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Magazine - Year 1942 - Version 2

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नास्तिक भी उपासना करें

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नास्तिकैरपि कर्तव्योपासना परमात्मनः।

जीवन पतनं याति यतोह्याराधनाँ बिना॥

-पंचाध्यायी।

(नास्तिकैः) अनीश्वरवादियों को (अपि) भी (परमात्मनः) परमात्मा की (उपासना) उपासना (कर्तव्या) करनी चाहिए (यतोहि) क्योंकि (आराधनाँ) आराधना के (बिना) बिना (जीवनं) जीवन (पतनं) पतनावस्था को (याति) प्राप्त होता है।

पंचाध्यायी के उपरोक्त श्लोक में दिव्य सत्ता की-ईश्वर की-उपासना को आवश्यक बताया है। यहाँ प्रारम्भ में ही अनेक सन्देह उठ खड़े होते हैं। गणना की जाय, तो संसार में इस समय एक तिहाई से भी अधिक जन-संख्या ऐसी होगी, जो ईश्वर का आस्तित्व मानने से ही इन्कार करती है। विज्ञान कहता हैं कि-”कसौटी पर वर्तमान ईश्वर का ढाँचा खरा नहीं उतरा। विभिन्न सम्प्रदायों, पैगम्बरों और भक्त-जनों ने ईश्वर का जैसा वर्णन किया है, वह परीक्षा के समय अवास्तविक प्रमाणित हुआ। ईश्वरीय चमत्कारों की अनेक गाथाएं जो विभिन्न देश-जातियों में प्रचलित हैं वे अतिरंजित, आलंकारिक एवं काल्पनिक ठहराई जा चुकी हैं। भजन-मग्न सज्जनों की शारीरिक और मानसिक परीक्षण करने पर उनमें कोई विशेषता, महत्ता उपलब्ध नहीं हुई है, जिसके आधार पर भजन मगन होने की उपयोगिता स्वीकार की जा सके।”

वर्तमान युग के भौतिक, मनोवैज्ञानिक और दार्शनिक विज्ञान को ही ऐसी आशंका हुई हो, सो बात नहीं है। यह सन्देह बहुत प्राचीन काल से विद्यमान है। श्रुति, शेष, शारदा, ऋषि, मुनि सब ने ईश्वर का यथासंभव वर्णन किया है, पर अन्त में वे “नेति” “नेति” कह कर चुप हो गये। “इतना ही नहीं, अभी और है।” इस स्वीकारोक्ति का भाव यह है कि-हमें उसकी पूरी जानकारी नहीं हमारा जो ज्ञान है वह अधूरा है। मन, वाणी, बुद्धि से अतीत, अगम, अगोचर अबेद्य बताकर शास्त्रकार अपनी मर्यादा को निष्कपट भाव से प्रकट कर देते हैं। प्रचण्ड तार्किक ‘न्याय कुसुमाँजलि’ कार ने ईश्वर को तर्कों द्वारा सिद्ध करने का प्रयत्न किया है, पर उनने भी यह स्वीकार कर लिया है कि इस बहाने कुछ हरिचर्चा कर रहे हैं, ईश्वर को सिद्ध करने का हमारा दावा नहीं है।’ साँख्यकार ने भी स्वीकार किया है-- ‘ईश्वरासिद्धेः’ अर्थात् ईश्वर साबित नहीं हो सकता। देवताओं के गुरु बृहस्पति के मत से जो परिचित हैं, वे जानते हैं कि अपने युग के यह अद्वितीय विद्वान् नास्तिक थे। चार्वाक मत उन्हीं की प्रेरणा से प्रचलित होने की चर्चा पुराण में उपलब्ध होती है।

आज इस तर्क युग में जबकि बुद्धि संगत तत्वों को ही आश्रय मिल रहा है, हर एक विचारवान व्यक्ति इस सोच-विचार में पड़ा हुआ है कि सचमुच ईश्वर कुछ है भी या यों ही एक हौआ बना चला आता है। ऐसी दशा में हम किसी व्यक्ति को ‘बाबा वाक्यं प्रमाणम’ मानकर सन्तोष कर लेने के लिये नहीं कह सकते। ईश्वर है या नहीं? है तो कौन है? कहाँ है? कैसा है? इस सम्बन्ध में तर्क और प्रमाणों से परिपूर्ण चर्चा पाठक इसी लेखमाला के अंतर्गत अगले अंकों में पढ़ेंगे। इस समय तो हमें केवल यही बताना है कि इस पेचीदगी के होते हुए भी पंचाध्यायी ईश्वर उपासना को आवश्यक क्यों बताती है। जब एक वस्तु के होने में ही सन्देह है, तो उसकी उपासना की बात कहना किस प्रकार युक्ति संगत हो सकता है।

उपरोक्त श्लोक में ईश्वर उपासना का आदेश मनुष्य मात्र के लिए है। मनुष्य मात्र में अनीश्वरवादी भी आ जाते हैं, फिर सार्वभौम व्यवस्था तो वहीं हो सकती है, जिसे दोनों पक्ष स्वीकार करें। इसलिए हमें वैज्ञानिक दृष्टिकोण से इस श्लोक की विवेचना करनी होगी, जिसे अनीश्वरवादी भी स्वीकार करते हों। असंख्य में तो यह आदेश उन्हीं लोगों के लिए है, जो उपासना नहीं करते। करने वाले तो करते ही हैं, उनके लिए तो कहना ही कुछ नहीं हैं ‘पढ़ने जाना चाहिए’ यह उपदेश उन्हीं बालकों के लिए हैं, जो पढ़ने नहीं जाते, जो परिश्रम से पढ़ रहे हैं, उनके लिए तो यह शिक्षा कुछ विशेष महत्व नहीं रखती, क्योंकि वे तो पहले से ही उस पर अमल कर रहे हैं। अनीश्वर वादियों को उन्हीं के दृष्टिकोण से उपासना की उपयोगिता बताना यहाँ अधिक उपयुक्त होगा।

ईश्वर उपासना का मानसिक विश्लेषण करते हुए, मनःशास्त्र के विशेषज्ञ डॉ. एटकिसन ने लिखा है कि “भक्त के मन में भगवान् के सम्बन्ध में अपनी मनोभूमि के अनुसार एक दिव्य कल्पना चित्र होता है, उस चित्र में तन्मय होने के प्रयत्न को उपासना कहते हैं।” यह कल्पना चित्र हर व्यक्ति के पृथक होते हैं, इसीलिए श्री विवेकानंद जी कहा करते थे, हर व्यक्ति का एक अलग ईश्वर है। जो आधुनिक विद्वान देवताओं का अर्थ सन्त पुरुष नहीं करते, उनका कहना है कि पुराने समय में भारत की आबादी जब तेतीस करोड़ थी, हर व्यक्ति के मन में ईश्वर सम्बन्धी धारणा एक दूसरे से कुछ न कुछ भिन्नता लिये हुए होती है, इसलिए किसी कवि ने तैंतीस करोड़ स्वतंत्र देवताओं की बात कह कर हर, इसी आधार पर उनका अलंकारपूर्ण विस्तृत वर्णन कर दिया था, तभी से हिन्दू जाति में तैंतीस करोड़ देवताओं की मान्यता को आश्रम मिला।

आइए, कुछ ईश्वर भक्तों को बुलावें और उनकी मानसिक स्थिति को जाँचें। एक हिन्दू को लीजिये, भारतीय वेष-भूषा में सुसज्जित, पूर्ण स्वस्थ, सुन्दर, सद्गुण, दयालु, न्यायी, सर्व शक्तिवान देवता की मूर्ति का मन ही मन ध्यान करता है। कृष्ण, राम, विष्णु, शंकर आदि के सुन्दर चित्र जो बाजार में बिकते हैं, उन्हीं से मिलती जुलती किसी मूर्ति की रचना उसने अपने मस्तिष्क के अंतर्गत कर रखी है। अब एक मुसलमान को लीजिए उसके मन में खुदाबन्द करीम का ऐसा चित्र है, जो चौथे आसमान में फरिश्तों के कन्धों पर रखे हुए तख्त पर बैठा है, लम्बी सफेद दाढ़ी, सुथना, टर्की टोपी, अचकन या ऐसी ही कुछ पोशाक है, गुणों में हिन्दू के राम के समान यह भी सर्वशक्तिवान है। एक ईसाई को लीजिए, उसका गौड पूरा साहब बहादुर है, रंग का गोरा चिट्टा, कोट पतलून पहिने हुए है। इसी प्रकार हब्शियों का ईश्वर नंग-धड़ंग, काला-कलूटा, मोटे होठ वाला होगा। यदि बैल ईश्वर ध्यान करता हो, तो उसका ईश्वर एक अच्छा साँड होगा, इसी प्रकार यदि अन्य पशु-पक्षी ईश्वर का ध्यान करने में समर्थ होंगे, तो वे अपनी ही विचार मर्यादा के अंतर्गत ईश्वर की रचना करते होंगे।

एक वैज्ञानिक इन सब मानस चित्रों की विभिन्नता पर विचार करता है, तो वह समझ जाता है कि यह सब चित्र वास्तविक ईश्वर के नहीं हैं, क्योंकि सभी लोग जब उसे एक और सब व्यापक मानते हैं, तो यह आकृति भेद क्यों हैं? या तो सभी के ध्यान में दाढ़ी और टर्की टोपी वाला ईश्वर होना चाहिए या फिर बंशी बजाने वाला ही। पृथकता इस बात की घोषणा करती है कि यह रचना मानवीय कृति है। इसकी पुष्टि इसलिये भी हो जाती है कि गुण, कर्म, स्वभाव और विश्वास भी इन ईश्वरों के अलग-अलग पाये जाते हैं। खुदाबन्द करीम कुर्बानी की गायों को चट कर जाते हैं पर भगवान कृष्णा इस पर दुखी और नाराज हो जायेंगे। हबसी का खुदा पीली चिड़िया का अण्डा पाकर आशीर्वाद देता है, पर बौद्धों का उपास्यदेव, इसे स्वीकार न करेगा। ईश्वरीय धर्म पुस्तकें वेद, कुरान, बाइबिल, तौरित, धम्मपद, जिन्द अवेस्ता में जो धर्मोपदेश हैं, वे एक दूसरे से बहुत अंशों में विरुद्ध पड़ते हैं। यह सब प्रमाण इस बात के हैं, कि भक्तों का उपास्य देव एक कल्पित प्रतिमा है, जिसका निर्माण वह अपने ज्ञान, मर्यादा, आवश्यकता, इच्छा और कामना के आधार पर करता है। हाँ एक बात में यह सब ईश्वर समान हैं, कि वे भक्त से अधिक सशक्त हैं और उन ईश्वरों में वह सब योग्यतायें मौजूद हैं, जिनकी कामना भक्त अपने लिए करता है।

इस मनोविश्लेषण के उपरान्त यह जानना आसान हो जाता है कि, यह वस्तु क्या है। बीमारी के लक्षण मालूम हो जाने पर उसके कारण का परिचय प्राप्त करना कुछ विशेष कठिन नहीं रह जाता। लार्ड टाटनहम का मत है कि -”भक्त भगवान के जिस रूप का ध्यान करता है, वास्तव में वह उसका आदर्श है, मनुष्य क्या बनने का प्रयत्न कर रहा है, यह उसके उपास्यदेव की आकृति, स्वभाव और शक्ति के आधार से जानना चाहिए। इष्टदेव से जितना अधिक प्रेम होगा, प्रगति उसी गति से होगी।” उनका तात्पर्य यह बताने का है कि जाने या अनजाने में जिस मूर्ति की उपासना मनुष्य करने लगता है, उसकी मानसिक चेतना उसी साँचे में ढलती चली जाती है। गीता का भी यही मत है-’प्रेतों को भजने वाले प्रेतों को, देवताओं को भजने वाले देवताओं को और मुझे भजने वाले मुझे प्राप्त होते है। यह कथन भी उसी भाव का द्योतक है।

जो व्यक्ति जिस वस्तु को प्राप्त करना चाहता है, पहले उसका एक नक्शा बना कर तैयार करता है। इंजीनियर कोई बड़ी वस्तु बनाते हैं, तो उसका एक मॉडल बनाते हैं, व्यापारी नया व्यापार करते समय उसकी रूपरेखा बनाता है, सरकारें विधान बनाती हैं, बजट पास करती है, नेता योजना बनाते हैं, तब उसके अनुसार काम होता है। विद्यार्थी जब निश्चय कर लेता है कि मुझे वैद्य बनना है, तब वह आयुर्वेद की पुस्तकें लाकर पढ़ना आरम्भ करता है। यदि वह निश्चय न करें कि मुझे क्या बनना है, और यों ही आज आयुर्वेद, कल मुनीमी, परसों लुहारी, अगले दिन सुनारी सीखे, जब जो मन में आये वह करे, तो उसका प्रयत्न निष्फल चला जावेगा और कुछ भी लक्ष प्राप्त न कर सकेगा। यात्री आज पूरब, कल पश्चिम परसों दक्षिण को नहीं चलता, वरन् एक लक्ष बनाकर उसी पर कदम बढ़ाता है और निर्धारित योजना के अनुसार आगे बढ़ता जाता है।

ध्यानावस्था में जिस ईश्वर का प्रेमपूर्वक ध्यान करके उसमें तन्मय होने की भावना की जाती है, उसका मनोवैज्ञानिक रहस्य यह है कि भक्त वैसा ही बनना चाहता है, जैसा कि भगवान की प्रतिमा उसके मस्तिष्क में हैं। श्रीकृष्णचन्द्र का हथौड़ों से गठा हुआ शरीर, कामदेव को लज्जित करने वाला सौंदर्य, कुवलियापीड़ हाथी को पछाड़ने वाला बल, असाधारण बुद्धि, योगेश्वर पदवी का तत्वज्ञान, सब कुछ करने में समर्थ, यही सब योग्यतायें उस ध्यान चित्र के अन्तराल में निहित होती हैं, जिनका ध्यान करने वाला भी धीरे-धीरे वैसा ही बनता जाता है। गीता कहती है-’जो जैसा चिन्तन करता है, वह वैसा ही हो जाता है।” सर स्काट ने कहा-’यदि मुझे यह मालूम हो जाय कि अमुक व्यक्ति की भावना क्या हैं, तो मैं बता दूँगा कि आगे चल कर वह क्या होगा।” भृंग के सत्संग से कीड़े का भृंग बन जाने की जो किंवदंती प्रचलित है, वह कहाँ तक ठीक है अभी यह नहीं जाना जा सका पर शत-शत मुखो से मनःशास्त्र के पण्डितों ने यह स्वीकार किया है कि, जो जैसा ध्यान करता है, वह वैसा ही हो जाता है। दिव्य गुणों से सम्पन्न कृष्ण का तीव्र संवेदना के साथ ध्यान करने वालों की योग्यतायें उसी प्रकार की बनने लगेंगी यह एक असंदिग्ध मनोवैज्ञानिक सचाई है, जिससे कोई इन्कार नहीं कर सकता।

अनीश्वरवादी अपने विश्वास न बदलते हुए भी ईश्वर उपासना से किस प्रकार आश्चर्यजनक लाभ प्राप्त कर सकते हैं, इसकी चर्चा हम अगले अंक में करेंगे।

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