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Magazine - Year 1951 - Version 2

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अविद्या डाकिनी से बच भागो

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(श्री स्वामी भोले बाबाजी महाराज)

विपरीत ज्ञान का नाम अविद्या है। अथवा जैसे वस्तु हो उसको वैसी न जानना किन्तु उससे अन्य प्रकार की जानना, उसका नाम अद्य है। लोक में इसको मूर्खता कहते हैं, शास्त्रकार इसी को अविवेक, अविचार, अज्ञान, मोह आदि नामों से पुकारते हैं। यह अविद्या यानी मूर्खता ही समस्त अनर्थों का कारण है। इसी के कारण से मनुष्य, चतुर मनुष्य, अपने को पंडित मानने वाले भी आपको यानी अपने स्वरूप को भी नहीं जानते! बालक से भी पूछा जाय कि तू देह है या तेरा देह है, तो उत्तर देता है कि मेरा देह है, मैं देह नहीं हूँ, इससे स्पष्ट है। कि देह से, देह का मालिक, देह वाला मित्र है। फिर भी सब आपको देह ही समझते हैं, देह ही मानते हैं देह ही जानते हैं, और देह ही कहते हैं।

विद्वानों का वचन है कि “जो मूढ़ आप कुछ है, मानता अपने को कुछ है, आत्मा को-आपको चुराने वाले उस चोर ने कौन सा पाप नहीं किया यानी सब पाप कर लिये। यह अविद्या ही सब पापों की कराने वाली है। इसी के कारण से मनुष्य आपको भूल कर देह आदि को आत्मा यानी अपना स्वरूप मानने लगता है और जन्म-मरण के चक्र में पड़कर अनेक योनियों में जन्म लेकर अनेक दुःख भोगता है किन्तु जीव के साथ जीती है।

विद्वानों का वचन है कि संसार में मूर्खता ही दुःख है, इसके सिवाय अन्य कोई दुःख नहीं है, सर्प का काटा एक बार मरता है, विष खाने वाला भी एक ही बार मरता है, अविद्या तो बार-बार मरती है, करोड़ों जन्म तक भी जीव इससे छूट नहीं सकता अथवा यों कहिए कि इससे छूटने की कभी भी आशा ही नहीं है। कई विद्वान कहते हैं कि-यह अविद्या घोर अन्धेरी रात है इसमें विचरने वाला करोड़ों वर्षों युगों तक ठोकरें खाता रहता है। यह अविद्या भीषण पिशाचिनी है, जो निरन्तर प्राणियों का माँस खाती रहती है। क्या यह अविद्या भयंकर नहीं है? जो अपने में पड़ने वाले जीवों को डुबाती उछालती हुई दुःखी करती रहती है। यह अविद्या क्षय रोग की बीमारी है, घुला-घुला कर सुखा कर जीवों को मारती रहती है, चैन से सोने नहीं देती! यह सब कथन ठीक ही हैं, अविद्या ऐसी ही है। समस्त अवगुणों की हानि और समस्त शुभ गुणों को चुराने वाली यह अविद्या ही है कोई धीर, वीर ही, जिसके ऊपर ईश्वर की कृपा हो, इस डाकिनी के पंजे में से छूट सकता है नहीं तो सब उसके पंजे में फँसे ही रहते हैं निकल नहीं सकते।

निकल कैसे सकते हैं? कोई एक दो चुड़ैल के वश हों, तो निकल सकते हैं, यहाँ तो यह भूतनी सबके सिर के ऊपर चढ़ी हुई यह पिशाचिनी सबको नचा रही है, और आप उनका तमाशा देख रही हैं। कोई स्त्री की कामना से दुःखी होकर रो रहा है, कोई पुत्र की इच्छा से आँसू बहा रहा है, इतना ही नहीं, दूसरे से लड़ रहा है, कट रहा है, मर रहा है, दुःखी हो रहा है। अविद्या ने सबकी आँखें बन्द कर दी हैं, सब अन्धे कर दिये हैं, इसलिये कहीं कोई किसी से रोग कर रहा है, कोई किसी से द्वेष कर रहा है, कोई किसी की चोरी कर रहा है, कोई किसी की जमीन दबाना चाहता है। सारांश यह है कि आंखें बन्द होने के कारण सब ठोकरें खा रहे हैं, हाय-हाय कर रहे हैं, जिसके करने से दुःख उठाते हैं, उसी को बारम्बार करते हैं सुखी नहीं होते, उलटे दुःखी ही होते हैं, फिर भी दुःख के कार्य को नहीं छोड़ते, यह आश्चर्य है। इस प्रकार आप सभी इस अविद्या के वश दुःखी हैं, करोड़ों में कोई विरला एक विवेकी ही इससे मुक्त हो तो भले हो।

इस अविद्या की निवृत्ति विद्या से होती है। सत् शास्त्रों का पठन-पाठन करने से और सन्त महात्माओं का संग करने से विद्या की प्राप्ति होती है, विद्या की प्राप्ति होते ही, जैसे उजाले के होते ही अन्धेरा दूर हो जाता है, इसी प्रकार अविद्या दूर हो जाती है, जैसे आँख बन जाने से मनुष्य सब वस्तुऐ देखने लगता है, इसी प्रकार भाग्यवान अधिकारी सत्य असत्य का विवेकी हो जाता है विवेकी पुरुष न तो कभी शोक करता है, न मोह करता है न किसी से भय करता है, न किसी से वैर करता है, किन्तु निःशंक, निर्मोह, निर्भय और निडर होकर सुख पूर्वक विचरता है। अब तक जो दुःखी और दीन नहीं होता, किन्तु सुखी, धीर, वीर और उदार हो जाता है। जैसे कल्प करने से मनुष्य फिर नये सिरे से वृद्ध से युवा हो जाता है। उसी प्रकार यह धीर पुरुष काया पलट हो जाता है। कल्प करने से तो स्थूल शरीर ही पुष्ट होता है विद्या से तो सूक्ष्म और को रण शरीर स्वस्थ हो जाते हैं, इतना ही नहीं किन्तु आत्मा अनात्मा का विवेक होने से अनात्मा से वैराग्य हो जाता है और धीर पुरुष आत्मा का अनुसंधान करता हुआ अजर अमर हो जाता है।

सत्शास्त्रों के पढ़ने से और सत्संग करने से विद्या उदय होती है, अविद्या अस्त हो जाती है, इसलिये श्रेयकांक्षी को सत् शास्त्र का अवलोकन और संत महात्माओं का सत् कर्तव्य है। ऐसा करने से विचार रूपी सूर्य उदय होता है, अविद्या रूपी रात्रि भाग जाती है, अविद्या रूपी रात्रि के भाग जाने पर उसमें विचरने वाले काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद, मत्सर, ईर्ष्या, द्वेष, असूया, ममता, अहंता, कृपणता आदि अशुभ गुण भाग जाते हैं और उनके भागते ही शर्म, दम, शान्ति, सन्तोष, दया, क्षमा, समता, एकाग्रता, वीरता, धीरता, उदारता, विवेक, वैराग्य आदि शुभ गुण अधिकारी के हृदय में वास करने लगते हैं। इनके वास करने से अन्तःकरण इतना पवित्र और प्रसन्न हो जाता है यानी शुद्ध हो जाता है कि मल-विक्षेप और आवरण तीनों अन्तःकरण के दोष दूर हो जाते हैं, जैसी वस्तु वैसी ही वस्तु दिखाई देने लगती है। इसी का नाम सम्यक् है सम्यक् ज्ञान मात्र ही सुखी और स्वतंत्र होने का एक उपाय है। सत्शास्त्र और सत्संग से सम्यक् ज्ञान प्राप्त होता है, ऐसा जानकर चतुर पुरुष कुशास्त्र और कुसंग को त्याग करके सत्शास्त्र और सत्संग का ही सेवन करता है।

जैसे सिद्धाँजन का सेवन करने से गड़ा हुआ धन दिखायी देने लगता है, इसी प्रकार सत् शास्त्र और सत्संग से छुपा हुआ आत्म तत्व प्रत्यक्ष हो जाता है। जैसे सूर्य के निकलने से कमल खिल जाता है, इसी प्रकार इन दोनों के प्राप्त होने से भाग्यवान अधिकारी का हृदय कमल विकसित हो जाता है। जैसे चन्द्रमा के उदय होने से दिन का ताप दूर हो जाता। जैसे अग्नि सेवन करने से जाड़ा दूर हो जाता है, इसी प्रकार इन दोनों के सेवन से अविद्या रूप जड़ता दूर हो जाती है।

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