वीर्यवान्-बनो।
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(श्री स्वामी सत्यदेव जी परिव्राजक)
‘वीर्य’ इस शब्द में जादू भरा है। इसके उच्चारण करने से श्रेष्ठ महान और पवित्र भावों का संचार होने लगता है। ईश्वर वीर्यवान है, रामचंद्रजी बड़े यशस्वी वीर्यवान राजा थे, भीष्म ने आयु भर वीर्य का निग्रह अखण्ड ब्रह्मचर्य धारण किया, वीर्यवान पुरुष क्या नहीं कर सकता, वीर्यवती जाति ही संसार में अपना साम्राज्य स्थापित कर सकती है। इन पाँच वाक्यों को पढ़ने से कैसे-कैसे भाव हृदय में उदय होने लगते हैं। संसार में जो कुछ निरोग, सुन्दर, स्वरूपवान, कान्तिमय, मनोहर है, जो कुछ वीर, ओज, पराक्रम, पौरुष, तेज विशेषणों से प्रकट होता है तथा धैर्य, निर्भीकता, बुद्धिमत्ता, सौम्य, मनुष्यत्वादि गुणों से जो विचार उत्पन्न होते हैं, वे सब ‘वीर्य’ इस शब्द के अंतर्गत हैं। जैसे सूर्य संसार को प्रकाश देता है, इसी प्रकार ‘वीर्य’ मनुष्य, पशु, पक्षी और वृक्ष में अपना प्रभाव दिखलाता है। जिस प्रकार सूर्य की रश्मियों से रंग-बिरंगे फूल विकसित होकर प्रकृति का सौंदर्य बढ़ाते हैं, इसी प्रकार यह शुद्धवीर्य भी अपने भिन्न-भिन्न स्वरूपों में अपनी प्रभा की छटा दिखाता है।
संसार वीर्यवान के लिए है। वीर्यवती जातियों ने संसार में राज्य किया और वीर्यहीन होने पर उनका नामोनिशान मिट गया। जिन प्रसिद्ध मुसलमान वीरों ने अपनी चमकती हुई तलवारों से यूरोप, एशिया में बड़े-बड़े साम्राज्य स्थापित किये थे, वे व्यभिचार आदि दोषों में फंसकर अपना सर्वस्व खो बैठे, जिन महाराष्ट्र शूरवीरों ने मुसलमानी राज्य को छिन्न-भिन्न कर भारत में हिन्दू राज्य स्थापित किया था वे भी विषय भोग, परस्पर की फूट तथा कलह के कारण अपनी सब आशाओं पर पानी फेर बैठे। यूरोप की बड़ी-बड़ी जातियों का इतिहास भी इसी वीर्य की महिमा को बतलाता है। यूरोप की जिस स्पेन जाति ने नई दुनिया में अपनी विजय पताका उड़ाई थी, वही स्पेन समृद्धिशाली होने पर विषय भोग का शिकार बन गया और अपने एक-एक उपनिवेश को वीर्यहीनता वश खो बैठा। यद्यपि तोप बंदूक तथा सैन्य-संघ युद्ध में विजय कीर्ति प्राप्त करने में बड़ी भारी सहायता देते हैं, परन्तु उन सबकी तह में, उनकी जड़ को मजबूत करने वाला, उनमें धैर्य, सहनशीलता आदि सच्चे वीरोचित गुणों को भरने वाला यदि कोई है तो वह ‘वीर्य’ ही है। किसी जाति के पास बड़े-बड़े आविष्कार न हों, भले ही वह जंगी राष्ट्र न हो, किन्तु यदि उसके पास चरित्रबल को संगठित करने वाला तथा दैवी गुणों का विकास करने वाला ‘शुक्र’ है तो उस जाति के बच्चे कभी भी संसार के सामने सिर नहीं झुका सकते।
इसलिये वीर्य के इन गुणों की महिमा को हमें स्पष्टतया समझ लेना चाहिए और यदि संसार में रह कर अपने जीवन की सार्थकता को सिद्ध करने की आकाँक्षा है तो इस रत्न की रक्षा करने में अपनी सब शक्तियों को लगाकर इसके द्वारा दैवी गुणों को प्राप्त करने में कटिबद्ध होना चाहिए।
प्राण-भूत इस शक्ति को खो देने से मनुष्य प्राकृतिक परिवर्तनों का सामना नहीं कर सकता। साधारण शीत वायु उसको जुकाम लगा देता है और वह छोटे-छोटे कारणों से झट खटिया की शरण लेने लगता है। रुधिर की गति मंद हो जाने के कारण उसका हाजमा बिगड़ जाता है और संग्रहणी, बवासीर, क्षय (तपेदिक) आदि रोग उस पर अपना अधिकार जमा लेते हैं।
=कहावत=============================
यह ठीक है कि परमेश्वर प्रत्येक जीव को भोजन देता है, परन्तु यह भी ठीक है कि वह किसी के भी मुख में ग्रास नहीं रख जाता।
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