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Magazine - Year 1951 - Version 2

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सरदी और जुकाम की चिकित्सा

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(लेखक श्री जे. उडहाउस)

सरदी जब मनुष्य को लगती है तो वह एक प्रकार की पूर्व सूचना होती है। यदि किसी को सरदी का कुछ असर हो जाए तो उसको तुरन्त यह सोचना चाहिये कि उसके शरीर में कुछ न कुछ गड़बड़ी है, उसके शरीर में कुछ न कुछ विजातीय द्रव्य एकत्र हो गये हैं। इस सिलसिले में यदि हमको इस बात का ज्ञान हो जाये कि शरीर में यह विजातीय द्रव्य कैसे एकत्र होते हैं तो हम सरदी, जुकाम या किसी प्रकार की शिकायत का कारण तुरन्त समझ जायेगें। शरीर में विषैले विजातीय पदार्थों के बहुत से कारण हैं जिनमें कुछ प्रमुख यहाँ दिये जाते है।

1. अनावश्यक रुप से अधिक भोजन करना।

2. अनियमित विटामिन आदि हीन पदार्थ खाना।

3. व्यायाम का अभाव।

4. शरीर से गन्दगी दूर करने वाले अवयवों से ठीक रुप से काम न लेना।

5. शुद्ध वायु का न मिलना एवं दीर्घश्वास न लेना।

इन सब पर विचार करने से बात होगा कि एक दूसरे से कितना अधिक सम्बन्धित है। यदि एक पर भी ध्यान नहीं जायेगा तो परिणाम शरीर के लिये कितना भयावह और घातक होगा।

ऊपर संक्षेप में यह बतलाया जा चुका है किस प्रकार शीत का प्रारम्भ होता है। जब सरदी का आरम्भ हो जाता है तो शरीर से अनावश्यक मल निकलने लगता है। यदि यह मल रुक जाये तो शरीर की दशा अत्यन्त खराब हो जाने की सम्भावना रहती है। किन्तु हम लोगों में एक दोष यह है कि जब शीत के कारण हमारे शरीर से अनावश्यक मल निकलने लगता हैं तब भी हम सतर्क नहीं होते और उसको निकालने के बजाय शरीर में संचित होने देते हैं। इसके बाद ही जुकाम होता है और मल के निकलने का एक मार्ग मिल जाता है। अतः हमें यह ज्ञात हो गया कि सरदी और जुकाम दोनों का एक ही कारण है। और यदि हम अनावश्यक मल को बहिष्कृत कर दें तो सरदी और जुकाम दोनों को अच्छा कर सकते हैं। देखने-सुनने में तो यह तरीका बड़ा सुगम-सा जान पड़ता है किन्तु यह जान लेना चाहिये कि जब तक जुकाम को दूर करने के लिये दृढ़ निश्चय न कर लिया जायेगा तब तक सरदी बनी रहेगी। इसके लिये अपनी रहन-सहन, खान-पान, तौर-तरीके में परिवर्तन करना पडे़गा। जो इसके लिये तैयार नहीं होगा यह सदा सरदी जुकाम से आक्रान्त रहेगा। जब तक ये परिवर्तन न होगा तब तक लाभ होने की कोई आशा नहीं। और यदि इस दिशा में समुचित प्रयत्न न किया जायेगा तो आगे चलकर बहरेपन के भी लक्षण शुरु होने लगते हैं। अतः इस मामले में विशेष सतर्क रहने को आवश्यकता है।

अब हम यहाँ इन सब बातों पर विचार करेंगे। ऊपर जो कारण इन दोषों के बतलाये गये हैं उनमें पहले दो को ही लीजिए? कितने लोग इस बात को नहीं जानते कि हमें भोजन जीवित रहने के लिये करना चाहिये। वे तो केवल स्वादेन्द्रिय को तृप्त करने के लिये भोजन करते हैं। उनको इस बात का तनिक भी पता नहीं कि हमारा आचार हमारे आहार के ही अनुसार बनते हैं। जैसा हमारा आहार रहेगा वैसे ही हम बनेगें। इसलिये यह बहुत बुरा है कि अनावश्यक रुप में पेट को स्वादेन्द्रिय तृप्त करने के लिये भरा जाये। यह बात जान लेनी चाहिये कि शरीर के लियें अल्प चीजों की ही आवश्यकता हुआ करती है। शरीर को पुष्ट करने के लिये प्रोटीन, स्टार्च, मेद, चीनी, लवण एवं विटामिन की प्रायः न्यूनता देखी जाती है। इनकी प्राप्ति अधिकतर ताजे फलों, तरकारियों और सलाद से होती है। एक साधारण औसत दरजे के अच्छे भोजन में प्रोटीन, स्टार्च, मेद और चीनी कम से कम मात्रा में रहते हैं और शाक, तरकारियाँ और फल अधिक रहते हैं।

जिस व्यक्ति को हमारे लिखे नियम के अनुसार सरदी-जुकाम का उपचार करना हो उसको यह बात ध्यान कर लेनी चाहिये कि यदि उसने निश्चय किया तो दृढ़ प्रतिज्ञा होकर इन्हीं नियमों के अनुसार चलना होगा, तनिक भी अपनी इच्छा से इधर उधर न करना होना। पहली बात यह है कि रोगी को कम से कम एक सप्ताह तक केवल ताजे पके फलों पर निर्वाह करना होगा। अधिक से अधिक तीन बार एक दिन में भोजन करना चाहिये। और प्रति बार उतना ही खाना चाहिये जितने से पेट भर जाये।

इसके अनन्तर व्यायाम का नम्बर आता है। यदि हम थोड़ा अधिक भी खालें किन्तु नियमित रुप से प्रति दिन व्यायाम करते जायें तो फिर भी ठीक है। लेकिन एक तो खाने पीने में ही हम असंयम दिखाते हैं और दूसरे व्यायाम भी नहीं करते। और यही बुराई का घर है। शरीर में से विजातीय द्रव्य निकालने में व्यायाम बहुत सहायता करते हैं। जिनको किसी व्यायाम की आदत न हो वे टहलने से आरम्भ करें। कम से कम तीन मील प्रति दिन टहलने से ठीक रहता है। टहलने के समय यह बात ध्यान रखनी चाहिये कि हम व्यायाम कर रहें हैं। खूब लम्बी-लम्बी साँस लें।

अन्त में हम वायु की शुद्धता और अंशतः प्राणायाम पर आते हैं। शुद्ध वायु तो प्राण रक्षा के लिये आवश्यक है ही इसको कौन नहीं स्वीकार करेगा। किन्तु साथ ही साथ प्राणायाम की आवश्यकता भी कम नहीं है। प्राणायाम से स्वयं ही स्वास्थ्य अत्युत्तम हो जाता है। प्राणायाम का अभ्यास धीरे-धीरे प्रातःकाल करना चाहिये। इससे फेफड़े, हृदय आदि को अपूर्व शक्ति प्राप्त होती है। इस प्रकार भी लम्बी ख् साँस लिया करें। कुछ ही दिनों में आदत पड़ जायेगी। अभ्यास से क्या नहीं सम्भव है?

हो सकता है कि एक सप्ताह के अभ्यास से जुकाम सरदी का प्रकोप दूर न हो। ऐसी दशा में पुनः इसको करना चाहिये। यदि एक मास में गुण न करे तो दो मास तक चलाये। क्योंकि यदि पुराना रोग होगा तो समय लेगा ही आतुरता से कुछ नहीं होता।

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