मनुष्य मात्र को प्यार करो।
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(जोसेफ मेजेनी)
हमें मनुष्य जाति को सिखलाना है कि सम्पूर्ण मनुष्य जाति एक अंगी के समान है, हम सब उसके अंग हैं, अतएव उस अंगी की पुष्टता और वृद्धि के लिए परिश्रम करना और उसके जीवन को अधिक उपयोगी और उद्यमी बनाना हम सबका कर्त्तव्य है। उन आत्माओं को भी उन्नत और पवित्र बनाना हमारा काम है जो स्वयं उन्नति और पवित्रता के विरोधी हों। ईश्वरीय इच्छा इस पृथ्वी पर मनुष्य जाति के परस्पर मेल-मिलाप से ही पूरी हो सकती है, इसलिये अभी हमको यहाँ पर एक ऐसी एकता की स्थापना करनी है, जो सर्वसाधारण की दशा को उन्नत करने वाली हो, जो भिन्न-भिन्न भागों में विभक्त मनुष्यों को एक केन्द्र में लाने वाली हो और कुटुम्ब और देश दोनों को इस उच्चतम और पवित्र उद्देश्य के लिए प्रेरित और प्रवृत्त करें।
जिस प्रकार ईश्वर के नियम और उसकी दया सम्पूर्ण मनुष्यों के लिए है, उसी प्रकार तुम्हारे वचन और कर्म भी मनुष्य मात्र के लिए होने चाहिये। चाहे तुम किसी देश विशेष में रहते हो, किन्तु जहाँ कोई मनुष्य ऐसा मिले, जो सत्य, न्याय और धर्म के लिये लड़ रहा हो तुम उसको अपना भाई समझो। चाहे कहीं पर किसी मनुष्य को भूल, अन्याय या अत्याचार के कारण कष्ट पहुँच रहा हो, वह तुम्हारा भाई है। स्वाधीन हो या पराधीन तुम सब भाई हो, तुम्हारी जड़ एक है एक ईश्वरीय नियम है तुम सब अधीन हो और एक ही अभीष्ट स्थान पर तुम सबको पहुँचना है। अतएव तुम्हारा धर्म और तुम्हारे कर्म एक होने चाहिये, क्योंकि एक ही झंडे के नीचे होकर तुम्हें लड़ना है। यह मत कहो कि-”जो भाषा हम बोलते हैं वह एक नहीं” हमारे कर्म, हमारी इच्छायें, हमारा जन्म और हमारा मरण एक ऐसी भाषा है, जिसको सब जानते और समझते हैं। यह भी न कहो कि “मनुष्य जाति असंख्य और असीम है और हम अल्प और निर्बल हैं।” ईश्वर कर्म को नहीं देखता, किन्तु भाव को जाँचता है।
मनुष्य जाति को प्यार करो। जब तुम अपना काम अपने कुटुम्ब या देश की सीमा में आबद्ध होकर करने लगो तो पहले अपने आत्मा से पूछो कि- ‘यदि यही काम जो मैं अब करने लगा हूँ सारे मनुष्य करते और सब मनुष्यों के लिए किया जाता तो यह मनुष्य जाति के लिए हितकर होता या अनिष्टकर? यदि तुम्हारी आत्मा तुम्हें बतलावे कि यह अनिष्टकर होगा तो कदापि उसका अनुष्ठान न करो, चाहे तुम्हें यह भी विश्वास हो कि इस धर्म का परिणाम तुम्हारे देश या कुटुम्ब के लिए सदा हितकर होगा।
तुम इस सार्वजनिक धर्म के उपासक बनकर जातीय ऐक्य और समता का उपदेश करो, जिसको आजकल सिद्धाँत रूप से तो माना जाता है, किन्तु आचरण से नहीं। जहाँ कहीं और जितना तुम ऐसा कर सकते हो, ऐसा ही करो। इससे अधिक न ईश्वर तुमसे चाहता है और न मनुष्य आशा कर सकता है। किन्तु मैं तुम्हें बतलाता हूँ कि यदि तुम दूसरों को ऐसा न बना सको और केवल आप ही ऐसे बन जाओ तब भी तुम मनुष्य जाति की सेवा करते हो। ईश्वर शिक्षा की सीढ़ियों को नापता है वह मनुष्य जाति को धर्मात्माओं की संख्या और अभिरुचि के अनुसार बढ़ने देता है और जब तुम में धर्मात्मा, परोपकारी अधिक होंगे तो ईश्वर जो तुम्हें गिनता है आप तुम्हें बतलायेगा कि तुम्हें क्या करना चाहिए।
=कोटेशन============================
दुनिया में अगर करोड़ों ईसा, मुहम्मद, बुद्ध, राम या कृष्ण जन्म ले लें तो भी तुम पार नहीं हो सकते। अपने प्रयत्न और परिश्रम से ही मनुष्य का कल्याण होता है।
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