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First 17 19 Last
(श्री रघुनाथ राव, दिल्ली)

मालिक चाहते हैं कि नौकर उनके काम का ठीक प्रकार अंजाम दे। तनख्वाह देने के साथ साथ उनकी चाहना उचित है। नौकर भी कुछ ईमानदार होते हैं कुछ बेईमान, बेईमान नौकर अच्छी परिस्थितियों में भी काम से जी चुराते हैं, या उनमें बिगाड़ पैदा करते है, इसके विपरीत ईमानदार कर्मचारी को बुरी परिस्थिति में रहना पड़े तो भी वह जहाँ तक हो सकता है मालिक के बताये हुए काम तथा उत्तरदायित्व को पूरा करता है। मैं अपनी अन्तरात्मा के सामने ईमानदार व्यक्ति हूँ और सदैव यही सोचता रहता हूँ कि मालिक के काम को सच्चे मन से पूरा करूं।

अपनी इस कर्तव्यनिष्ठा के कारण मुझे अपने साथियों की अपेक्षा कहीं अधिक श्रम तथा समय लगाना पड़ता है, इसके अतिरिक्त उस अपनी आमदनी से भी वंचित रहता हूँ जिसके ऊपर सभी लोग गुलछर्रे उड़ाया करते है। कर्तव्य निष्ठ एक कसौटी है जिस पर रोज ही अपने को घिसना पड़ता है, ईमानदारी एक अग्नि परीक्षा है जिसमें ईमानदार को रोज ही तपना पड़ता है। यह दोनों ही परिणाम भुगतने का मैं बहुत समय से आदि हो गया हूँ। मेरी बेबसी और परेशानी पर कुछ सहृदय लोग तो सहानुभूति दिखाते हैं पर साधारणतः मुझ जैसे लोग मूर्ख कहलाते हैं और उपेक्षा की दृष्टि से देखे जाते हैं।

अनुकूल वातावरण न होने और अनेक असुविधाएं रहने पर अच्छा नौकर भी अपनी योग्यता का ठीक प्रकार परिचय नहीं दे पाता, पूरी शक्ति भर काम करते देखकर अफसर लोग प्रसन्न भले ही होते हों पर मेरा अन्तःकरण प्रसन्न न था, मैं चाहता था कि अमुक असुविधायें दूर हो जावें तो मैं और भी अधिक सेवा करने में समर्थ हो सकूँ। गायत्री माता का जप करते हुए मेरे अन्तःकरण में रहने वाली यह कामना भी माता को प्रकट हो ही जाती है।

जिस विभाग में, मैं पड़ा हुआ था, उसमें से बाहर जाने की बदली होने की सम्भावना न थी, मैं उससे बदली चाहता था, पर चाहने से ही क्या हो सकता है, कई बार के छोटे-मोटे प्रयत्न निष्फल भी हो चुके थे। मुल्ला की दौड़ मस्जिद तक होती है, गायत्री माता को अपने मन की व्यथा सुनाकर सन्तोष कर लेता।

अचानक ऐसा लगा मानों मेरी व्यथा का निवारण होने वाला हो। ता. 17.2.52 को गायत्री कवच मैंने धारण किया। दूसरे ही दिन दोपहर को 12 बजे चिट्ठी आई कि एक अच्छे स्थान पर बदली के लिए हम लोगों के “शॉर्टहैंड की” परीक्षा एक घण्टे बाद 5 बजे होगी। 1 घंटे में तो कोई तैयारी भी न हो सकती थी, पर इच्छा अवश्य थी कि यह स्थान मुझे मिल जावे तो उत्तम है। माता का ध्यान और स्मरण इस क्षण मन ही मन बड़े जोरों से होने लगा।

परीक्षा हुई। परिणाम निकला तो मालूम हुआ कि मैं पहले ग्रुप में सर्वप्रथम रहा और रेलवे मिनिस्ट्री के दफ्तर में पहुँच गया। कुछ समझ में नहीं आया कि यह सत्परिणाम मुझे किस सुकर्म का मिल रहा है। सब साथी भी हैरान हैं कि इसके पास क्या जादू है जिसे चार महीने के अन्दर दो परिवर्तन प्राप्त कर चुका। जिस पद पर अभी नियुक्ति हुई है उसका ग्रेड 330 तक है।

आगे जो होना होगा, होगा। माता की शरण लेकर में बड़ा सन्तुष्ट हूँ। आत्मिक उन्नति के लिए मैं जैसा वातावरण और अवसर चाहता था उसी दिशा में प्रगति हो रही है। अपनी एक ही इच्छा है- “पूरी ईमानदारी और पूरी तत्परता का आदर्श उपस्थित करना” माता मेरी कठिनाइयाँ सुलभ कर उसी स्थान पर ले पहुँचेगी जहाँ इसके लिए उपयुक्त अवसर होगा ऐसा मुझे विश्वास है। इस मार्ग पर चलने वाला प्रत्येक व्यक्ति ऐसी ही आशा रख सकता है।

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