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Magazine - Year 1951 - Version 2

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स्नान कैसे किया जाय?

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First 19 21 Last
(लेखक-डा. पी. आर. जैन)

ब्रह्मचर्य व्रत का पालन करने के लिये मन और वाणी शुद्धि के बाद यह भी अनिवार्य है कि शारीरिक अशुद्धि न रहने पाये। शारीरिक अशुद्धि बीमारी का घर है और जो रोगी है उसका ब्रह्मचारी होना भी सम्भव नहीं। डाक्टरों एवं मनोविज्ञान वेत्ताओं का तो कहना है कि रोगी और निर्बल ही अधिक विषयी होते हैं और फलतः क्षीण होते चले जाते हैं।

शरीर में इतने छिद्र और रोमकूप इसलिये बने हैं कि शरीर की भीतरी गन्दगी दूर होती रहे और साथ ही शुद्ध वायु का प्रवेश भी जारी रहे। नाक और मुँह के अतिरिक्त रोम कोपादि भी साँस लिया करते हैं और स्वस्थ रहने के लिये यह आवश्यक है कि उन्हें साफ रखा जाये और यह ध्यान और कोशिश बनी रहे कि वे बन्द न होने पायें

स्नान मात्र ही पर्याप्त शुद्धि नहीं दे सकता। केवल 10-20 लोटा पानी। डाल लेने या नदी या तालाब में 1-2 डुबकी लगा लेना ही पर्याप्त स्नान नहीं। साथ ही गरम पानी और साबुन से शरीर को मलमल कर धोना भी पर्याप्त या आवश्यक स्नान कदापि नहीं है। स्वस्थ रहने, वीर्य की रक्षा करने तथा रोग विमुक्त रहने के लिये यह आवश्यक है कि प्रत्येक व्यक्ति शरीर को स्वच्छ करने में कदापि आलस्य न करें और विधिवत् स्नान को सुख, सौंदर्य और स्वास्थ्य का सर्वोच्च साधन मानें।

इसके लिये यह आवश्यक है कि घर्षण स्नान किया जाये। इस विधि से स्नान करने से मनुष्य तेजस्वी, निर्विकारी, नीरोग, ब्रह्मचारी तथा दीर्घजीवी बन सकता है। जो अपने शरीर को गन्दा बनाये रहते हैं। और वे अल्पायु को प्राप्त होते हैं और अल्पायु में भी सदैव रोग एवं मनोविकार के शिकार बने रहते हैं। शरीर को किसी खुरदरे गमछे या तौलिये से रगड़ना ही रोग कूपों को साफ रखने का मुख्य साधन है। रोमकूप साफ रहेंगे तो शरीर की गन्दगी और विष आसानी से बाहर निकल आयेगा। डाक्टरों का कथन है कि बहुधा मंदाग्नि, कब्जियत, चर्म रोग आदि रोमकूपों की गन्दगी से हो जाते हैं। और क्रमशः रक्त अत्यन्त अशुद्ध हो जाता है। रगड़कर स्नान करने से रोमकूप साफ रहते हैं, छिद्रों के मुँह खुल जाते हैं और साथ ही त्वचा बड़ी मुलायम और सुन्दर हो जाती है।

घर्षण स्नान का सर्वोत्तम समय प्रातः काल है। प्रातः काल स्नान कर लेने से दिन भर चित्त प्रसन्न रहता हैं और जठराग्नि दीप्त होने से भोजन भी ठीक से पचता है। फिर जब पेट ठीक रहता है और तो मन की विमलता भी बनी रहती है और आलस्य पास फटकने नहीं पाता। सूर्योदय के पूर्व स्नान करना अत्यन्त लाभकर है। फिर भी यदि किसी कारणवश देर हो जाय तो सूर्योदय के पश्चात स्नान कर लेना चाहिये।

स्नान सदैव शीतल जल से ही करना चाहिए। हाँ किसी रोग या अन्य कारणवश यदि डॉक्टर कहें तो गर्म जल से स्नान कर लेना हानिकारक नहीं है तथापि यह ध्यान तो रखना ही पड़ेगा कि सर पर गर्म जल न पड़े। यह स्मरण रहे कि स्नान से जो लाभ है वे तभी प्राप्त हो सकते हैं जब शीतल जल से स्नान करने से नस-नस में स्फूर्ति की बिजली सी दौड़ पड़ती है और जठराग्नि प्राप्त होती है। अतएव प्रातःकाल शीतल स्नान स्वास्थ्य का परम साधन है। यह साधन इतना सुलभ है कि गरीब से गरीब प्राप्त कर सकता है- भले ही बहुत बड़ा अमीर अपनी जान के भय से गर्म जल से स्नान कर अपना समय और धन का दुरुपयोग करे। आजकल के नवयुवक गर्म जल से स्नान करना अपना भाग्य और स्वास्थ्य का चिन्ह समझते हैं लेकिन यह बात ध्यान में नहीं आती कि फिर भी क्यों उनका स्वास्थ्य क्षीण होता जा रहा है।

जाड़े में जिन्हें सर्दी लगने का विशेष भय रहता है वे तो अवश्य घर्षण स्नान करें। स्नान करने से पूर्व एक खुरदरे तौलिये या गमछे से शरीर को खूब रगड़ें। डरने की कोई आवश्यकता नहीं है। खास-खास अंगों को छोड़कर बाकी शरीर पर बल लगाकर घर्षण करें। इससे शरीर एकदम गर्म हो उठेगा, पसीना निकलेगा और छिद्र खुल जायेंगे। इसके बाद फिर हाथों से तमाम शरीर रगड़ना चाहिये। एक-दो दिन के अभ्यास से ही उसका गुण प्रकट हो जायेगा। पेट को रगड़ने से पेट की शिकायत भी दूर होगी और स्वास्थ्य उत्तम हो जायेगा।

इसके अतिरिक्त स्नान करते समय भी घर्षण किया जा सकता है- यानी शरीर पर जल डाल कर या तौलिये को जल में भिगोकर शरीर को रगड़ा जाता है। लेकिन प्रथम विधि सर्वोत्तम है। शरीर पर जल डालने के सम्बन्ध में यह नियम याद रखना चाहिये कि पहले सर भिगो लिया जाये फिर शरीर के अन्य भागो पर जल पड़े। शरीर के अन्य भागो से पहले सिर पर जल डालने से एक प्रकार की गर्मी उत्पन्न होती है जो सर पर पहुँच बहुत हानि करती है, लेकिन यदि सर को पहले ही भिगो लिया जाये तो फिर वह डर नहीं रहता।

कुछ विद्वान विशेषज्ञों का यह मत है कि स्नान सोने में सुगन्ध उत्पन्न कर देता है। हिन्दू धर्म में सूर्योपस्थान आदि की विधि भी शायद इसी लाभ को मद्देनजर रख कर रखी गयी है। यह सूर्य स्नान कर लेने पर घर्षण स्नान का पूरा लाभ मिलता है।

सुबह और शाम दो बार स्नान करना चाहिए। यदि शीत अधिक पड़ती हो तो 10-15 मिनट अन्यथा आधे घंटे का समय स्नान में व्यतीत करना चाहिये। भली-भाँति विधिवत स्नान ही अपने गुण दिखा सकता है। स्नान का स्थान एकान्त होना चाहिये। पाश्चात्य विद्वानों ने नंगे स्नान करने की राय दी है लेकिन यह भारतीय सभ्यता के विरुद्ध है तथापि शरीर पर जितने कम कपड़े हों उतना ही अच्छा। यह भी ध्यान रखना चाहिये कि भोजन करने के बाद स्नान का अवसर न आये। इस प्रकार स्वास्थ्य को सुधारने से तथा घर्षण स्नान से ब्रह्मचर्य व्रत का पालन हो सकता है।

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