समानता से मित्रता
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(सेठ प्रतापमल जी नाहटा)
मित्रता समानशील व्यक्तियों में ही होती है और ऐसी मित्रता ही अन्त तक निभती है। जो मित्र समानशील नहीं है, उनकी मित्रता वंचना मात्र है, वह किसी दिन नष्ट हो जायेगी या शत्रुता में परिणत हो जायेगी। महाराज द्रुपद और द्रोण कहने को तो बालसखा थे। दोनों एक ही आश्रम में पढ़े और खेले-कूदे थे। बचपन की मित्रता गाढ़ी नहीं थी, जीवन मार्ग भिन्न होते ही वह मित्रता जाती रही। आचार्य उस मित्रता को नहीं भूले थे पर द्रुपद भूल गये, क्योंकि द्रुपद ऐश्वर्यशाली सिंहासनाधीश्वर हुए और द्रोण दरिद्र के दरिद्र ही रह गये। द्रोण को यह नहीं मालूम था कि राजा जो हमारा बालसखा था हमें भूल जायेगा। वे यह समझते थे कि बालसखा के लिए हमारे हृदय में भी लगाव होगा और इसलिए यह तपस्वी ब्राह्मण एक महान तप की सिद्धि के पश्चात् सबसे पहले बड़े प्रेम और आनंद के साथ अपने बालसखा राजा द्रुपद से मिलने दौड़ गये। पास पहुँचते ही द्रोणाचार्य ने कहा-’राजन! मैं तुम्हारा मित्र हूँ।’ आचार्य और कुछ नहीं कह सके, क्योंकि इस दरिद्र ब्राह्मण का यह कहना कि मैं तुम्हारा मित्र हूँ, उस राजा को सहन नहीं हुआ। वह आग बबूला हो उठा। लाल-पीली आँखें निकाल और भौहें चढ़ाकर उसने कहा- “अरे दरिद्र ब्राह्मण! तुम किसको अपना सखा कहते हो? क्या कभी किसी ऐश्वर्यशाली राजा की किसी स्त्रीहीन दरिद्र ब्राह्मण से कोई मित्रता हुई है?’ संसार में अनेक मित्र ऐसे ही होते हैं जो यथार्थ में मित्र नहीं होते और मित्र धर्म का पालन नहीं, प्रत्युत स्वार्थ साधन किया करते हैं और जब तक जिससे स्वार्थ सिद्ध होता है, तब तक उसे मित्र बनाये रहते हैं, पीछे दूध में से मक्खी की तरह निकाल कर फेंक देते हैं इस प्रकार की मित्रता का जो वर्णन द्रुपद राजा ने आचार्य द्रोण को फटकारते हुए किया है, उसका नमूना साधारणतः सर्वत्र देखने में आता है और बहुतों के विचार मित्रता के सम्बंध में वैसे ही हो जाते हैं।
द्रुपदराज कहते हैं- ‘ऐश्वर्यशाली नरपतियों के साथ तुम्हारे जैसे स्त्रीहीन मनुष्य की मित्रता हो, यह नितान्त असम्भव है। बचपन में जरूर तुम्हारे साथ मित्रता थी परन्तु इस समय वैसी मित्रता का होना किसी प्रकार उचित नहीं है। किसी के साथ किसी की सदा मित्रता नहीं होती। या तो काल उसे नष्ट करता है या क्रोध से उसका नाश हो जाता है। इसलिए तुम पहले की उस मित्रता को अब दूर फेंक दो। हे प्रिय! पहले तुम्हारे साथ जो मित्रता थी, वह एक अर्थ के निमित्त थी। पंडित के साथ मूर्ख की और वीर के साथ कायर की मित्रता जैसे कभी नहीं होती, वैसे ही धनवान के साथ दरिद्री की मित्रता होना भी असम्भव है, इसलिए पहले की मित्रता बनी रखने के लिए तुम यहाँ क्यों आये हो? हे ब्राह्मण! धन और ज्ञान में जो तुम्हारी ही जैसे हों उन्हीं से मित्रता और बंधु भाव स्थापित करो। छोटे-बड़े में मैत्री नहीं हुआ करती है।
मित्र प्रेम से आये हुए द्रोण, राजा का यह भाषण सुनकर वहाँ से चले गये और सदा के लिए द्रुपद-राज के बैरी हो गये। द्रुपद और द्रोण बचपन के सखा थे और पीछे एक दूसरे के बैरी हो गये। इसका कारण क्या है? कारण यही हुआ, कि दोनों समानशील नहीं थे, दोनों का चरित्र एक दूसरे विपरीत था। मित्रता का जो स्नेह द्रोण में था वह द्रुपद में नहीं था। द्रुपद की बचपन की वह मित्रता स्वार्थ के लिए थी यह स्वयं उन्होंने ही स्वीकार किया है। पर द्रुपद का यह कहना कि धनी और दरिद्र में मित्रता नहीं हो सकती मिथ्या है। यह सच है कि वीर-कायर की मित्रता नहीं होती क्योंकि वीरता या कायरताशील स्वभाव में शामिल है और समान शील वालों में ही मित्रता हो सकती है परन्तु धन का होना या न होना शील स्वभाव की कोई बात नहीं है। दरिद्र पुरुष भी त्यागी हो सकता है और धनी पुरुष कृपण हो सकता है। उदारता और कृपणता शील हैं, उदार और कृपण एक दूसरे के मित्र नहीं हो सकते। पर धनी और दरिद्र हो सकते हैं। अवश्य ही धनी और दरिद्र की मित्रता के उदाहरण संसार में थोड़े हों पर वे दुर्लभ उदाहरण ही मैत्री के आदर्श हैं।

