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Magazine - Year 1945 - Version 2

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देशी नरेशों; चेत जाओ!

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(ले.- औंध-राजकुमार श्री अप्पा साहब)

जमाने की ओर से आँखें मूँद कर चलना रजवाड़ों के हक में अच्छा नहीं हो सकता। उन्हें सदा के लिए यह महसूस कर लेना चाहिये कि वे एक ऐसे लोकतंत्र युग में हैं जिसमें सामन्तशाही संगठनों का अस्तित्व बर्दाश्त नहीं किया जा सकता। जब तक ये प्रजा के सुख को आधार मान कर देश की राजनैतिक आर्थिक उन्नति की योजना में उपयुक्त भाग नहीं लेते। इस समय हिन्दुस्तान के कोने-कोने की जनता की जागृति हो चुकी है और वह देश की संस्थाओं तथा आदर्शों की छानबीन इस अभिप्रायः से कर रही है कि अगर ये संस्थाएं और आदर्श उसके लिए उपयोगी हों तो उन्हें कायम रखें, अन्यथा भेंट दें।

देशी नरेशों को भी अपनी स्थिति महसूस करनी है। उन्हें मोटर गाड़ियाँ, नफीस कालीन आदि सामान रखने तथा उम्दा खाना-खाने का क्या अधिकार है? जबकि इन्हें आराम की ये चीजें प्रदान करने वाले गरीबी और मुहताजगी में मर रहे हैं तो इन रजवाड़ों को इन चीजों से मौज करने का हक कैसा? प्रजा इन्हें धन इसलिये देती है कि ये उसका संरक्षण करें और उसके हित में शासन चलावें। प्रजा के पास इस बात के काफी सबूत हैं कि राजाओं ने अपने इस कर्त्तव्य का पालन नहीं किया है और इसलिए राजाओं को अपनी इस कर्त्तव्यपरायण मुखता को महसूस करना जरूरी है। इन्हें यह महसूस करना है कि जितने में ये एक मोटर रखते हैं उतने में एक साल के लिए 40 गाँवों में स्कूल चलाने की व्यवस्था की जा सकती है। रजवाड़ों को प्रजा को ज्ञान प्राप्ति के साधन-स्कूलों से वंचित रखने का क्या अधिकार है? देश नरेशों को यह भी समझना है कि जितने में एक राजमहल बनता है उतने में हजारों व्यक्तियों को मनुष्य के रहने लायक झोपड़ियाँ प्रदान की जा सकती हैं। राजाओं की नस-नस में जो खून बहता है वह प्रजा पर ही निर्भर है। अगर हम इन बातों को महसूस कर लें तो प्रजा पर लाठी प्रहार कराने की हिम्मत नहीं कर सकते।

आखिर प्रजा हमसे चाहती क्या है? यही न कि उसे मनुष्य की तरह जीने का अधिकार मिले? यह तो उसका राष्ट्रीय अधिकार है जो उसे मिलना ही चाहिए। जो काम करता है उसे उसका मेहनताना मिलना जरूरी है।

भारतवासियों ने ये बातें महसूस की हैं। उन्होंने यह भी समझा है कि एक राजनैतिक सत्ता का अस्तित्व उनके लाभ के लिए होना चाहिये जिनसे वह बनी है। इस वक्त की जागृति से लड़कर पार पा जाना राजाओं के लिए असंभव है। एक व्यक्ति अथवा एक समूह से जनसाधारण हमेशा ही अधिक शक्तिशाली रहा है। अनेक राजाओं ने इस सत्य का अनुभव कर लिया है। राजा आते और जाते हैं, साम्राज्यों का उत्थान-पतन होता है, मगर प्रजा जैसी की तैसी रह जाती है। चाहे जितना लाठी प्रहार और दमन कीजिये आप प्रजा को हरा नहीं सकते।

नरेशो! सावधान हो जाइये। आप जो महसूस करते हैं कि आप ताकत वाले हैं, वह गलत है। जन-आन्दोलन रूपी तुषारपात के आगे आपकी ताकत टिक नहीं सकती। आपके पीछे जो ताकत है वह प्रतिक्रिया और अत्याचार की ताकत है। जो आपको इस तुषारपात से बचा नहीं सकती। राजाओं! सचेत होकर यह महसूस कीजिये कि आज तक किसने आपको आहार दिया है? किसने आपको पीढ़ियों से ऐश के सामान प्रदान किये हैं? रजवाड़ों! अपने अन्नदाताओं के आगे माथा टेकिये। सिर्फ वे ही आपकी रक्षा कर सकते हैं। लेकिन कब वे आपकी रक्षा करेंगे? तभी, जब आप अपनी वास्तविक स्थिति महसूस करेंगे और यह समझ लेंगे कि आपके शरीर के खून का एक-एक बूँद प्रजा का दिया हुआ है जिसको प्रतिदिन आपको उसे देना है। आप पुराने राजाओं के ध्येय को भूल गए होंगे। सेवा ही उनका धर्म था और उसे ही अपने अस्तित्व का आधार मानते थे। जितना ही आपने प्रजा से पाया है, उसे उतना ही अधिक देने के लिए आप जिम्मेदार हैं। लेकिन तब तक आप उसे उसका हिस्सा नहीं दे सकते जब तक आप मोटर के आरामदेह गद्दों पर बैठ कर क्यों चलेंगे? और कीमती कालीनों पर क्यों सोयेंगे? आपको प्रजा के बीच प्रजा की ही तरह रहना है। तभी आप उसकी तकलीफों को समझ सकेंगे। जूता पहनने वाला ही समझ सकता है कि जूता कहाँ पर कैसे काटता है। जनता अपनी तकलीफों को समझती है और उनका इलाज भी वह जानती है।

इस समय इस राजनैतिक विकास के युग में आपका कर्त्तव्य प्रजा का संरक्षक होकर रहना है। अब तक आप जिन चीजों को अपनी चीज समझते आए हैं, समझिये कि वे उस प्रजा की हैं जिसने इन्हें पैदा किया है। इन चीजों का टुकड़ा-टुकड़ा प्रजा की धरोहर के रूप में आपको रखना है। आपको प्रजा को इनका इन्तजाम सौंप देना चाहिए। अधिक से अधिक जो आप कर सकते हैं वह यह कि आप अगर यह समझें कि प्रजा का इन्तजाम ठीक नहीं है तो सच्चे दिल से उसे अपनी सलाह दे दें। प्रजा को अपना शासन खुद करने का अधिकार है और उसके लाभ की व्यवस्था करने वाले उसके संरक्षक ही हो सकते हैं।

धन और विलास रचनात्मक योग्यता तथा स्पष्ट विवेकशीलता का नाश कर देते हैं। अगर आप प्रजा को प्यार करें और उसकी सेवा करते रहें तो आप अमर हो जायें। अगर आप खुद अपना कर्त्तव्य नहीं समझ सकते, तो बुद्धिमानों की बातें सुनिये और सचेत होकर आगे बढ़िये।

बीती को बिसारिये। अगर आप अब तक अत्याचारी रहे हैं तो कोई बात नहीं, प्रजा आपको माफ कर देगी। स्नेह और सहानुभूति का जवाब वह इन्हीं से देगी। वह उन्हीं का सम्मान करेगी जो उसकी सेवा करेंगे। अगर आप यह समझें कि अभी भी प्रजा आप को प्यार करती है तो आप गलती पर हैं। वह आप से प्रेम नहीं करती, डरती है। कभी आपने सुना है कि आपके सामने माथा टेकने वाले परोक्ष में क्या कहते हैं? वास्तव में उनके शब्द आदर सूचक नहीं कहे जा सकते। आप में से बहुत कम को सच्चा सम्मान नसीब हुआ होगा। आप प्रजा को प्रेम की दृष्टि से देखिये और उसकी सेवा कीजिये फिर तो कोई भी आपको आपके पद से नहीं हटा सकता। आपके लिए यही एक रास्ता है। प्रजा की सेवा और संरक्षण ही आपका धर्म और कर्त्तव्य है। जिस रास्ते अभी आप चल रहे हैं उसमें आपकी खैरियत नहीं और न आपको कोई सुख मिलेगा। आपकी सुरक्षा और सुख आपकी रियासती प्रजा और सम्पूर्ण भारतवासियों पर निर्भर है।

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