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Magazine - Year 1942 - Version 2

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जानते हैं, पर मानते नहीं हैं!

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अग्राह्यं मनसोयत्तद्धीरपि स्वीकरोति न।

जिज्ञासायाः प्रकाशेण जायते सत्यदर्शनम्॥

-पंचाध्यायी।

(यत) जो (मनसः) मन का (अग्राह्यं) अस्वीकार है (तत्) उसे (धीः) बुद्धि (अपि) भी (न) नहीं (स्वीकरोति) स्वीकार करती (जिज्ञासायाः) जिज्ञासा के (प्रकाशेण) प्रकाश से (सत्यं दर्शनं) सत्य का दर्शनं (जायते) होता है।

‘जानते हैं, पर मानते नहीं’ इस उक्ति को चारों ओर चरितार्थ होते हुए देखा जाता है। लेखनी और वाणी द्वारा उपदेश दिये जाते हैं, पर उनको स्वीकार करने वाले-अमल में लाने वाले-बहुत ही कम दिखाई देते हैं। तर्क, मनन और विवेचन में किसी बात को ठीक मान लिया जाता है, तो भी लोग ग्रहण करने को तैयार नहीं होते। कहते हैं कि विचारों से जीवन निर्माण होता है, पर विचार होते हुए भी आचरणों में अन्तर देखा जाता है। एक पंडित कथा कहते हुए बड़े बलपूर्वक यह उपदेश करता है कि धर्म पूर्वक जीवन बिताना चाहिए, परन्तु उसका निजी जीवन दुराचार से भरा हुआ देखा जाता है। पुजारी जी ईश्वर की पूजा करते हैं और उसे सर्वज्ञ मानते हैं, यदि कोई सर्वज्ञता के विरोध में कोई कुछ कहे, तो लड़ने को तैयार हो जाते हैं, परन्तु स्वयं चोरी करने के आदी हैं, मन्दिर में आई हुई पूजा की वस्तुओं को ही चुरा लेते हैं। मन्दिरों में बहुमूल्य वस्तुओं की चोरियों के समाचार अक्सर मिलते हैं, इन घटनाओं में प्रायः उन्हीं ईश्वर-सेवकों की करतूतें होती हैं। मन्दिरों के दरवाजे पर दर्शनार्थी लोग जूते उतार जाते हैं, आये दिन उनकी चोरियाँ होती रहती हैं। इस मथुरा नगरी में रहने के कारण हम भली प्रकार जानते हैं कि उनमें कितना हाथ ईश्वर के घर के मन्दिर के-द्वारपालों का होता है। यह देखकर बड़ी हैरत होती है कि धर्ममय जीवन की रट लगाने वाले पंडित स्वयं क्यों दुराचार में लिप्त हैं? और ईश्वर को सर्वज्ञ कहने वाले मन्दिरों के कर्मचारी चोरी क्यों करते हैं? राज दरबारों की स्थापना शान्ति और व्यवस्था के लिए-अपराध निवारण के लिए हुई हैं। एक राज कर्मचारी जानता है कि मेरा कर्तव्य अपराधों का निवारण करना है परन्तु कौन नहीं जानता कि रिश्वतों की कितनी भरमार हैं। अज्ञानी व्यक्ति अपराध करे, तो एक बात समझ में भी आती है कि बेचारा जानता न होगा, इसलिए गलती कर गया होगा, पर भली प्रकार जानने बुझने वाले, उस व्यवस्था का समर्थन करने वाले भी जब विपरीत आचरण करते हैं, तो बड़ा विस्मय होता है कि आखिर यह बात क्या है?

आचार और विचार में विरोध रखने वाले हमें ऐसे अनेक सज्जनों के संपर्क में आने का अवसर प्राप्त होता रहता है। उनमें से कोई-कोई महानुभाव हृदय खोल कर भी वार्तालाप करने की कृपा कर देते हैं। तब यह स्पष्ट हो जाता है कि जिन उत्तम सिद्धान्तों और आदर्शों को वे कहते हैं या जानते हैं वे उनके मस्तिष्क की सजावट मात्र हैं, उन विचारों ने उनके हृदय को स्पर्श नहीं किया है। हृदय उस बात को नहीं मानता, जिसे जिह्वा कहती है या मस्तिष्क धारणा करता है। हमारे पास अक्सर ऐसे सज्जन आया करते हैं, जो किसी विषय पर वाद-विवाद करते है। कभी-कभी हमारे विचार प्रश्नकर्ता के मत के विपरीत होते हैं। अनेक दृष्टिकोणों से, अनेक तर्कों से, अनेक प्रमाणों से, उन पर अपने विचार प्रकट करते हैं। विवाद की दृष्टि से उन्हें यह बात माननी पड़ती हैं, क्योंकि वे उसका खंडन नहीं कर सकते, नहीं फिर भी हम देखते हैं कि उस दाँता किट-किट का कुछ प्रभाव नहीं होता। “पंचों की आज्ञा सिर माथे पर परनाला जहाँ का तहाँ रहेगा।” उनकी मान्यता में विवाद में परास्त होने के कारण कुछ अन्तर नहीं आता। मथुरा तीर्थ में दूर-दूर के ख्याति नामा धर्माचार्य पधारते रहते हैं। वे लोग प्रायः अखण्ड ज्योति में पधारने की कृपा करने हैं, निजी वार्तालाप के सिलसिले में कभी-कभी सार्वजनिक विषयों पर चर्चा चल जाती है, “धर्म के नाम पर मन्दिर मठों में केवल कर्मकाण्ड के आडम्बर के लिए हिन्दू जाति का करोड़ों रुपया प्रति मास व्यय होता है, यदि यह शक्ति गौ रक्षा, विद्या प्रचार, धर्म प्रसार जैसे शास्त्रानुमोदित कार्यों में लगे तो कितना अच्छा हो।” हमारे इस कथन का खंडन करने को तो उनके पास कुछ नहीं होता, इसलिए चुप हो जाते हैं, और उपेक्षा के साथ प्रसंग को टाल देते हैं। इसी प्रकार और भी बहुत प्रकार के लोग ज्ञान चर्चा आरम्भ करते हैं, उनके मत के विरुद्ध जो बात होती है, उसे सुन तो लेते हैं, हमारे आदर की दृष्टि से या तर्क की निर्बलता से चुप भी हो जाते हैं, पर यह बातें उनके गले नहीं उतरतीं, जो उनकी मान्यता के विपरीत कही जाती हैं। ब्रिटिश राजनीतिक यह जानते तो हैं कि भारत का स्वाधीन होना उचित है, पर वे इसे व्यवहार में नहीं लाते। और अपने वर्तमान व्यवहार का समर्थन करने के लिए ऐसे तर्कों की रचना करते हैं, जिन्हें सुन कर अवाक् रह जाना पड़ता है।

देखा गया हैं कि, तर्क, प्रमाण, उपदेश और वादनुवाद का प्रभाव कुछ अधिक संतोषजनक नहीं होता। एक अशिक्षित व्यक्ति लोभ के कारण अधर्म का सहायक बन जाता है, तब हम सोचते हैं कि विद्या के अभाव के कारण ऐसा हुआ। पर जब एक वकील की झूठे मुकदमें को लड़ाते और उसके पक्ष में अनेक झूठे गवाह सिखा पढ़ा कर-मस्तिष्क की सारी शक्ति लगा कर-झूठे को सच्चा बनाने का तर्क करते देखते हैं, तो ख्याल होता है कि ग्रेजुएट होकर, कानून की उच्च शिक्षा प्राप्त करने के उपरान्त भी यह वहीं हैं, जहाँ वह लोभी अशिक्षित था। यह दोनों शिक्षित-अशिक्षित, सत्य की दृष्टि से एक समान ही ज्ञान वाले हैं। भेद इतना ही है कि एक का कार्य अक्षर ज्ञान के अभाव में भद्दा और गँवारू है, उसकी बुराई सब पर नग्न रूप में प्रकट हो जाती है, किन्तु वकील अपने कार्य को अक्षर ज्ञान के आधार पर चमकीले आचरण में रखे रहता है। यदि वकील से यह कहा जाय कि झूठे मुकदमें लड़ाकर न्याय की हत्या और असत्य की उन्नति में सहायता क्यों करते हो? तो वह आपको ऐसे-ऐसे लच्छेदार कारण बता सकता है कि उसकी बुद्धि की प्रशंसा ही करनी पड़ेगी। कितने ही सिद्धान्त और तर्क ऐसे घड़ लिये जाते है, जिनका सत्य से कोई सम्बन्ध नहीं, केवल व्यक्तिगत कारणों से उनकी प्रतिष्ठापना की गई हैं कहते हैं कि वृद्धावस्था में दाँत उखड़ जाने से एक व्याकरणाचार्य के मुख से विद्वानों की सभा में ‘पुँशुँ’ शब्द के स्थान पर ‘पुँछु’ शब्द निकल गया, इस पर उनका मजाक हुआ। उन्होंने फिर ‘पुँछु’ शब्द को ही सही सिद्ध करने की ठानी और ‘सारस्वत’ नामक एक पृथक व्याकरण ग्रन्थ केवल इसी लिए तैयार कर दिया। एक व्यक्ति एक बात चाहता है, यदि उसमें समझदारी है, तो ठीक, नहीं या तो अपनी चाहना के पक्ष में प्रमाण इकट्ठे कर लेता है या स्वयं गढ़ लेता है। इस तरह बेचारे तथाकथित ज्ञान-विज्ञान की इधर से उधर दुर्गति होती फिरती है। सत्य प्रेम और न्याय के स्थायी सुख शान्ति वाले सिद्धान्त एक कोने में पड़े रहते हैं, किन्तु अनीतिवान और स्वार्थी लोग अपनी विचारधारा को अनेक मार्गों से पुष्ट करते हुए आगे चलते जा रहे हैं।

पंचाध्यायी का यह श्लोक इसी गुत्थी पर प्रकाश डालता है, जिसे हृदय नहीं मानता, उसे मस्तिष्क स्वीकार नहीं कर सकता। कहते हैं कि चिकने घड़े पर पानी की बूँद नहीं ठहरती। हृदयगत धारणा के ऊपर शुष्क विचारों का कोई अधिक प्रभाव नहीं पड़ता। महात्मा गाँधी और कस्तूरबा गाँधी जैसी दिव्य आत्माओं का निकट सम्बन्धी-पुत्र-हीरालाल गाँधी-उनसे प्रभावित नहीं होता। कारण यही है कि जिसे हृदय नहीं मानता, उसे बाहर के विचारों द्वारा मनवाया नहीं जा सकता। जिद्दी, हठी, दुराग्रही, मूढ़, जड़, अनुदार, रूढ़िवादी, पोंगापंथी, लकीर के फकीर शब्द उन्हीं लोगों के लिए व्यवहृत होते हैं, जिनकी हृदयगत भूमिका किन्हीं विश्वासों पर अत्याधिक कठोरतापूर्वक जम जाती है और अन्य प्रकार के विचार- “यथा सराय भरी निरखि, पथिक आपु फिरि जायं,” के अनुसार कुछ प्रभाव नहीं करते। उसके लिए कोई भी ज्ञान, विचार, उपदेश, कारगर नहीं होता। उन्नति के स्रोतों को चारों ओर से रोककर वे एक ऐसी अँधेरी कोठरी में बैठ जाते हैं, जहाँ बाहरी प्रकाश की पहुँच नहीं हो पाती।

सत्य के शोधक का, वास्तविकता के जिज्ञासु का ब्रह्म प्राप्त करने के इच्छुक का, यह सर्वप्रथम कर्त्तव्य है कि हृदय की मूढ़ता को हटाकर उसे इस योग्य बनावे, जिस पर सत्य का प्रकाश पड़ सके। बिना इसके कोई भी व्यक्ति अक्षर ज्ञान या तर्क उपदेशों के आधार पर विवेकवान नहीं बन सकता। हृदय किन कारणों से मूढ एवं दुराग्रही हो जाता है और किन प्रक्रियाओं से उसे निर्मल, कोमल एवं सत्य को ग्रहण करने वाला बनाया जा सकता है, इसकी चर्चा अगले अंक में करेंगे।

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