Tuesday 27, May 2025
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गायत्रीतीर्थ शांतिकुंज, नित्य दर्शन
आज का सद्चिंतन (बोर्ड)
आज का सद्वाक्य
नित्य शांतिकुंज वीडियो दर्शन
!! शांतिकुंज दर्शन 26 May 2025 !! !! गायत्री तीर्थ शांतिकुञ्ज हरिद्वार !!
!! परम पूज्य गुरुदेव पं श्रीराम शर्मा आचार्य जी का अमृत सन्देश !!
परम् पूज्य गुरुदेव का अमृत संदेश
कांटा उसे कहते हैं, जिसमें की एक गर्मी नाम की चीज रह जाती है। गर्म चीज, एक गर्मी — ऊर्जा। ऊर्जा काम करती है वेब्स। उसी का एक हिस्सा है। एटम उसका मोटा रूप है, आर्टिकल्स उसके मोटे रूप हैं और आगे मोटे रूप हैं। हम वहाँ गए,कांटा के ऊपर।
और कांटा के संबंध में इकोलॉजी। इकोलॉजी साइंस ने हमको यह बता दिया है कि कांटा विचारशील है, जिसके अंदर जीवन है, चेतना है। हम इकोलॉजी के सिद्धांतों को जब हम लोगों को समझाते हैं और हम लोगों को पढ़ाते हैं, तो कहते हैं — हर चीज विचार के साथ जिंदा है।
आदमी और पेड़ आपस में फिर आ गए। आदमी, कार्बन डाइऑक्साइड छोड़ता है और पेड़ हमारे लिए ऑक्सीजन छोड़ता है। हम और पेड़ आपस में रिलेटिव और आपस में संबंधी हैं। इंसान जिएगा तो पेड़ जिएगा, पेड़ जिएगा तो आदमी जिएगा।
यह कौन है साहब? यह बड़े विचारशील की बात है। यह बड़ा विचारशील है। कोई-कोई नेचर बड़ी विचारशील है। क्वांटा बड़ा विचारशील है। और अब हमने यह निश्चय कर लिया है कि, जिसके बारे में लोग कहते थे — जड़ है, जड़ है, सारा दुनिया जड़ है। स्वार्थवादी पदार्थ-विज्ञान कहता था, सारी दुनिया जड़ है। अब हम तुमसे कहते हैं कि कोई जड़ नहीं है। यह चेतन है।
नहीं साहब, आज दुनिया केवल बॉल नहीं है। दुनिया में कोई क्वांटा नहीं और कोई मैटर नहीं। अब हम वेदांत की भाषा में नए सिरे से बोलेंगे। मित्रों, अब हमारे अंदर हिम्मत है और हमारे पास अक्ल है। उन्हीं के हथियारों को, उन्हीं के जूते से, उन्हीं का सिर पीटेंगे। और हर आदमी से कहेंगे — अक्ल के हिसाब से हम चलेंगे। और हम आपको पदार्थ के हिसाब से चलेंगे। और लॉजिक के हिसाब से चलेंगे। और स्पीच आपको देंगे। और आपके सामने तर्क पेश करेंगे।
और यह करेंगे, और यह तर्क करेंगे कि — ब्रह्म अर्थात विचारणा, अर्थात चेतना अपनी आपकी जगह है। और आदमी जड़ नहीं है, और दुनिया जड़ नहीं है, मित्रों।
यह ब्रह्म विद्या का हमको जरूरत इस बात के लिए पड़ी। नए सिरे से ब्रह्मवर्चस, जिसके कि आप मेंबर हैं — ब्रह्मवर्चस जो हमारी भावी वाली क्रिया पद्धति है, शिक्षण वाली पद्धति है — इसका वेश बदल दिया है। इसलिए यह नवीनतम है। और यह क्योंकि इसकी जीवात्मा प्राचीनतम है। जीवात्मा को हमने छुआ नहीं। जीवात्मा को हम रक्षा करेंगे।
पं श्रीराम शर्मा आचार्य
अखण्ड-ज्योति से
भगवान् के यों अगणित नाम हैं उनमें से एक नाम है-सच्चिदानंद। सत् का अर्थ है-टिकाऊ अर्थात् न बदलने वाला-न समाप्त होने वाला। इस कसौटी पर केवल परब्रह्म ही खरा उतरता है। उसका नियम, अनुशासन, विधान एवं प्रयास सुस्थिर है। सृष्टि के मूल में वही है। परिवर्तनों का सूत्र-संचालक भी वही है। इसलिए परब्रह्म को सत् कहा गया है।
चित् का अर्थ है-चेतना, विचारणा। जानकारी, मान्यता, भावना आदि इसी के अनेकानेक स्वरूप हैं। मानवी अंतःकरण में उसे मन, बुद्धि, चित्त, अहंकार के रूप में देखा जाता है। बुद्धिमान् और मूर्ख सभी में अपने विभिन्न स्तरों के अनुरूप वह विद्यमान रहती है।
प्राणियों की चेतना बृहत्तर चेतना का एक अंग-अवयव मात्र है। इस ब्रह्माण्ड में अनंत चेतना का भण्डार भरा पड़ा है। उसी के द्वारा पदार्थों को व्यवस्था का एवं प्राणियों को चेतना का अनुदान मिलता है। परम चेतना को ही परब्रह्म कहते हैं। अपनी योजना के अनुरूप वह सभी को दौड़ने एवं सोचने की क्षमता प्रदान करती है। इसलिए उसे ‘चित्’ अर्थात् चेतन कहते हैं।
इस संसार का सबसे बड़ा आकर्षण ‘आनंद’ है। आनंद जिसमें जिसे प्रतीत होता है वह उसी ओर दौड़ता है। शरीरगत इन्द्रियाँ अपने-अपने लालच दिखाकर मनुष्य को सोचने और करने की प्रेरणा देती हैं। सुविधा-साधन शरीर को सुख प्रदान करते हैं। मानसिक ललक-लिप्सा, तृष्णा और अहंता की पूर्ति के लिए ललचाती रहती हैं। अंतःकरण की उत्कृष्टता वाला पक्ष आत्मा कहलाता है। उसे स्वर्ग, मुक्ति, ईश्वर प्राप्ति, समाधि जैसे आनंदों की अपेक्षा रहती है।
वस्तुतः आनंद प्रकारान्तर से प्रेम का दूसरा नाम है। जिस भी वस्तु, व्यक्ति एवं प्रकृति से प्रेम हो जाता है, वही प्रिय लगने लगती है। प्रेम घटते ही उपेक्षा चल पड़ती है और यदि उसका प्रतिपक्ष-द्वेष उभर पड़े, तो फिर वस्तु या व्यक्ति के रूपवान्, गुणवान् होने पर भी वे बुरे लगने लगते हैं। उनसे दूर हटने या हटा देने की इच्छा होती है।
अँधेरे में जितने स्थान पर टॉर्च की रोशनी पड़ती है, उतना ही प्रकाशवान् होता है। वहाँ का दृश्य परिलक्षित होने लगता है। प्रेम को ऐसा ही टॉर्च-प्रकाश कहना चाहिए, जिसे जहाँ भी फें का जाएगा, वहीं सुंदर, प्रिय एवं सुखद लगने लगेगा। वैसे इस संसार में कोई भी पदार्थ या प्राणी अपने मूल रूप में प्रिय या अप्रिय है नहीं। हमारा दृष्टिकोण, मूल्यांकन एवं रुझान ही आनंददायक अथवा अप्रिय, कुरूप बनाता चलता है और दृष्टिकोण के अनुसार ही अनुभूति होते चली जाती है।
आनंद ईश्वर की विभूति है। प्रेम को परमेश्वर कहा गया है। प्रिय ही सुख है अर्थात् ईश्वर ही आनंद है। उसी के आरोपण से हम सुखानुभूति करते और प्रसन्न होते हैं। आत्मा परमात्मा का ही एक सूक्ष्म अंश माना गया है। यह आत्मा उसी सच्चिदानंद को निरंतर खोजती रहती है, परन्तु माया के अवरोध के कारण उसको प्राप्त नहीं कर पाती है। जब माया का आवरण हट जाता है, तो सच्चिदानन्द के स्वरूप का बोध हो जाता है और वह उसी में निमग्न हो जाती है।
आत्मा को सच्चिदानन्द स्वरूप को प्राप्त करने की अभिलाषा शाश्वत है। उसे प्रेम या भक्तियोग से ही प्राप्त किया जा सकता है। यह लौकिक प्रेम की श्रेणी का नहीं, अपितु अध्यात्म श्रेणी का है, जिसके द्वारा सच्चिदानन्द की प्राप्ति होती है। यह स्पष्ट जानना चाहिए कि परमात्मा के अनेकानेक नाम है। उनमें से सच्चिदानन्द नाम भी सार्थक है।
पं श्रीराम शर्मा आचार्य
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