अपना स्वभाव चिड़चिड़ा मत कीजिए।
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(प्रो. रामचरण महेन्द्र, एम.ए.)
मानव स्वभाव के दुर्गुणों में चिड़चिड़ापन आन्तरिक मन की दुर्बलता का सूचक है। सहिष्णुता के अभाव में मनुष्य बात-बात में चिढ़ने लगता है, नाक भौं सिकोड़ता है, प्रायः गाली-गलौज देता है। मानसिक दुर्बलता के कारण वह समझता है कि दूसरे उसे जान बूझ कर परेशान करना चाहते है उसके दुर्गुणों को देखते हैं, उनका मजाक उड़ाते हैं। किसी पुरानी कटु अनुभूति के फलस्वरूप वह अत्यधिक संवेदनशील हो उठता है। और उसकी भावना ग्रन्थियाँ उसकी गाली-गलौज या बेढंगे व्यापारों में प्रकट होती हैं।
चिड़चिड़ेपन के रोगी में चिंता तथा शक सूबे की आदत प्रधान है। कभी-कभी शारीरिक कमजोरी के कारण, कब्ज, परिश्रम से थकान, सिर दर्द, नपुँसकता के कारण आदमी तनिक उठता है। अपनी कठिनाइयों तथा समस्याओं को उद्दीप्त होकर देखते-देखते उसे गहरी निराशा हो जाती है। चिड़चिड़ापन एक पेचीदा मानसिक रोग है। अतः प्रारम्भ से ही इसके विषय में हमें सावधान रहना चाहिए।
जिस व्यक्ति में चिड़चिड़ेपन की आदत है, वह सदा दूसरों के दोष ढूंढ़ता रहता है। वह व्यक्ति अन्य व्यक्तियों की दृष्टि में तो बुरा होता ही है। स्वयं भी एक अव्यक्त मानसिक उद्वेग का शिकार रहता है। उसके मन में एक प्रकार का संघर्ष चलता है। वह भ्रमित कल्पनाओं का शिकार रहता है। उसके संशय ज्ञान-तन्तुओं पर तनाव डालते हैं। भ्रम बढ़ता रहता है। और वह मन ही मन ईर्ष्या की अग्नि में दग्ध होता रहता है। वह क्रोधित, भ्रान्त, दुःखी सा नजर आता है। तनिक सी बात में उसकी उद्विग्नता का पारावार नहीं रहता। गुप्त मन पर प्रारम्भ में जैसे संस्कार जम जाते हैं, उनके फलस्वरूप ऐसा होता है। यह आदत से पड़ने वाला एक संस्कार है।
रोग से मुक्ति के साधन -
मन में दृढ़ निश्चय करना चाहिए कि चिड़चिड़ापन बुरा है। हम उसे अपने स्वभाव में से निकालना चाहते हैं। हम दूसरों के बोलने, हँसने मजाक, या कार्यों से नहीं चिड़ेंगे हम उनकी परवाह न करेंगे। अपने स्वभाव में मृदुत सरस बनेंगे, सहिष्णु बनेंगे।
मनुष्य के मन में सत् तथा असत् दोनों प्रकार के विचारों का क्रम चला करता है। अपने दुर्बल विचारों के प्रति बड़ा सतर्क रहना चाहिए। जब कोई चिन्ता या निराशाजनक बात मन में आवे, आप उसके प्रतिकूल भावना कर उद्रेक कीजिये। चिड़चिड़ेपन के दमन के लिए मृदुता, प्रसन्नता, सहानुभूति की भावना अत्यन्त लाभदायक है। प्रबलता से मन में शुभ संकल्प जाग्रत कीजिए।
जब कभी आपको क्रोध आवे तो आप मन ही मन कहिए “दूसरों से गलती हो ही जाती है। मुझे दूसरों की गलती पर क्रुद्ध नहीं होना चाहिए। यदि दूसरे गलती करते हैं, तो उसका यह मतलब नहीं कि मैं और भी गलती कर उसका प्रतिशोध लूँ। मैं शुभ संकल्प वाला साधक हूँ। शुभ संकल्प के फलित होने के लिए उद्विग्न मन होना उचित नहीं। हम सहिष्णु बनेंगे। दूसरे स्वयं अपनी गलती का अनुभव करेंगे हम धैर्य धारण करें।
जितना ही आप विचारों को ऊपर लिखित भावनाओं पर एकाग्र करेंगे, उतना ही बल आपको मिलेगा। पुनः पुनः दृढ़ता से उन में स्मरण करने से स्वभाव बदल जायेगा, प्रकृति मधुर बन जाएगी। आवेश को रोकने से मन को बल मिलेगा।
अपने दैनिक व्यवहार में प्रेमी, सहानुभूतिपूर्ण, सौम्य और प्रसन्नमुद्रा से काम लीजिये। इस मधुर स्वभाव का प्रभाव आपके कुटुम्ब पर तथा समाज पर बहुत अच्छा पड़ेगा। सुख शान्ति से जीवन व्यतीत करने के लिए मिष्ट भाषी और मधुर स्वभाव सर्वोत्तम तत्व है। मधुरता का प्रवाह तुम्हारे इर्द−गिर्द वातावरण में फैल जायेगा। चिड़चिड़ा होना आपकी एक बड़ी कमजोरी है, मधुरता से, सरसता से और प्रसन्नता से उसे ठीक कर लीजिये। ऐसे मधुर वचन बोलिये कि छोटे बच्चे आपके चारों ओर आकर्षित होकर चले आये, पत्नि प्रसन्न हो उठे, नौकर भी प्रसन्नता से आपकी आज्ञा वजा लायें। संकल्प की दृढ़ता, आवेश को रोकने तथा मधुर आदर्श सामने रखने से निश्चय ही आप चिड़चिड़ेपन से छुटकारा पा सकेंगे।

