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Magazine - Year 1942 - Version 2

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उन्नतिः क्रमशोलोके जीव धर्मः सताँमतः। उपर्यारुह्यनीचैः सः प्राप्नुँहि पूर्णताँ सदा॥

सम्पूर्णां सहजत प्राप्ताँ योग्यताँ धारयत्यलम्॥

-पंचाध्यायी

(लोके) संसार में (क्रमशः) क्रम से (उन्नतिः) विकास करना (सताँमतः) सज्जनों से स्वीकृत (जीवधर्मः) जीव का धर्म है। (सः) वह (नीचैः) नीचे से (उपरि) ऊपर को (आरुह्म) चढ़कर (सदा) हमेशा (पूर्णताँ) पूर्णता को (प्राप्नुँ) प्राप्त करने के लिए (सहज प्राप्ताँ) स्वाभाविक (सम्पूर्णां) सम्पूर्ण (योग्यताँ) योग्यता को (अलं) पर्याप्त मात्रा में (धारयति) धारणा करता है।

सृष्टि के समस्त पदार्थों के जीवन क्रम पर दृष्टि डालने से पता चलता है कि हर एक पदार्थ आरम्भ में छोटा होता है। पीछे वह बढ़ता ओर विकसित होता हुआ आगे बढ़ रहा है। अंकुर-अंकुर से नन्हा सा पौधा, नन्हे से पौधे से बड़ा पौधा, अन्त में वृक्ष। रज-वीर्य के अत्यन्त छोटे कण-गोली के बराबर माँस पिण्ड-गर्भ-बालक-किशोर-अन्त में तरुण पुरुष। परमाणु-अणु-टुकड़ा-अन्त में बड़ा पदार्थ। वर्णमाला सीखने वाला विद्यार्थी-ऊंची कक्षाओं का छात्र-अन्त में विद्वान। जिधर भी दृष्टि दौड़ाकर हर पदार्थ छोटे से बड़ा बनता हुआ दिखाई पड़ेगा। इससे प्रतीत होता है कि जीवन का विकासक्रम ‘लघु से महान’ बनने की आधारशिला पर स्थित है।

पूर्वीय विज्ञान और पाश्चात्य विज्ञान दोनों ही इस प्रश्न पर एकमत हैं। भारतीय आचार्यों का मत है कि “चौरासी लाख योनियों में भ्रमण करने के पश्चात् जीव मनुष्य शरीर को प्राप्त करता है।” योनियों में स्वेदज, उद्भिज, अंडज, जरायुज, क्रमशः एक के बाद दूसरी कक्षा की योग्यता और शक्ति बढ़ती जाती है। स्वेदज जीवों में जितना ज्ञान और विचार है उसकी उपेक्षा उद्भिजों की योग्यता बढ़ी हुई होती है। इसी प्रकार यह योग्यता बढ़ते-बढ़ते शरीरों की बनावटों में अन्तर होने लगता है और अन्त में मानव शरीर प्राप्त हो जाता है। मनुष्य, सृष्टि का सर्वश्रेष्ठ प्राणी है, वह मंजिल की सबसे आखिरी सीढ़ी पर खड़ा हुआ है। जहाँ जीव को पहुँचना है वह स्थान मनुष्य शरीर के बिलकुल निकट है।’ पाश्चात्य विकासवादी पंडित डार्विन भी अपना मत इसी प्रकार प्रकट करते हैं उनका कहना है कि अल्प चेतन एकेन्द्रिय प्राणियों की चेतना बढ़कर मछली, मेंढक, गिरगिट, गिलहरी, न्योला, बिल्ली, कुत्ता आदि में विकसित होता हुआ बन्दर से मनुष्य बना है। भारतीय अवतारों ने क्रम पर विवेचना करते हुए कुछ विद्वानों ने उससे भी विकासवाद की पुष्टि की है। हिन्दुओं के दस अवतार प्रसिद्ध हैं। उनमें से आरम्भ के यह हैं 1. मत्स्य 2. कूर्म 3. वाराह 4. नरसिंह 5. वामन। अनुमान लगाया जाता है कि आरम्भ में मछली जैसे जीव फिर कछुए जैसे, इसके बाद उन्नति करते-करते सुअर की आकृति के तदुपरान्त अधकचरे मनुष्य आधे आदमी जैसे नरसिंह हुए होंगे। पीछे बौने-अल्प योग्यता वाले-मनुष्य हुए होंगे। हो सकता है कि शारीरिक दृष्टि से वे वर्तमान मनुष्यों की अपेक्षा कुछ सबल रहे हों पर बौद्धिक दृष्टि से बौने वामन-छोटे अवश्य रहे होंगे। ऐसे ही अन्य आधार भी जीवन विकास के सम्बन्ध में प्राप्त हो सकते हैं। पाश्चात्य अनुसन्धानों से तो सोलह आना इसी मत का समर्थन होता है जीवन नीचे से ऊपर की ओर तुच्छता से महानता की ओर बढ़ रहा है। आध्यात्मवादी भी मानते हैं कि आत्मा बढ़ते-बढ़ते परमात्मा हो जाता है।

यहाँ एक सन्देह उठ खड़ा होता है कि योनियों की असमानता के कारण कोई प्राणी तो बहुत आनन्द में रहते होंगे और कुछ उनके लिए तरसते होंगे। जैसे कबूतर हवा में उड़ने का आनन्द ले सकता है पर कछुए के लिए वह कहाँ रखा हैं? बन्दर तो मधुर फलों का स्वाद लेता है पर मेंढक के लिए वह कहाँ है? मनुष्य षट्रस व्यंजन खाता है पर गधे को घासपात खाकर गुजारा करना पड़ता है। इसी प्रकार जीवों का कार्यक्रम बौद्धिक मर्यादा आदि में भी विषमता होती है, शरीरों का छोटा बड़ा होना इन्द्रियों की न्यूनाधिकता का अन्तर है ही। पाप पुण्य की दृष्टि से भी अन्तर है ही। कोयल अपने बच्चों को कौओं से पलवाने के लिए धूर्तता करती है। माँसाहारी पशु पक्षी अपने से छोटे जीवों को निर्दयतापूर्वक खा जाते हैं। ऐसी असमानता और विभिन्नता को देखकर बुद्धि सहज ही बड़ी भ्रमित हो जाती है और प्रश्न उपस्थित होता है कि ईश्वर की पुण्य रचना में ऐसी असमानता क्यों हैं? यदि सभी प्राणी समान योग्यता के होते, कोई जीव जन्तु माँसाहारी न होता तो विश्व की व्यवस्था कितनी सुन्दर होती।

हमें जानना चाहिए यह असमानता न तो भयंकर है न बुरी और न असह्य। हमारी स्थूल दृष्टि से यह अन्तर जैसा असाधारण दिखाई देता है तात्विक दृष्टि से देखने पर वह यथार्थ वैसा नहीं है। यदि कोई अशिक्षित आदमी एक स्कूल में पहुँच जाय और एक ही समान बालकों में से किसी को गणित, किसी को भूगोल, किसी को भाषा किसी को दस्तकारी पढ़ता देखकर नाराज हो और कहे कि यह कैसा अविवेकी मास्टर है जो किसी से कुछ काम करा है किसी को कुछ शिक्षा दे रहा है किसी को कुछ। अज्ञानी की दृष्टि से स्कूल की यह असमानता मास्टर को अविवेकी ठहराती है, लेकिन एक सुविज्ञ व्यक्ति जानता है कि यह बालक जब अफसरी के योग्य होंगे तब उन्हें दस्तकारी, हिसाब भूगोल, सुलेख आदि सभी की आवश्यकता पड़ेगी। इसलिये विभिन्न विषयों को धीरे-धीरे, पचता-पचता पढ़ने के लिए अलग पुस्तकें, अलग-अलग कक्षायें, नियत करनी पड़ती हैं। योनियाँ स्वतन्त्र कक्षाएँ हैं। जिनमें अलग-अलग विषयों की शिक्षा मिलती है और क्रमशः ऊँची कक्षा में चढ़ते जाते हैं। एक योनि के जीवधारी के काम दूसरी के कामों से असंबद्ध मालूम पढ़ते हैं तो भी उनमें आपसी तारतम्य रहता है। पहाड़े याद करने वाले बालक और ज्योमेट्री के प्रश्न करने वाले के काम में भले ही भिन्नता और कभी कभी विपरीतता मालूम पड़े पर यथार्थ में एक का दूसरे से सम्बन्ध है। ज्योमेट्री के छात्र ने यदि एक दिन पहाड़े याद न किये होते तो आज जिस कार्य को वह कर रहा है न कर सकता।

चींटी और हाथी की तुलना शरीर की लम्बाई-चौड़ाई के अनुसार करते हुए तुच्छता महानता का निर्णय करना उचित न होगा। चींटी अपने शरीर की पुस्तक द्वारा भार वाहन, वस्तु छेदन, संचय वृत्ति, संघ बद्धता, सहयोग, आदि की शिक्षा प्राप्त कर रही है। जो आगे चलकर अफसरी के वक्त, मानव जीवन में काम देगा। हाथी अपने शरीर की कक्षा में सहनशीलता, स्वामिभक्त, गंभीरता, इन्द्रिय संयम, सबलता, आदि पढ़ रहा है, बिना इसके भी तो अफसरी में काम न चलता। सिंह फाड़ खाना सीखता है ताकि मानव जीवन में अन्यायों को नोंच डालने की क्षमता प्राप्त हो जावे, लोमड़ी चालाकी पढ़ती है ताकि अफसरी के वक्त, मानव शरीर प्राप्त करने के समय-चतुरता पूर्वक जीवन समस्याओं को हल कर लिया करे। हिरन अपनी कक्षा में दौड़ने की और खरगोश आत्मरक्षा की योग्यता संग्रह करता है। इस प्रकार विभिन्न योनियों में अलग प्रकार की शिक्षाएं प्राप्त करता हुआ क्रमशः विकसित हो कर मनुष्य शरीर में आता है और उन सब कक्षाओं की शिक्षा में इतना ज्ञान प्राप्त कर लेता है कि हजारों लाखों जीव जन्तुओं से एक मनुष्य का पलड़ा भारी बैठता है। हजारों विद्यार्थियों की तुलना में एक प्रोफेसर अधिक बुद्धिमान ठहरता है।

इन्द्रिय सुख की दृष्टि से कोई जीव आगे पीछे नहीं है। बन्दर को फल जितने सुस्वादु लगते हैं, उतने ही मधुर ऊंट को नीम के पत्ते लगते हैं राजा अपनी रानी से जितना प्रसन्न हैं, महतर अपनी महतरानी से भी उतना ही प्रसन्न है। इस प्रकार पशु-पक्षी भी वैसा ही आनन्द अनुभव करते है, शब्द, रूप, रस, गन्ध, स्पर्श का सुख सबको मिलता है। जो जीव जिस योनि में हैं, जैसे साधन प्राप्त करता है उसी के अनुसार उनकी इन्द्रियाँ होती हैं ताकि वही परिस्थिति उसके लिए आनन्ददायक बन जाय। बेशक अन्य योनियाँ विवेक दृष्टि से मनुष्य से नीची हैं पर इसका अर्थ यह कदापि नहीं है कि वे दुखी हैं, अभावग्रस्त हैं या, निष्प्रयोजन जीवन व्यतीत कर रही हैं। मनुष्येत्तर प्राणियों को भोग योनि मानना भ्रम है। जीवनमुक्त और देवता लोग भवबाधित मनुष्यों को नीची कोटि का समझे यह तो ठीक है पर यदि वे हमें भोग योनि मानें तो वह अन्याय होगा। सभी जीव अपनी-अपनी दशा में सुखपूर्वक है यही कारण है कि सबको मृत्यु बुरी लगती है। सभी अपनी-अपनी कक्षा के अनुसार ज्ञान की योग्यताओं की शिक्षा प्राप्त करते हुए लघुता से महानता की और, अपूर्णता से पूर्णता की ओर, बन्धन से मुक्ति की ओर, बढ़ते चले आ रहे हैं। निस्सन्देह जीवन का लक्ष ‘विकास’ है। ईश्वरीय प्रेरणा से बलात् प्रेरित हुए जीव इसी महान यात्रा के पथ पर दौड़ते हुए चले जा रहे हैं।

जीवन क्यों आरम्भ हुआ? जीवन यात्रा किस प्रकार आगे बढ़ रही है? क्या जीव नीच योनियों के लिए फिर उलटा लौट सकता है? जब बहुत शिक्षायें प्राप्त करके मनुष्य योनि प्राप्त हुई है तो भी अनेक पापी क्यों दृष्टिगोचर होते हैं? ऐसे अनेक प्रश्न पाठकों के मन में उत्पन्न हुए होंगे यह हम जानते है। अगले अंकों में जीवन विज्ञान की उन गूढ़ गुत्थियों पर हम प्रकाश डालेंगे पाठक उसकी प्रतीक्षा करें।

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