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Magazine - Year 1951 - Version 2

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सतोगुण को बढ़ाने का प्रयत्न कीजिए।

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(श्री अशर्फी लाल जी मुख्तार, बिजनौर)

यह सृष्टि त्रिगुणमयी है। सतोगुण, रजोगुण, तमोगुण, इन तीन गुणों से संसार के समस्त जड़ चेतन ओत प्रोत हो रहे हैं। तमोगुण में आलस्य (अशान्ति युक्त मूढता), रजोगुण में क्रियाशीलता (चंचलता), सतोगुण में शान्ति युक्त क्रिया (अनासक्त और निःस्वार्थ व्यवहार) होता है।

प्रायः तमोगुण और रजोगुण की ही लोगों में प्रधानता होती है। सतोगुण आज कल बहुत कम मात्रा में पाया जाता है। क्योंकि उच्च आध्यात्मिक साधना के फल स्वरूप ही सतोगुण का विकास होता है। सतोगुण की वृद्धि ही परम अर्थ कल्याण का हेतु है। सात्त्विकता जितनी बढ़ती जाएगी उतना ही प्राणी अपने लक्ष्य (मुक्ति) के निकट होता जाएगा। इसके विपरीत रजोगुण की अधिकता से मनुष्य भोग और लोभ के कुचक्र में फँस जाता है और तमोगुणी तो तीव्र गति से पतन के गर्त में गिरने लगता है।

तमोगुण प्रधान मनुष्य आलसी, अकर्मण्य निराश और परमुखापेक्षी होता है। वह हर बात में दूसरों का सहारा टटोलता है, अपने ऊपर अपनी शक्तियों के ऊपर उसे विश्वास नहीं होता। दूसरे लोग किसी कुपात्र को सहायता क्यों दें? जब उसे किसी ओर से समुचित सहयोग नहीं मिलता तो खिन्न और क्रुद्ध होकर दूसरों पर दोषारोपण करता है और लड़ता झगड़ता है। लकवा मार जाने वाले रोगी की तरह उसकी शक्तियाँ कुण्ठित हो जाती हैं और जड़ता एवं मूढ़ता में मनोभूमि जकड़ जाती है। शरीर में स्थूल बल थोड़ा बहुत भले ही रहे पर प्राण शक्ति, आत्मबल, शौर्य एवं तेज का नितान्त अभाव रहता है। ऐसे व्यक्ति बहुधा, कायर, कुकर्मी, क्रूर, आलसी और अहंकारी होते हैं। उसके आचरण, विचार, आहार कार्य और उद्देश्य सभी मलीन होते हैं।

तमोगुण पशुता का चिन्ह है। चौरासी लाख योनियों में तमोगुण ही प्रधान रहता है। वही संस्कार जिस मनुष्य के जीवन में प्रबल हैं उसे नर पशु कहा जाता है। इस पशुता से जब जीव की कुछ प्रगति होती है तब उसका रजोगुण बढ़ता है। तब की अपेक्षा उसके विचार और कार्यों में राज सिकता अधिक रहती है।

रजोगुणी में उत्साह अधिक रहता है, फुर्ती, चतुराई, चालाकी, होशियारी, खुदगर्जी, दूसरों को उल्लू बनाकर अपना मतलब गांठ लेने की योग्यता खूब होती है। ऐसे लोग बातूनी, प्रभावशाली, क्रियाशील, परिश्रमी, उद्योगी, साहसी, आशावादी, और विलासी होते हैं। उनकी इन्द्रियाँ बड़ी प्रबल होती हैं। स्वादिष्ट भोजन, बढ़िया ठाठ-बाट, विषय-वासना की इच्छा सदैव मन में लगी रहती है। कई बार तो वे भोग और परिश्रम में इतने निमग्न हो जाते हैं कि अपना स्वास्थ्य तक गँवा देते है।

यारबाजी, गप-शप, खेल-तमाशे, नृत्य-गान, भोग-विलास, शान-शौकत, रौब-दौब, ऐश-आराम, शाबाशी, वाहवाही, बड़प्पन, और धन दौलत में रजोगुणी लोगों का मन खूब लगता है। सत्य और शिव की ओर उनका ध्यान नहीं जाता पर ‘सुन्दरम्’ को देखते ही लट्टू हो जाते हैं। ऐसे लोग बहिर्मुखी होते हैं, बाहर की बातें तो बहुत सोचते हैं पर अपनी आंतरिक दुर्बलता पर विचार नहीं करते, अपनी बहुमूल्य योग्यताओं परिस्थितियों और शक्तियों को अनावश्यक रूप से हल्की छिछोरी और बेकार की बातों में बर्बाद करते रहते हैं।

सतोगुण की वृद्धि जब किसी मनुष्य में होती है तो उसकी अन्तरात्मा में धर्म, कर्त्तव्य, और आत्म कल्याण की इच्छा उत्पन्न होती है। न्याय और अन्याय का, सत् और असत् का, कर्त्तव्य, अकर्त्तव्य का, ग्राह्य और त्याज्य का भेद स्पष्ट रूप से परिलक्षित होने लगता है। तत्व ज्ञान, धर्म विवेक, दूरदर्शिता, सरलता, नम्रता और सज्जनता से उसकी दृष्टि भरी रहती है। दूसरों के साथ करुणा, दया, मैत्री, उदारता, स्नेह, आत्मीयता और सद्भावना का व्यवहार करता है। कुच काँवन की तुच्छता को समझ कर वह तप, साधना, स्वाध्याय, सत्संग, सेवा, दान, और प्रभु शरणागति की ओर अग्रसर होता है।

सात्विकता की अभिवृद्धि होने से आत्मा में असाधारण शान्ति, सन्तोष, प्रसन्नता, प्रफुल्लता एवं आनन्द रहता है। उसका प्रत्येक विचार और कार्य पुण्यमय होता हैं। जिससे निकटवर्ती लोगों को भी ज्ञात और अज्ञात रूप से बड़ी शान्ति एवं प्रेरणा प्राप्त होती है।

तमोगुण सबसे निष्कृष्ट अवस्था है। रजोगुण उससे कुछ ऊँची तो है पर मनुष्यता से नीची है। मनुष्य का वास्तविकता परिधान सतोगुण है। मनुष्यता का निवास सात्विकता में है। आत्मा को तब तक शान्ति नहीं मिलती जब तक कि उसे सात्विकता की परिस्थिति प्राप्त न हो। जो मनुष्य जितना सतोगुणी है वह परमात्मा के उतना ही समीप है। इस दैवी तत्व को प्राप्त करके जीव धन्य होता है क्योंकि जीवन लक्ष की प्राप्ति का एक मात्र साधन सतोगुण ही है। प्रत्येक आत्म कल्याण के प्रेमी को अपने में सात्विकता की अभिवृद्धि के लिए निरन्तर प्रयत्न शील रहना चाहिए।

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