पुरुषार्थी ही विजयी होता है।
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(डॉ. रामचरण महेन्द्र, एम. ए. डी. लिट्)
तुम्हारी हार्दिक कामना होती है कि हम विद्वान् बनें, मजबूत बनें, व्यापार में प्रचुर धन राशि एकत्रित करें, आध्यात्मिक जगत में अपूर्व धन संग्रह करें, पर इन सबकी पूर्ति क्यों नहीं हो पाती? कारण यह है कि तुम यह समझते हो कि कोई दूसरा ही आकर तुम्हें ये सब कुछ दे जायेगा, अपने आप ही ये सब प्राप्त हो जायेंगी। तुम्हारा निश्चय निर्बल है। उसमें संशय घुस गया है। खेद है कि तुम अपना इरादा इतना दृढ़ नहीं बनाते कि कार्य सिद्धि हो जाय। जहाँ एक दो साधारण सी कठिनाइयाँ उपस्थित हुई, कार्य दुष्कर प्रतीत हुआ कि तुम नौ दो ग्यारह होने की सोचने लगते हो। ऊलजलूल बातें सोचकर तुम अपने कार्य में शिथिलता ले आते हो। तुम्हारे निश्चय ढीले-ढाले हो जाते हैं, विचार शक्ति अत्यन्त पंगु हो जाती है। तुम्हारा सामर्थ्य नष्ट-भ्रष्ट हो जाता है।
संसार की रंगस्थली में वे ही कर्मयोगी विजय लाभ करते हैं जो “निष्फलता” तथा “भय” की भावना को अंतःकरण से बहिष्कृत कर देते हैं। उसका ध्यान, चिंतन अथवा कल्पना तक नहीं करते, प्रत्युत उस ओर ही अपनी समस्त शक्ति उन्मुख रखते हैं। आत्मश्रद्धा तथा विश्वासपूर्वक अधिकाधिक समय तक अभ्यास करने से भय-से मुक्ति तो मिलती ही है, साथ ही हृदय का दौर्बल्य भी दूर होता है। व्यर्थ अनिष्टकारी चिंतन ही तो हार्दिक दुर्बलता का मूल है।
तनिक अपने स्वर्ण जैसे सुनहरे जीवन की ओर देखो। तुम क्यों अपनी इच्छाओं का दमन करते हो? क्यों अपनी आशाओं का खून करते हो? तुममें तथा एक उन्नत व्यक्ति में कौन-सा जमीन आसमान का अन्तर है? कौन तुम्हें अग्रसर होने से रोक रहा है? तुम स्वयं ही अपने शत्रु बन गए हो।
उठो! जागृत हो जाओ। अपने वास्तविक स्वरूप को पहचानो। अपने उज्ज्वल भविष्य को निहारो। तुम तुच्छ नहीं, महान हो। तुम्हें किसी अशक्तता का अनुभव नहीं करना है। कुछ माँगना नहीं है। तुम अनन्त शक्तिशाली हो। तुम्हारे बल का पारावार नहीं है। जिन साधनों को लेकर तुम पृथ्वीतल पर अवतीर्ण हुए हो वे अचूक ब्रह्मास्त्र हैं। इनकी शक्ति अनेक इंद्रवज्रों से अधिक है। सफलता और आनन्द तुम्हारे जन्मजात अधिकार हैं। उठो! अपने को, अपने दिव्य हथियारों को भली-भाँति पहचानो, काम में लाओ और बुद्धिपूर्वक कर्त्तव्य मार्ग में जुट जाओ। फिर देखें कैसे वह चीज नहीं प्राप्त होती जिसे तुम चाहते हो। तुम कल्पवृक्ष हो (जो सब इच्छा पूर्ति करता है) तुम पारस हो (जो स्पर्श शक्ति से लोहे को स्वर्ण कर देता है) तुम सफलता की साक्षात मूर्ति हो।
तुम शरीर नहीं हो, जीव नहीं हो, वरन् महान आत्मा हो। तुम वासनाओं के गुलाम नहीं हो, आदतें तुम्हें मजबूर नहीं कर सकती। पाप तथा अज्ञान में इतनी शक्ति नहीं है कि वे तुम्हारे ऊपर शासन कर सकें।
स्मरण रखो अपने को हीन, नीच, पतित, पराधीन और दीन-हीन मानना एक प्रकार की आत्महत्या करना है।
आध्यात्म शास्त्र का सन्देश है कि-’ऐ महान पिता के महान् पुत्रों! अपनी महानता को पहचानो। उसे समझने में, खोजने में और प्राप्त करने में तत्परतापूर्वक जुट जाओ। तुम सत् हो, चित् हो, आनन्द हो। अपनी वास्तविकता का अनुभव करो, उसे दैनिक जीवन में प्रकट करो। निरन्तर पुरुषार्थ करते रहो क्योंकि पुरुषार्थी ही विजयी होता है।

