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Magazine - Year 1951 - Version 2

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(श्री नैनूराम जी याज्ञिक, रौहेरा)

सृष्टि के नियमानुकूल हम हर पदार्थ-जड़ अथवा चेतन को विकसित होता हुआ पाते हैं। और जब तक कोई भी पदार्थ अपने विकास को प्राप्त नहीं होता है तब तक उसके अस्तित्व की उपयोगिता व वास्तविकता का ठीक लाभ नहीं उठाया जा सकता। इसी भगवद् सृजनात्मक नियमों के आधार पर जीवात्मा अनेक योनियों में परिभ्रमण करता हुआ सर्वोत्कृष्ट मानव योनि को प्राप्त कर सकता है जिसका वास्तविक हेतु भगवान की लीला को समझने के लिए ऊर्ध्वगामी बनने का है, न कि अपने विकास क्रम से पुनः नीचे गिरने का, अथवा एक सी ही स्थिति में परिभ्रमण करते रहने का। ऐसी दशा में हमारे लिए यह वाँछनीय हो जाता है कि हम अपने आपको समझें और सर्वदा अपने जीवन के विकास क्रम को बनाये रखने के लिए प्रयत्नशील रहें। हमें यह मानकर ही संतुष्ट नहीं रह जाना चाहिए कि हम अपने अज्ञानवश अनुचित कार्य भी करते रहें, फिर भी परम दयालु परमात्मा हमें माफ कर हमारा उद्धार कर ही लेंगे। ऐसा मानकर हमारे लिए कार्य करते रहना अमानुषिक होगा। अगर ऐसा ही हो तो फिर हममें और पशुओं में किसी प्रकार का भेद न रहेगा। हमें यह स्मरण रखना चाहिए कि परमात्मा ने पशुओं की अपेक्षा हमें बुद्धि प्रदान कर अपनी सर्वश्रेष्ठ रचनात्मक कृति का परिचय दिया है जिसके द्वारा उसका उचित दिशा में प्रयोग करने पर उसकी लीलाओं के रहस्य को समझते हुए हम अपने विकास क्रम की गति को अग्रगामी बनाये रखने में समर्थ हो सकते हैं।

हमारी प्रकृति तम, रज, और सत् गुणों के मिश्रण से बनी हुई होती है। और इसी त्रिगुणात्मक प्रकृति में किसी भी गुण की प्रधानता रहने से हमारी विचार धाराएं उसी गुण जनित कार्यों की ओर प्रवाहित होती रहती हैं और हमारी इन्द्रियाँ वैसे ही कार्य करने में हमें विवश करती हैं। हमारी प्रकृति में तमोगुण की प्रधानता मूढ़ता व अज्ञानता, रजोगुण की प्रधानता इन्द्रिय लोलुपता व सतोगुण की प्रधानता-विवेक बुद्धि की परिचायक होती है। अतएव तम और रजोगुण जनित हमारे कार्य हमें नाना प्रकार के मानसिक एवं कायिक क्लेशों का फलोपभोग करने के लिए बाधित करते हैं जो हमें अपने विकास क्रम से पदच्युत करते रहते हैं। परन्तु इसके विपरीत सतोगुण की प्रधानता रहने पर हमारे सारे कार्य विवेक युक्त होने से चिर शान्ति और आनन्द के सूचक बनते रहते हैं। जिससे यह भली भाँति ज्ञात किया जा सकता है कि हम अपने विकास की ओर पदार्पण किये जा रहे हैं।

प्रायः देखा जाता है कि हमारी चेतना शक्ति विशेषतः तम और रज की प्रधानता से परिवेष्टित रहने से हमें पशु धर्म की ओर प्रवृत्त करती रहती है जिसकी ओड में रह कर हम अपने वास्तविक मानव धर्म को भूले रहते हैं। और इस चेतना के बाह्याँतर अथवा स्थूल रूप को ही महत्ता प्रदान कर उसी को अपने जीवन की सार्थकता समझ बैठते हैं जो कि हमारी ऐसी अधूरी समझ हमें अपने मानवोचित विकास क्रम में बाधाएं पहुँचाने वाली होती है। हमें इस बात का भी ख्याल रखना चाहिए कि हमारी चेतना का केवल वही रूप नहीं है परन्तु उसका आँतरिक स्थूल रूप भी है। जिसका अनुभव करने के लिए अज्ञानता अथवा अविवेक हमारे पथ में बाधाएँ उपस्थित करते हैं। उस चेतना द्वार को खोलने के लिए हमारे लिये यह अत्यावश्यक हो जाता है कि हम अपनी प्रकृति में सतोगुण की प्रधानता को उत्पन्न करने का प्रयत्न करते रहें जिससे विवेक बुद्धि का प्रादुर्भाव हो। और यह उसी दशा में संभावनीय है जब कि हम अपने जीवनोपयोगी कार्यों का सम्पादन करते हुए यम नियमों के साथ अपनी निष्ठा के अनुकूल भगवद् आराधना को जीवन का मुख्य अंग बना लें। ऐसा करते रहने से हमारी तम और रजोगुण जनित पाशविक वृत्तियों का शमन होकर दिव्य वृत्तियाँ जागरित होती जायेंगी। जिसके फलस्वरूप हमारी कार्यप्रणाली ज्ञान व विवेकयुक्त बनी रहेगी और शनैः शनैः हम अपने विकास क्रम को अर्थात् आत्मिक विकास को प्राप्त कर सकेंगे। हमारा आत्मिक विकास ही हमारे जीवन की वास्तविकता है।

क्या खोया ? क्या पाया?

आज की इस नई प्रगति के युग में हमने क्या क्या खोया क्या क्या पाया ?

ज्ञान खोया -विज्ञान पाया। श्रद्धा खोई-अनभिज्ञता पाई। आचार खोया-विचार पाया। विश्वास खोया-तर्क पाया। स्वास्थ्य खोया-इलाज पाया। नीति खोई- बुद्धि पाई। ईमान खोया-अभिमान पाया। प्रेम खोया-इल्म पाया। दिल खोया-दिमाग पाया। भूख खोई-भोजन पाया। सच्चाई खोई-चतुराई पाई।

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