कवि से
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ले.-श्रीयुत् ‘अंचल’
शोषित शापित मानव स्वर मय, होता किस जागृति में उठ करे?
(1)
किस की उज्ज्वल हलचल में जग, जन-जन करते हुँकार अभय।
कब तरस-तरस मरने वाले, हँस हँस जीते निश्चिन्त अजय॥
आजीवन मधु ऋतु में न मिला, जो वह तूफानों में पाते।
कब वर्ग-चेतना की ज्वाला जलती, कब दो युग टकराते?॥
कब फोड़ अगति के मस्तक को, आह्वान प्रगति का सुन पढ़ता।
कब आती जीवन में आँधी, कब जाती जीवन से जड़ता॥
संघर्ष करेंगे कवि देखो, ये भूखे अधनंगे जर्जर।
शोषित शापित मानव स्वर मय, होता किस जागृति में उठ करे?
(2)
उस जागृति पौरुष की दीक्षा, उच्चार उसी पागलपन का।
विद्रोह उसी उगते खूनी रवि, मण्डल किरणों के तन का॥
आँको कवि! लक्ष-लक्ष ये स्वत्वों के हित बलिदान तरुण।
इन ममता के अंगारों का, आँको यह निर्यातन दारुण॥
यह जीवन का काला कुरूप-वैषम्य, गरीबी, बेकारी।
संस्कृति के तन पर कोटि-कोटि, ये पीव-युक्त फोड़े भारी॥
वह आँव उठे तो यह भी फटेंगे, कवि! लपटों में आकर।
शोषित शापित मानव स्वर मय, होता किस जागृति में उठ करे?
(3)
जिस बेचैनी से युग बनता, इतिहास बनाता जो करबट।
जिन नूतन कर्म-शिखाओं में, परिवर्तन की मिलती आहट॥
जिस एक प्रभाती में कटते, छूँछ सपने पुँसत्व रहित।
जो ध्वंसमयी भैरवी विकल, करती तन का लोहू कुण्ठित॥
ये प्राण धरोहर अस्थिजाल, अवरुद्ध, विवश क्षय से बेकल।
मानव की मौन समस्या के, ये अर्थहीन टुकड़े निर्बल॥
ये कैसे किसी अदृश्य महा दानव के चूसे चिर कातर।
शोषित शापित मानव स्वर मय, होता किस जागृति में उठ करे?
*समाप्त*

