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Magazine - Year 1951 - Version 2

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गायत्री जयन्ती का पुण्य पर्व

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गंगादशहरा गायत्री जयन्ती का पुण्य पर्व है। इस दिन स्वर्ग लोक से शिवजी के मस्तक पर भगवती गंगा जी का अवतरण हुआ था। और इसी दिन ब्रह्म की वाणी का प्रस्फुरण होकर ज्ञान गंगा गायत्री का उद्भव हुआ है। एक ज्ञान गंगा आत्मा को पवित्र बनाती है दूसरी वाह्य जीवन के मलों को स्वच्छ करती है। दोनों ही तरण तारिणी है। एक सूक्ष्म है दूसरी स्थूल। दोनों ही की महिमा अपार है।

इस पुण्य पर्व को भारतीय जनता अनादि काल से मनाती चली आ रही है। गंगा या अन्य नदी सरोवरों पर लोग स्नान करते हैं, तथा अपनी भावना और परिस्थिति के अनुसार दान पुण्य एवं शुभ सत्कर्म करते हैं। आध्यात्मिक ज्ञान गंगा गायत्री का महत्व समझने वाले भी इस अवसर को अछूता नहीं जाने देते वे भी अपनी शक्ति और भावना के अनुरूप माता के चरणों पर श्रद्धाँजलि समर्पित करते हैं। गायत्री उपासकों का सबसे बड़ा त्यौहार गंगादशहरा ही है।

इस वर्ष जेष्ठ सुदी नवमी दशमी ता. 24 जून को है। उसी दिन पर्व माना जायगा। उस दिन अपनी सुविधा के अनुसार हमें व्रत, उपवास, मौन, भूमि शयन, 24 सौ मंत्रों का जप, ध्यान, एकान्त सेवन, ब्रह्मचर्य, स्वाध्याय, कीर्तन, हवन, प्रवचन आदि का आयोजन करना चाहिए।

माता के चरणों पर श्रद्धाँजलि के रूप में अर्पण करने योग्य सबसे उत्तम आध्यात्मिक उपहार गायत्री प्रचार है। इस अमृत को जितने अधिक लोगों में बाँटा जा सके, इस पारस मणि से जितने अधिक व्यक्तियों को संपर्क कराया जा सके उतना ही उत्तम है। इस कार्य में अपना समय और प्रभाव खर्च करते हुए किसी को संकोच न करना चाहिए। वाणी द्वारा आग्रह पूर्वक अनुरोध करके किसी को गायत्री उपासना में लगा देना वाणी की श्रद्धांजलि है। धन द्वारा गायत्री साहित्य का वितरण करना माता का प्रिय भेंट चढ़ाना है।

साधना रथ के दो पहिए होते हैं। 1-आत्मा कल्याण के लिए तप कराना और 2-दूसरों के कल्याण के लिए प्रचार करना। गायत्री जयन्ती के इस पुण्य अवसर पर दोनों ही प्रकार जयन्ती के इस पुण्य अवसर पर दोनों ही प्रकार का श्रद्धांजलियां माता के चरणों पर समर्पित की जानी चाहिए।

हैजा से बचने के उपाय

(आयुर्वेदाचार्य श्री नीलकंठ शास्त्री)

हैजा उड़कर लगने वाला रोग है, और इसकी छूत नदियों अथवा स्थल के रास्ते के रास्ते भी एक स्थान से दूसरे स्थान पर फैलती है। इसके सम्बन्ध में विभिन्न सम्मतियाँ हैं। किन्हीं की सम्मति है कि-इस रोग की छूत हवा में है, किसी का मत है कि- पानी में है, कोई कहते हैं कि गन्दगी से यह छूत उत्पन्न होती है। किसी का मत है कि इस रोग का असर पहले आमाशय पर होता है।

यह बात सत्य है कि एक मनुष्य से दूसरे को हैजे की बीमारी उड़ कर लगनी है, परन्तु इसका कारण स्पर्श नहीं। इसके और कारण हैं। रोगी के समीप रहने वाले मनुष्यों में जो रोगी के काम में आई हुई चीजों का इस्तेमाल करते हैं और अपने शरीर और कोष्ठ की सफाई का ठीक ध्यान नहीं रखते उन्हीं पर इस रोग की छूत उड़ कर लगने का भय रहता है। इसलिए रोगी को परिचर्या करने वाले मनुष्यों को रोग से बचने के लिए सचेष्ट रहना चाहिये। हैजे के फैलने का मुख्य साधन पानी है, दूषित पानी के पीने से ही हैजा अधिकतर फैलता है, जल में अनेकों प्रकार के छोटे-छोटे जन्तु होते हैं, जो हमें नहीं दीखते। इनमें हैजे के जन्तु इस प्रकार मिल जाते हैं उनको पहचानना बहुत ही कठिन हो जाता है। जल में बहुत से जन्तु ऐसे होते हैं कि जिनका शरीर पर विशेष प्रभाव नहीं पड़ता, वे शरीर में जाते ही नष्ट हो जाते हैं। जिन स्थानों में यह रोग सदा बना रहता है वहाँ यह जन्तु कभी नष्ट नहीं होते। थोड़े बहुत बने ही रहते हैं। जैसे ही उसे अनुकूल हवा और खुराक मिलती है, तत्काल बढ़कर रोग फैला देते हैं। यदि किसी कुएं में भरपूर बलवान जन्तु उत्पन्न हो गये हों, तो उनपर जन्तु नाशक दवा भी पूरा असर नहीं करती। हाँ कुछ कमी जरूर हो जाती है। इसीलिए ऐसे कुओं में कई बार दवा डालनी पड़ती है। हवा डालने के पश्चात् कुएं के पानी को निकलवा देना चाहिए। इससे पानी शीघ्र साफ हो जाता है।

यही बात नहीं कि कुएं का पानी दोष युक्त हो, उसके पीने से ही रोग का आक्रमण हो, बल्कि उस पानी से स्नान करने और बर्तन, कपड़ा धोने से भी यह रोग फैलता है। बहुत से मनुष्य कहते हैं कि अगर कुएं के पानी से ही यह रोग फैलता है तो जितने आदमी उस पानी को पीते हैं सब बीमार क्यों नहीं पड़ते। इसका क्या कारण है? वास्तव में यह रोग उन्हीं पर आक्रमण करता है, जिनकी पाचन शक्ति कमजोर होती है। जो तन्दुरुस्त हैं, बलवान हैं, उन पर रोगों का आक्रमण नहीं होता। जिनकी पाचन क्रिया ठीक है, उनके विशेष रूप से एक प्रकार का रस पैदा होता है। यह रस स्वाद में खट्टा होता है, उसके प्रभाव से यह जन्तु तत्काल नष्ट हो जाता है। परन्तु जिनकी पाचन शक्ति कमजोर है, जिन्हें सदैव कब्ज बना रहता है, जो खाये हुए पदार्थ को हजम नहीं कर सकते। जिनकी आँतें भी ठीक प्रकार काम नहीं कर सकतीं, उन्हीं पर इस रोग का आक्रमण होता है। जो लोग पानी गर्म करके और छानकर पीते हैं, उन पर इस रोग का असर नहीं होता। इस रोग का खाली पेट पर जितना असर होता है, उतना भरे पेट पर कदापि नहीं होता। क्योंकि खाली पेट में उक्त खट्टा रस नहीं रहता यह रस भोजन करने के पश्चात् ही बनता है। इसलिए खाली पेट में वह दूषित जल पहुँचता है तो उसमें के जन्तु अंतड़ों और रक्त में प्रवेश कर जाते हैं। परन्तु भोजन के पश्चात् यह पानी पिया जाय तो यह पाचन रस उस जल के जन्तुओं को नष्ट कर देगा। जो लोग एक ही साथ बहुत सा पानी पीते हैं, उन पर इस रोग का असर जल्दी होता है, परन्तु जो थोड़ा-थोड़ा पानी पीते हैं उन पर इस रोग का इन-जन्तुओं का विशेष प्रभाव नहीं पड़ता। क्योंकि थोड़े पानी में थोड़े जन्तु होते हैं, जिन्हें पाचक रस तुरन्त नष्ट कर देता है। इस रोग का आक्रमण अधिकतर गरीब लोगों पर होता है, क्योंकि उन्हें भरपेट खाना नहीं मिलता। नंगे बदन रात को खुली हवा में सोते हैं, और कच्चा पक्का जो भोजन मिल जाय उसे ही खाते हैं इससे वे बिल्कुल कमजोर हो जाते हैं। और कमजोरी में रोग का आक्रमण शीघ्र होता है। पानी के सिवाय कपड़ा, दूध, खुराक आदि के द्वारा भी इस रोग के जन्तु शरीर में प्रवेश करते हैं।

जब किसी मनुष्य पर हैजे का आक्रमण होता है, तब किसी को तो यह रोग दवा-दारु का भी मौका नहीं देता और कुछ घण्टों में ही यमलोक पहुँचा जाते हैं। परन्तु वह इतने अशक्त हो जाते हैं कि वर्षों में भी पूर्व खोई हुई शक्ति का संचय नहीं कर पाते। रोग के आक्रमण के पश्चात् कोई रोगी तो बिल्कुल ठंडा पड़ जाता है, किसी को तेज ज्वर हो जाता है। किसी को पतले दस्त अधिक संचय में आने लगते हैं और किसी को वमन होने लगती है, कभी-कभी मूत्र का अवरोध भी हो जाता है। सबसे पहला लक्षण दस्त का होना है। दस्त बार-बार होते हैं। दस्तों के साथ ही बेचैनी बढ़ जाती है। पेट में दर्द भी अक्सर हो जाता है। और कुछ घण्टों तक रहता है। प्रारम्भ के दो तीन दस्त भारी होते हैं इन दस्तों का रंग पीला होता है, और ज्यों 2 ही दस्तों की संख्या बढ़ती जाती है दस्तों का रंग सफेद हो जाता है, जैसा कि चावल का माण्ड होता है। कभी-कभी दस्त के साथ खून भी आने लगता है। कभी आँव भी आती है। यह लक्षण हो तो समझना चाहिए कि रोगी का बचना कठिन है मूत्र के अवरोध में रोगी को खतरे से बाहर न समझना चाहिए। जब मूत्र हो जाय तो समझना चाहिए कि रोग का वेग कम है।

हैजे के दिनों में दस्त, दर्द, आँव, मरोड़ होना अच्छा नहीं। इनके होते ही उनकी चिकित्सा करो, कराओ। ऐसा प्रयत्न करे जिससे कमजोरी न बढ़े। बीमारी के दिनों में अगर दस्त हो जाय तो उन्हें रोकने से पूर्व आमाशय और अंतड़ियों में एकत्रित मल को निकाल दो। जब तक यह दूषित मल शरीर में रहेगा, रोग का आक्रमण होते ही किसी अच्छे वैद्य या डॉक्टर को दिखाओ। चिकित्सा में असावधानी न करो नीचे के उपायों से रोग का भय नहीं रहता-

(1) कोठा साफ रक्खो, कब्ज न होने दो। गरिष्ठ वस्तुओं का खाना बिलकुल बन्द कर दो।

(2) बाजार की मिठाइयाँ, खोमचे वाली की चाटे खाना एकदम बन्द कर दो। (3) हरे शाक, बासी फल, ककड़ी-फूट आदि खाना छोड़ दो। (4) पानी औटाकर और छान कर पियो। (5) खाली पेट घर से न निकलना चाहिए। (6) जेबों में कपूर पड़ा रहने दो। (7) घरों के आलों में प्याज रक्खो। (8) प्याज की चटनी, करौंदा, मिर्च और नीबू का सेवन प्रति दिन करो। (9) नीबू की शिकंजी का सेवन विशेष रूप से करना चाहिए। (10) अपने ओढ़ने-बिछाने के कपड़ों को रोज धूप में सुखाओ। (11) रोगी का मल-मूत्र को तुरन्त घर से बाहर गड्ढे में जाकर दबा दो। (12) कुएं के पानी में लाल दवा डालकर उसको पीओ। (13) हैजा के रोगी से मिलों-जुलो नहीं। घर साफ रखो, कीच जमा मत होने दो। (14) मल-मूत्र को तुरन्त घर से बाहर गड्ढे में जाकर दबा दो। (15) रोगियों को साफ रखो, उनमें रोज फिनायल डालकर साफ करो। (16) दूध बासी ठण्डा मत पिओ। कच्चा दूध देर तक मत रहने दो। (17) धोबी के घर से कपड़े आवें तो उन्हें तुरन्त धूप में डाल दो, और खूब सुखा दो। (18) मेला-तमाशा-सिनेमा आदि भीड़ के स्थानों में मत जाओ।

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