya Kewal Apne Liye Jina Mansik Narak Hai पंडित श्रीराम शर्मा आचार्य

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हारिये ना हिम्मत | Hariye Na Himmat, Lose Not Your Heart | Pt Shriram Sharma Acharya, Rishi Chintan

हारिये ना हिम्मत | Hariye Na Himmat, Lose Not Your Heart | Pt Shriram Sharma Acharya, Rishi Chintan

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गायत्रीतीर्थ शांतिकुंज, नित्य दर्शन

गायत्री माता
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गायत्री माता - अखंड दीपक
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चरण पादुका
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चरण पादुका
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सजल श्रद्धा - प्रखर प्रज्ञा (समाधि स्थल)
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परम् पूज्य गुरुदेव व वंदनीय माताजी कक्ष
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परम् पूज्य गुरुदेव व वंदनीय माताजी कक्ष
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प्रज्ञेश्वर महादेव - देव संस्कृति विश्वविद्यालय
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शिव मंदिर - शांतिकुंज
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हनुमान मंदिर - शांतिकुंज
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आज का सद्चिंतन (बोर्ड)

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आज का सद्वाक्य

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नित्य शांतिकुंज वीडियो दर्शन


!! अखण्ड दीपक #Akhand_Deepak (1926 से प्रज्ज्वलित) चरण पादुका गायत्री तीर्थ शांतिकुञ्ज हरिद्वार 23 October 2025 !!

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!! शांतिकुंज दर्शन 23 October 2025 !! गायत्री तीर्थ शांतिकुञ्ज हरिद्वार !!

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!! परम पूज्य गुरुदेव का कक्ष गायत्री तीर्थ शांतिकुञ्ज हरिद्वार 23 October 2025 !!

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परम् पूज्य गुरुदेव का अमृत संदेश



दुनिया में जितने भी भगवान के रूप हुए हैं और अवतार हुए हैं, अवतार जिनका जिनका नाम हमने लिया हुआ है। परशुराम जी कौन हुए हैं बेटे? यह भक्त हुए हैं, इसीलिए हम भगवान कहते हैं।
भक्त और भगवान एक होते हैं। लेकिन भक्ति इनकी सार्थक होनी चाहिए।
भक्ति इनकी सार्थक कैसे होनी चाहिए? भक्ति इनकी सार्थक ऐसी होनी चाहिए जिसमें महत्वाकांक्षाएँ, आदमी की महत्वाकांक्षाएँ बढ़ती चली जाएँ, आदमी की वासनाएँ, तृष्णाएँ और अहंताएँ — जो आदमी को खा गईं — ये कमजोर होती चली जाएँ।
हम सवेरे समाधि की बात आपको कहते हैं। और हम यह कहते हैं कि आत्मा की शांति और भगवान की समाधि — दोनों ही एक बात है।
वो स्थिति अगर आप पैदा कर लें, आपके अंतरंग में अगर शांति आ जाए, तो आपको मैं जीवंत समाधि कहूँगा। और जीवंत समाधि में आपको भगवान के साक्षात्कार होते चले जाएँगे — यह मैं आपको यक़ीन दिलाता हूँ।
क्या करना पड़ेगा? चार काम करने पड़ते हैं, जो सवेरे ध्यान में कराता हूँ:
वासना शांत, तृष्णा शांत, अहंता शांत, उद्विग्नता शांत।
यह जो कोहराम मचाए हुए हैं — इन कोहरामों को आप कम-से-कम कर लीजिए। फिर देखिए भगवान की किरणें किस तरीके से आपके घर में तेजी से घुसती हुई चली जाती हैं। ज़रा देखिए तो सही, चमत्कार तो देखिए तो सही।
आप भक्त और भगवान का बनना चाहते हैं? आपको क्या करना पड़ेगा?
वो करना पड़ेगा। पतंग, पतंग अपनी डोरी किसी बच्चे के हाथ में थमा देती है, और यह कह देती है — "भाई साहब, आप जहाँ भी उड़ाएँगे, वहाँ हम उड़ेंगे।"
बच्चा इशारा करता जाता है, और पतंग ऊपर आसमान में उड़ती चली जाती है, आसमान पर छा जाती है। क्यों?
क्योंकि उसने अपनी डोरी बच्चे के हाथ में दी हुई है।
अगर डोर बच्चे के हाथ में न दी जाए — पतंग कहे:
"नहीं साहब, मैं तो अपनी डोरी अपनी जेब में रखूँगी, मैं आपके साथ नहीं उड़ सकती।"
तो बेटे, ऊपर नहीं उड़ सकती। पतंग ऊपर नहीं उड़ सकती।
जिस क्षण डोरी कट जाएगी, वो ज़मीन पर गिरेगी।
बंसी में जो गाना निकलता है, बंसी में जो स्वर निकलते हैं — इसलिए निकलते हैं कि बंसी अपने आप को खाली कर देती है। खाली!
अगर बंसी ना हो, बंसी के भीतर कूड़ा-कचरा, मिट्टी भरी पड़ी हो — कामनाओं की, तृष्णाओं की, वासनाओं की, अहंताओं की — तब उसमें से कोई स्वर नहीं निकल सकता।
आप बजा दीजिए बेटे, हम नहीं बजा सकते आपकी बंसी को।
क्योंकि इसमें मिट्टी भरी पड़ी है।
मिट्टी आप साफ कीजिए। पोली बंसी लाइए — हम बजा दें।
आप पोली मिट्टी लाइए।
बेल, बेल पेड़ से लिपटती चली जाती है और उसके बराबर जा पहुँचती है — ज़मीन पर।
अगर बेल फैलेगी तो फैल तो सकती है, ऊँची नहीं चढ़ सकती।
क्योंकि उसकी कमर कमजोर होती है, कमर कमजोर होती है।
व्यक्ति ऊँचा नहीं उठ सकता, भगवान के सहारे ऊँचा उठ सकता है।
लेकिन शर्त उसकी यह है — भगवान जिस ऊँचाई पर है, उसी ऊँचाई पर चलने के लिए हमको कोशिश करनी चाहिए।
हमारा जीवन का स्वरूप वास्तव में — भक्ति जो है — वो कोई क्रिया नहीं है, कोई मैजिक नहीं है, कोई जादू नहीं है, कोई घटना नहीं है।
बल्कि यह क्या है बेटे?
यह जीवन का एक स्वरूप है।
जीवन के स्वरूप, जीवन की निष्ठाएँ, जीवन की आस्थाएँ — उनकी जैसी क्रिया-पद्धति क्या होनी चाहिए — उपासना उसी से संबंधित है।
 

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अखण्ड-ज्योति से



एक पर्वत में से एक छोटी नदी निकल कर मैदान में बह रही थी। उसकी धारा बहुत पतली थी और वेग भी बहुत मन्द था। एक विचारवान मनुष्य ने उसे देखा। वह सोचने लगा कि यदि सदुपयोग किया जा सके तो इस छोटी नदी के पानी से भी बहुत लाभ उठाया जा सकता है। उसने इंजीनियरों की सहायता से जगह-जगह बाँध बंधवाये, नहर निकालीं, बड़े-बड़े तालाब बनवाये, पानी को रोककर इच्छानुसार काम में लाने का प्रबंध किया। कुछ ही दिनों में उस नदी से हजारों लाखों बीघे जमीन सींची जाने लगी, पनचक्कियाँ चलने लगीं, बिजली घर बन गया। जिससे रोशनी तथा कई तरह के कल कारखाने चलने लगे।

     मनुष्य की मानसिक शक्ति उसी छोटी नदी के समान है, जिसका जल इधर-उधर निरर्थक नष्ट हो जाता है। किन्तु जब कोई विचारवान मनुष्य इसका सदुपयोग करने की सोचता है और उसे लाभदायक कार्यों में लगाने का प्रयत्न करता है तो परिणाम ऐसा ही आशा जनक और चमत्कारपूर्ण निकलता है जैसा कि उस नदी के सदुपयोग का निकला था।

     हमें इस सचाई को भली प्रकार हृदयंगम कर लेना चाहिए कि मनुष्य ऐसा लकड़ी का टुकड़ा नहीं है जिसे संसार सागर की लहरें चाहे जहाँ वहाँ ले जावें। हम अपने भाग्य के स्वामी स्वयं हैं, अपने आप अपने लिए भली बुरी परिस्थितियों का निर्माण करते हैं। मन की जादू भरी शक्ति ऐसी विचित्र है कि उसके तनिक से घुमाव फिराव में जीवन कुछ से कुछ बन जाता है। निशाना लगाते समय बन्दूक की नली यदि आध इंच नीची-ऊंची हो जाय तो निशाना गजों नीचा-ऊंचा हो जाता है। मानसिक वृत्तियों का जरा सा उतार चढ़ाव बाह्य जीवन में असाधारण परिवर्तन उपस्थित कर देता है।

     जीवन की प्रसन्नतादायक हर एक चीज परमात्मा ने हमारे लिए पैदा की है। हवा, गर्मी, पानी और भोजन हर एक को प्राप्त होता है, इन जीवनोपयोगी वस्तुओं की संसार में कुछ भी कमी नहीं है फिर भी कुछ लोग ऐसे हो सकते हैं, जो अपनी नासमझी के कारण इन वस्तुओं को प्राप्त करने से वंचित रहें। इसी प्रकार यह भी हो सकता है कि कुछ लोग दुर्भाग्य पूर्ण जीवन जिएं जबकि परमात्मा ने उन्हें सुख शाँति का जीवन बिताने के लिए पर्याप्त सामग्री दी है। मन एक ऐसा तत्व है जिसका यदि सदुपयोग किया जाय तो जीवन की हर एक पंखुड़ी आनन्द और उल्लास के साथ खिल सकती है, इसके विपरीत यदि मन की शक्ति का दुरुपयोग किया जाय तो प्रचुर धन सम्पत्ति होते हुए भी मनुष्य असन्तुष्ट और अशाँत ही रहेगा।

     विषय विकारों की कुवासना में मन को दौड़ाने से रोगों का उद्भव होता है। क्रोध करने से शरीर निस्तेज और आत्मा कलुषित बनती है। डर और घबराहट की वजह से दरिद्रता और असफलता का दर्शन होता है। कायर, ईर्ष्यालु और दुष्ट प्रकृति के लोग अपनी आग में आप ही जलते रहते हैं। निन्दा, चुगली, खुदगर्जी अहंकार और अभिमान की भावनाएं माँस पेशियों को ऐसा ढीला कर देती है कि असमय में ही बुढ़ापा आ घेरता है। दुर्भाव में चैन की जिन्दगी नहीं जी सकता।

     मन को कुमार्ग से रोककर सत्मार्ग पर लगाना, जीवनोपयोगी आवश्यक कार्यों में प्रवृत्त करना, ऐसा ही है जैसा उस बुद्धिमान आदमी ने नदी को रोक कर उसके पानी से लाभ उठाया था। बुरे मार्ग पर मन को चलने देना, निरर्थक और हानिकर बातों में चित्त को उलझाये रहना, अपनी जीवनी शक्ति का, प्राण शक्ति का सर्वनाश करना है। इसलिए मैं उन लोगों से जो अपने जीवन को महत्वपूर्ण बनाने के इच्छुक हैं कहती हूँ कि मन पर काबू कीजिए, उसे उचित दिशा में ले जाइये, मनःशक्ति का सदुपयोग कीजिए।

 अखण्ड ज्योति 1945 फरवरी

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