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Magazine - Year 1951 - Version 2

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प्राचीन भारत में नारियों का धार्मिक स्थान

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First 18 20 Last
(श्रीमती चन्द्रकान्ता जेरथ, बी.ए., दिल्ली)

भारतवर्ष में सदा से ही स्त्रियों का समुचित मान है। उन्हें पुरुष की अपेक्षा अधिक पवित्र माना जाता है। स्त्रियों को बहुधा ‘देवी’ संबोधन से संबोधित किया जाता है। नाम के पीछे उनकी जन्मजात उपाधि ‘देवी’ प्रायः जुड़ी रहती है। शांति देवी, गंगा देवी, दया देवी, श्रद्धा देवी आदि देवी परक नाम कन्याओं के रखे जाते हैं। जैसे पुरुष बी.ए., शास्त्री, साहित्य रत्न, आदि उपाधियाँ उत्तीर्ण करने पर अपने नाम के पीछे उस पद्वी को लिखते हैं। वैसी ही कन्याएं अपने जन्म जात ईश्वर प्रदत्त दैवी गुणों, दैवी विचारों, दिव्य विशेषताओं के कारण ‘देवी’ उपाधि से अलंकृत होती हैं।

देवताओं और महापुरुषों के नाम के साथ-साथ उनकी अर्धांगिनियों के नाम भी जुड़े हुए हैं। सीताराम, राधेश्याम, गौरीशंकर, लक्ष्मी नारायण, उम महेश, माया-ब्रह्म, सावित्री सत्यवान आदि नामों में नारी को पहला और नर को दूसरा स्थान है। पवित्रता, दया, करुणा, सेवा, सहानुभूति, स्नेह, वात्सल्य, उदारता, भक्ति भावना, आदि-2 आत्मिक गुणों ने बढ़ा चढ़ा माना है।

इसलिए धार्मिक, आध्यात्मिक और ईश्वर प्राप्ति सम्बन्धी कार्यों में नारी का सर्वत्र स्वागत किया गया है और उसे उसकी महानता के अनुकूल प्रतिष्ठा दी गई है। वेदों पर दृष्टिपात करने से स्पष्ट हो जाता हैं कि वेदों के मंत्र दृष्टा जिस प्रकार अनेक ऋषि हैं वैसे ही अनेक ऋषिकाएं भी हैं। ईश्वरीय ज्ञान वेद महान आत्मा वाले व्यक्तियों पर प्रकट हुआ है और उनने उन वेद मंत्रों को प्रकट किया इस प्रकार जिन पर वेद प्रकट हुए उन मंत्र दृष्टाओं को ‘ऋषि’ कहते है। ऋषि केवल पुरुष ही नहीं हुए हैं वरन् अनेक नारियाँ भी हुई हैं। ईश्वर ने नारियों के अन्तः करण में भी उसी प्रकार वेद ज्ञान प्रकाशित किया जैसे कि पुरुषों के अन्तःकरण में, क्योंकि प्रभु के लिए दोनों ही सन्तान समान हैं। महान दयालु, न्यायकारी और निष्पक्ष प्रभु भला अपनी ही सन्तानों में नर-नारी का पक्षपात करके अनुचित भेद भाव कैसे कर सकते है?

ऋग्वेद 10। 85 के सम्पूर्ण मंत्रों की ऋषिका “सूर्या सावित्री” हैं। ऋषि का अर्थ निरुक्त में इस प्रकार किया है। “ऋषिदर्शनात् स्तोमान ददाशति। ऋषियों मंत्र द्रष्टारः” अर्थात् मंत्रों का द्रष्टा उनके रहस्य को समझ कर प्रचार करने वाला ऋषि होता है।

ऋग्वेद की ऋषिकाओं सूची ब्रह्म देवता के 24 अध्याय में इस प्रकार हैः-

घोषा गोधा विश्व वारा, अपालोपनिषन्निषत्

ब्रह्म जाय जुहूर्नाम अगस्त्यस्य स्वसादिति। 84

इन्दाणी चेन्द्र माता च सरमा रोमशोर्वशी।

लोपामुद्रा च नद्यश्च यमी नारी च शाशवती 85

श्रीर्लक्ष्मीः सार्प राज्ञी वाक् श्रद्धा मेघा च दक्षिणा

रात्री सूर्या च सावित्री ब्रह्म वादिन्य ईरिताः। 86

अर्थात्- घोषा, गोधा, विश्व वारा, अपाला, उपनिषत्, निषत्, जुहू, अदिति, इन्द्राणी, सरमा, रोमशा, उर्वशी, लोपामुद्रा यमी, शाश्वती, सूर्या सावित्री आदि ब्रह्म वादिनी है।

ऋग्वेद के 10 134, 10-39, 10-40, 8-91, 10-95, 10-107, 10-109, 10-154, 10-159, 10-189, 5-28, 8-91 आदि सूक्तों की मंत्र दृष्टा यही ऋषिकाएं हैं।

ऐसे अनेक प्रमाण मिलते हैं। जिनसे स्पष्ट होता है कि स्त्रियाँ भी पुरुषों की तरह यज्ञ करती और कराती थी। वे यज्ञ विद्या और ब्रह्म विद्या में पारंगत थी। कई नारियाँ तो इस सम्बन्ध में अपने पिता तथा पति तक का मार्ग दर्शन करती थी।

तैत्तिरीय ब्राह्मण में सोम द्वारा ‘सीता सावित्री’ नामक ऋषिका को तीन वेद देने का वर्णन विस्तार पूर्वक आता है। अब

................... तं त्रयो वेदा अन्व सृज्यन्त अथह सीताँ सावित्री सोमं राजान चक में............ तस्या उहत्रीन वेदान प्रददौ। तैत्तिरीय 2। 6।10

इस मंत्र में बताया गया है। कि किस प्रकार सोम ने सीता सावित्री को तीनों वेद दिये।

मनु की पुत्री ‘इड़ा’ का वर्णन करते हुए तैत्तीय 1।1। 4 में उन्हें ‘यज्ञान्काशिनी’ बताया है। यज्ञान्काशिनी का अर्थ सायणाचार्य ने ‘यज्ञ तत्व प्रकाश समर्था’ किया है। इड़ा ने अपने पिता को यज्ञ सम्बन्धी सलाह देते हुए कहा -

सा·व्रवीदिड़ा मनुम्। तथावाऽहं तवाग्नि माधास्यामि यथा प्रजया पशुभिर्मिथुनैर्जनिष्य। प्रत्यस्मिलोकेस्थास्यासि। अभि सुवर्गं लोकं जेष्यसीति। तैत्तिरीय व्रा. 1। 4

इड़ा ने मनु से कहा मैं तुम्हारी अग्नि का ऐसा अवधान करूंगी जिससे तुम्हें पशु, भोग, प्रतिष्ठा और स्वर्ग प्राप्त हो।

प्राचीन समय में स्त्रियाँ गृहस्थाश्रम चलाने वाली भी थी और ब्रह्म परायणा भी। वे दोनों ही अपने अपने कार्य क्षेत्र में कार्य कराती थी। जो गृहस्थ संचालन करती थी उन्हें ‘सद्यो वधू’ कहते थे और जो वेदाध्ययन, ब्रह्म उपासना आदि के परमार्थिक कार्यों में प्रवृत्त रहती थी उन्हें ‘ब्रह्म वादिनी’ कहते थे। ब्रह्म वादिनी और सद्यो वधू के कार्यक्रम तो अलग-2 थे पर उनके मौलिक धर्माधिकारों में कोई अन्तर न था देखिए-

द्विविधाः स्त्रियो ब्रह्म वादिन्यः सद्योवध्वश्च। तत्र ब्रह्मवादिनी नामुपनयनम् अग्नीन्धनं वेदाध्यंयनं स्वगृहे भिक्षाचर्या च। सद्योव धूनाँ तूपस्थिते विवाहे काले कथं चिदुपनयनं कृत्वा विवाहः कार्यः।

इरीत धर्मसूत्र 21। 20। 24

ब्रह्म वादिनी और सद्योवधू ये दो प्रकार की स्त्रियाँ होती है। इनमें से ब्रह्म वादिनी यज्ञोपवीत अग्नि होत्र, वेदाध्यवन तथा स्वगृह में भिक्षा करती है। सद्योवधुओं का भी यज्ञीपवीत आवश्यक है वह विवाह काल उपस्थित होने पर करा देते हैं।

शतपथ ब्राह्मण में याहवल्क ऋषि की धर्म पत्नी मैत्रेयी को ब्रह्म वादिनी कहा है। तयोई मैत्रेयी ब्रह्म वादिनी वभूवः।

अर्थात्- मैत्रेयी ब्रह्मवादिनी थी। ब्रह्मवादिनी का अर्थ वृहदारणयक उपनिषद् का भाष्य करते हुए श्री शंकराचार्य जी ने ब्रह्म वादन शीला किया है। ब्रह्म का अर्थ है- वेद। ब्रह्म वादन शीला अर्थात् वेद का प्रवचन करने वाली।

यदि ब्रह्म का अर्थ ईश्वर लिया जाय तो भी ब्रह्म प्राप्ति बिना वेद ज्ञान के नहीं हो सकती।इसलिये ब्रह्म वहीं जान सकता है जो वेद पढ़ता है। देखिए।

ना वेद विन्मनुते तं वृहन्तम्।

तैत्तिरीय.

एतं वेदानुवचनेन ब्राह्मणा विविदिषन्ति यज्ञेन दानेन तपसाअनाशकेन।

वृहदारणयक 4। 4। 22

जिस प्रकार पुरुष ब्रह्मचारी रहकर तप, स्वाध्याय, योग आदि द्वारा ब्रह्म को करते थे वैसे ही कितनी ही स्त्रियाँ ब्रह्मचारिणी रहकर आत्मा निर्माण एवं परमार्थ का संपादन करती थी।

पूर्वकाल में अनेक सुप्रसिद्ध ब्रह्मचारिणी हुई है। जिनकी प्रतिभा और विद्वता की चारों ओर कीर्ति फैली हुई थीं। महाभारत में ऐसी अनेक ब्रह्मचारिणी का वर्णन आता हैं

भारद्वाजस्य दुहिता रूपेण प्रतिमा भुवि।

श्रुतावती नाम विभो कुमारी ब्रह्मचारिणी॥

महाभारत शल्य पर्व 48। 2

भरद्वाज की श्रुतावती नामक कन्या थी जो ब्रह्मचारिणी थी। कुमारी से साथ 2 ब्रह्मचारिणी शब्द लगाने का तात्पर्य यह है कि वह अविवाहित और वेदाध्ययन करने वाली थी।

अत्रेव ब्राह्मणी सिद्धा कौमार ब्रह्मचारिणी।

योगयुक्तादिवं माता, तपः सिद्धा तपस्विनी॥

महा.भा. शल्य पर्व 54। 6

योग सिद्धि को प्राप्त कुमार अवस्था से ही वेदाध्ययन करने वाली, तपस्विनी, सिद्धा नाम की ब्राह्मणी तप करके मुक्ति को प्राप्त हुई।

वभुव श्रीमती राजन् शणिडल्यस्य महात्मनः।

सुता धृत व्रता साध्वी नियता ब्रह्म चारिणी।

सातु तप्तवा तपो घोरे दुश्ररं स्त्री जनेन ह।

गता स्वर्ग महाभागा देव ब्राह्मण पूजिता॥

महा. भा. शुल्य 54। 9

महात्मा शाँडिल्य की पुत्री ‘श्रीमती’ थी। जिसने व्रतों को धारण किया। वेदाव्ययन में निरन्तर प्रवृत्त थी। अत्यंत कठिन तप करके वह देब ब्राह्मणों से पूजित हुई और स्वर्ग सिधारी। अत्र सिद्धा शिवा नाम ब्राह्मणो वे पारगा। अधीत्य सकलार्न् वदान् लेभेकसन्देह सक्षयम्॥

महा. भा. उद्योग पर्व 109। 18

शिवा नामक ब्राह्मणी वेदों में पारगत थी उसने सब वेदों को पढ़कर मोक्ष पद प्राप्त किया।

महाभारत शान्ति पर्व अध्याय 320 में सुलमा नामक ब्रह्मवादिनी संन्यासिनी का वर्णन है। जिसने राजा जनक के साथ शास्त्रार्थ किया था। इसी अध्याय के श्लोक 82 में सुलभ ने अपना परिचय देते हुए कहा है-

प्रधानो नाम राजर्षि व्यक्तं ते श्रोत मागतः।

कुले तस्य सनुत्पन्ना सुलभाँ नाम विद्धिमाम्॥

साहं तस्तिन् कुले जाता भर्तर्यसति मद्विधे।

विनीता मोक्ष धर्मेषु चराम्येका मुनिव्रतम्॥

महा. शान्ति पर्व 320। 82

मैं सुप्रसिद्ध क्षत्रिय कुल में उत्पन्न सुलभा हूँ। अपने अनुरूप पति ने मिलने से मैंने गुरुओं से शास्त्रों की शिक्षा प्राप्त करके संन्यास ग्रहण किया है।

पांडव पत्नी द्रौपदी की विद्वता का वर्णन करते हुए श्री आचार्य आनन्द तीर्थ (मध्वाचार्य) जी ने महाभारत निर्णय में लिखा है -

वेदाश्चायुत्तम स्त्रीभिः को कृष्णाद्याभिरिहा खिलाः।

अर्थात्- उत्तम स्त्रियों को कृष्णा (द्रापदी) की तरह सब वेद पढ़ने चाहिये।

तेभ्योदघार कन्ये द्वे, वपुनाँ धारिणी स्वधा। उभे ते ब्रह्म वादिन्यौ, ज्ञान विज्ञान पारंगे।

भागवत 4। 1। 64

‘स्वधा’ को दो पुत्रियाँ हुई, जिनके नाम वयुनी और धारिणी थे। वे दोनों ही ज्ञान और विज्ञान में पूर्ण पारंगत तथा ब्रह्मवादिनी थीं

विष्णु पुराण 1। 10 और 18-19 में तथा मार्कणडेय पुराण अ. 52 में भी इस प्रकार ब्रह्म वादिनी (वेद और ब्रह्म का उपदेश करने वाली) महिलाओं का वर्णन है।़

सततं मूर्ति मन्तश्च वेदाश्चत्वार एव च। सन्ति यस्याश्च जिव्हाग्र साच बेदवतीस्मृता॥

ब्रह्म वैवर्तपुराण प्रकृति खण्ड 14। 65 उसे चारों वेद कंठाग्र थे। इसलिये उसे वेदवती कहा जाता था।

इस प्रकार की नैष्ठिक ब्रह्मचारिणी और ब्रह्मवादिनी नारियाँ अगणित थी। इनके अतिरिक्त गृहस्थाश्रम में प्रवेश करने वाली कन्याएं भी दीर्घकाल तक ब्रह्मचारिणी रहकर वेद शास्त्रों का ज्ञान प्राप्त करने के उपरान्त तब विवाह करती थी। तभी उनकी सन्तान संसार में उज्ज्वल नक्षत्रों की तरह यशस्वी, पुरुषार्थी और कीर्ति मान होती थी धर्म ग्रन्थों का कि कन्या ब्रह्मचारिणी रहने के उपरान्त विवाह करे।

ब्रह्मचर्येण कन्या युवानं विनते पतिम्।

अथर्व 11। 6। 1

अर्थात्- कन्या ब्रह्मचर्य अनुष्ठान करती हुई उसके द्वारा उपयुक्त पति को प्राप्त करती है।

(क्रमशः)

(क्रमशः)

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