आध्यात्मिक साधना का शुभ मुहूर्त
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प्रकृति के सूक्ष्म परिवर्तन, ऋतुओं का हेर फेर, चन्द्रमा की कलाओं की घटा बढ़ी, समुद्र के ज्वार भाटे, आकाशस्थ ग्रह नक्षत्रों का पृथ्वी पर आने वाला प्रभाव, सूक्ष्म जगत में होने वाली उथल पुथल, पृथ्वी की परिक्रमा से परिवर्तित राशिस्थल, आदि अनेक कारणों से संसार के अवश्य वातावरण में बड़े महत्वपूर्ण हेर होते रहते हैं। उन परिवर्तनों का कब, किस वस्तु पर किस प्राणी पर क्या प्रभाव पड़ेगा इस रहस्य को दिव्य दृष्टि से देख सकने वाले योगियों ने “मुहूर्त” विद्या की रचना की है। किस कार्य के लिऐ कौन समय उपयुक्त होगा? इस सूक्ष्म विज्ञान के आधार पर ही मुहूर्त शोधे जाते है।
किसान जानता है कि किस अवसर पर कौन सी फसल बोनी चाहिए। ‘वावनी’ को ‘ओठ’ के दिनों में बीज न वोकर आगे पीछे बोया जाय तो उस भूल से फसल में भारी कमी हो जाती है।
इसी प्रकार संतानोत्पत्ति के लिए भी स्त्री के ऋतु स्नान के उपरान्त कुछ नियम समय तक हो वह मुहुर्त होता है जिसमें गर्भावान सफल हो सकता है। वह अवसर निकल जाने पर प्रयत्न निष्फल ही जाता है। इसी प्रकार अन्य कार्यों के भी भले बुरे मुहूर्त होते हैं जिनमें उनकी सफलता असफलता बहुत हद तक निर्भर रहती हैं।
दो विशेष कालो की मिलन बेला को ‘सन्ध्या’ कहते हैं। सन्ध्या काल असाधारण महत्व पूर्ण होता है। ऋषियों ने रात्रि और दिवस के मिलन की प्रायः सायं सन्ध्याओं के महत्व को देखते हुए उस समय अनेक कार्य करने और न करने का विधान किया है। संध्याकाल में भोजन, शयन, मैंथुन अध्ययन, यात्रारंभ, आदि अनेक कार्य वर्जित और स्नान भजन, ध्यान, आदि अनेक कार्य उचित ठहराये गये हैं। सर्दी और गर्मी की दो प्रधान ऋतुओं की मिलन संध्या भी ऐसी ही महत्व पूर्ण हैं। आश्विन और चैत्र की नवरात्रि ऐसी ही पुण्य ऋतु संध्या की बेला है।
वैद्य लोग जानते हैं कि आश्विन और चैत्र में ज्वर जूड़ी आदि अनेक रोग बढ़ते हैं, शरीर में सूक्ष्म कोषों में एक प्रकार का उफान आता है, उन्हीं दिनों जुलाव आदि द्वारा कोष्ट शुद्धि कराना अच्छा समझा जाता है। आत्मिक दृष्टि से भी यह समय बड़ा महत्व पूर्ण है। इन दिनों जो साधनाऐं की जाती हैं वे अन्य समयों की अपेक्षा अधिक फलवती होती है। मन्त्र सिद्धि के लिए यह अतीब शुभ अवसर है।
गायत्री साधना के लिए यह नवरात्रि का पुण्य पर्व बड़ा ही शुभ मुहूर्त हैं। उस समय के थोड़ा सा साधन भी अन्य समय के विशेष साधन से अधिक सफल होता है। अखण्ड जोति के पाठक इसे अवसर पर गायत्री का न्युनाधिक साधन करें, इस प्ररेणा के साथ इस अंक को अवश्यक आदेशों के साथ नियत समय से कुछ पूर्व ही भेजा जा रहा है।

