Wednesday 13, May 2026
हम अपने-पराए में फर्क क्यों करते हैं? Hum Apne-Paraaye Mein Fark Kyon Karte Hain? अमृत सन्देश:- पंडित श्रीराम शर्मा आचार्य
अमृतवाणी:- बोया काटा | Boya Kata | Pujay Gurudev Pt Shriram Sharma Acharya
गायत्रीतीर्थ शांतिकुंज, नित्य दर्शन
आज का सद्चिंतन (बोर्ड)
आज का सद्वाक्य
नित्य शांतिकुंज वीडियो दर्शन
!! शांतिकुंज दर्शन 13 May 2026!! गायत्री तीर्थ शांतिकुञ्ज हरिद्वार !!
सिर्फ पूजा-पाठ से कुछ नहीं होगा। Sirf Pooja-Paath Se Kuch Nahi Hoga अमृतवाणी: परम पूज्य गुरुदेव पं श्रीराम शर्मा आचार्य
परम् पूज्य गुरुदेव का अमृत संदेश
आपको आपको मिलजुल कर ही रहना पड़ेगा हिल हिल मिलकर ही खाना पड़ेगा मिल बांटकर ही खाना पड़ेगा इसके अलावा दुनिया में कोई रास्ता ही नहीं है हम अमीर बनेंगे आप अमीर कमा तो लेंगे तो बांट कर खा लेना फिर नहीं साहब कमाकर तो नहीं खाएंगे हम कमाते हैं हम जमा करेंगे अच्छा ठहरिये हम धुनाई करेंगे चुप बदमाश कहीं का नहीं तो हम कमाएंगे समाज का है आप कमाइए खर्च कीजिए न औरों के लिए नहीं अपने लिए जमा करेंगे औलाद के लिए जमा करेंगे मारे मारे जूतों के मारे आप की खाल उखाड़ दी जाएगी चुप बेईमान कहीं के साहब रामायण पाठ करेंगे हनुमान चालीसा पाठ करेंगे और हम जमा अमीरी करेंगे बेटे को भी अमीर बनाएंगे और बेटी को ही अमीर बनाएंगे तो क्या करेंगे अब भजन नहीं साहब भजन करते हैं पूजा करते हैं रामायण पढ़ते हैं प्राणायाम करते हैं आप करते हैं अपना सिर आप सिद्धांतों को तो समझते नहीं है इसके लिए यह सारी चीजें बनाई गई हैं यह पूजा-पाठ किसके लिए बनाया गया है भगवान को खुश करने के लिए नहीं भगवान को खुश करने के लिए आपके पूजा पाठ की कोई जरूरत नहीं
अखण्ड-ज्योति से
यहां चर्चा उस साहसिकता की हो रही है जो लोक-प्रवाह से अलग हटकर अपना रास्ता बनाती है। उत्कृष्ट दृष्टिकोण और आदर्श क्रिया-कलाप अपनाते की बात सामान्यजनों से नहीं बन पड़ती वे प्रचलन के प्रवाह में ही बहते रहते हैं और अधिकांश लोगों के अधिकांश जीवनक्रम में व्यवहृत होने वाले ढर्रे को अपनाने के अतिरिक्त और कुछ सोचते करते बन ही नहीं पड़ती। सच्चे अर्थों में शूरवीर वे हैं जिनने मानवी गरिमा को समझा और तदनुरूप स्वतंत्र चिंतन और स्वतंत्र कर्तृत्व अपना कर महामानवों जैसी वरिष्ठता का मार्ग अपनाया। ऐसे ही लोग प्रकाश स्तंभ ही तरह उफनते समुद्र में भी अपना सिर उठायें- अस्तित्व बनाये रहते हैं। उधर से निकलने वाले जलयानों में डूबने से बचा सकने वाला मार्ग-दर्शन कर सकना इन्हीं के भाग्य मे बदा होता है। मानवता ऐसे ही नर-रत्नों को जन्म देकर कृत-कृत्य होती है।
अखण्ड-ज्योति ने ऐसे ही मणि-मुक्तकों को जहां-तहां से ढूंढ़ा और हीरक हार की तरह उन्हें कलात्मक ढंग से गूंथ कर युग देवता की सौंदर्य सज्जा को बढ़ाया है। दूसरे शब्दों में उसे ऐसी पुष्प वाटिका की उपमा भी दी जा सकती है जिसमें एक से एक सुंदर सुरभित फूलों को खिलते-महकते देखकर दर्शकों का मन हुलसता है। इस खिली पीढ़ी का विशिष्ट सौभाग्य यही है कि उनका उपयोग वैश्या गृहों में नहीं देवमंदिरों में ही होता चला जा रहा है। आर्थिक और शैक्षणिक दृष्टि से सामान्य होते हुए भी दृष्टिकोण, चरित्र एवं सृजन अभियान में योगदान की दृष्टि से अपने को असामान्य स्तर का सिद्ध किया है। इस प्रतिपादन मूल्यांकन की प्रामाणिकता यह है कि उस छोटे से समुदाय के प्रयास पराक्रम से युग निर्माण योजना बनी-बढ़ी और इस स्थिति तक पहुंची कि उसे असंतुलन को संतुलन में बदल सकने में समर्थ माना और विश्व मानव के भाग्य निर्धारण में उसका योगदान अद्भुत समझा जा रहा है। पिछले वर्षों की दृढ़ता, गतिशीलता और सफलता को देखते हुए यह आशा बंध चली है कि प्रस्तुत विभीषिकाओं से जूझने और उज्ज्वल संभावना मूर्तिमान करने में उसकी सुनिश्चित भूमिका होगी।
युग सन्धि की बेला में प्रज्ञा अभियान को गतिशील करने के लिए उनके केन्द्र संस्थानों की स्थापना का उपक्रम पिछले वर्ष उत्साहपूर्वक चला है। छोटी बड़ी स्थापनाएं 2400 के लगभग बन पड़ी हैं। ऊपर से देखने में यह मझोले देवालय समझे जा सकते हैं, पर वस्तुतः इन्हें जन जागृति का केंद्र माना जाना चाहिए। देव प्रतिमा की स्थापना एवं पूजा परिचर्या का क्रम अन्य देवालयों जैसा होते हुए भी उनकी विशेषता यह है कि सृजन और सुधार की दस सूत्री योजना बना कर यह सभी संस्थान अपने-अपने निर्धारित कार्यक्षेत्र में निरंतर कार्यरत रहेंगे।
परम पूज्य गुरुदेव पं श्रीराम शर्मा आचार्य
अखण्ड ज्योति 1981 जनवरी
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