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Magazine - Year 1953 - Version 2

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गायत्री तीर्थ की स्थापना समारोह

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(पं.रामदयाल परिहार, तिलहार)

गायत्री तीर्थ का निर्माण, माता के मन्दिर की प्राण प्रतिष्ठा, तथा पूर्णाहुति महायज्ञ का आयोजन तारीख 20, 21, 22 जून को सानन्द सम्पन्न हो गया। उस अवसर पर केवल 240 सज्जनों को ही आमन्त्रित किया गया था इसलिए उस मनोहर दृश्य का लाभ कुछ थोड़े से बड़भागी ही ले सके। पर वे हजारों गायत्री प्रेमी जो उस अवसर पर उपस्थित नहीं हो सके, अवश्य ही इस यज्ञ में सूक्ष्म रूप से सम्मिलित रहे होंगे। उनके लिये इस उत्सव का आँखों देखा संक्षिप्त विवरण नीचे की पंक्तियों में उपस्थित करते हैं। इस सम्बन्ध में विशेष प्रकाश तो आचार्य जी अगले अंक में स्वयं डालेंगे। इस समय नहीं लिख सके हैं इसलिए पढ़कर संतोष कर लेना होगा।

समारोह को सफल बनाने के लिये कितने ही महानुभाव लगभग 10 दिन पूर्व मथुरा आ गये थे। ता. 18 और 19 को तपोभूमि में काफी चहल पहल आरम्भ हो गई थी। रात को प्रवचन होने आरम्भ हो गये थे। श्री. स्वामी देवदर्शनानन्द जी सरस्वती का प्रवचन दोनों दिन हुआ। आचार्य जी का लिखित भाषण ता. 21 को पढ़ कर सुनाया गया। जिसे सुनकर श्रोता लोग गदगद हो गये। पण्डित मुकुट बिहारीलाल जी शुक्ल वकील, सम्पादक ‘मानव’ के तीनों दिन महत्वपूर्ण प्रवचन हुए।

ता. 20 को प्रातःकाल से कार्य आरम्भ हुआ। आचार्य श्री. लालजी कृष्ण पण्डमा की अध्यक्षता में पंचमुखी यज्ञ का कार्य आरम्भ हुआ। वेदपाठी विद्वान ब्राह्मणों ने पूर्ण शास्त्रोक्त रीति से कुण्ड तथा वेदियों की रचना की थी। वैदिक विधि विधान के साथ देव पूजन तथा यज्ञ हुआ।

लगभग 250 व्यक्ति देश के कौने कौने से आये हुए थे। मद्रास को छोड़कर भारतवर्ष के प्रत्येक प्रान्त का प्रतिनिधित्व मौजूद था। आगन्तुकों में 16 वकील, 41 ग्रेजुएट, 1 इंजीनियर, 3 डॉक्टर तथा अनेकों संस्कृत एवं धर्मशास्त्र के सुयोग्य ज्ञाता महानुभाव उपस्थित थे। सभी विचारधाराओं के व्यक्ति अपने तुच्छ मतभेदों को भूल कर अनेकता में एकता अनुभव करने के लिए एकत्रित थे। अधिकाँश महानुभाव सनातन धर्मी थे पर आर्य समाजों के उच्च पदाधिकारी तथा कई बातों में मतभेद रखने वाले अन्य अनेकों महानुभाव उतनी ही श्रद्धा और तत्परता के साथ भाग ले रहे थे। 40 से अधिक महिलाएं बाहर से आई थीं, यह सभी गायत्री उपासना में बहुत समय से निष्ठावान रही थीं।

प्रायः सभी आगन्तुकों ने तीन दिन के विस्तृत कार्यक्रम में भाग लिया। तीन दिन में गायत्री का 24 लक्ष जप पुरश्चरण, 60 हजार आहुतियों का हवन, 1 हजार गायत्री चालीसा का पाठ, यजुर्वेद तथा गीता के पारायण, भागवत दशम स्कन्द तथा रामायण सुन्दर काण्ड के पाठ, श्री सूक्त, पुरुष सूक्त, गायत्री सहस्र नाम, गायत्री कवच, रुद्राष्टाध्यायी, दुर्गासप्तशती पाठ, महामृत्युँजय का जप आदि का सुव्यवस्थित कार्यक्रम तीनों दिन चलता रहा। सुव्यवस्थित कार्य क्रम तीनों दिन चलता रहा। सभी आयोजन बड़ी सफलतापूर्वक सम्पन्न हुए।

प्रातः साढ़े 3 बजे जागने की घण्टी बज जाती थी। सभी लोग उठकर शौच, स्नान, से निवृत्त होकर 5 बजे से पूर्व ही उपासना में लग जाते थे। 8 बजे सबको पंच गव्य दिया जाता था। साढ़े 11 बजे तक विविध कार्यक्रम चलते रहते। मध्याह्न को फलाहार दिया जाता। दो घण्टे का विश्राम देकर 2 बजे से फिर सब कार्यक्रम आरम्भ हो जाते और सायंकाल 5 बजे तक चलते रहते। इसके बाद लोग शौच स्नान से निवरते। सायं काल को फिर थोड़ा स्वल्प फलाहारी जल पान मिलता। रात्रि को 8 बजे से कीर्तन तथा प्रवचन होते और प्रायः 11 बजे तक समाप्त होते। ता. 21 की रात्रि को परिचय सम्मेलन हुआ। सब लोगों ने अपने अपने परिचय खड़े होकर स्वयं दिये, गायत्री परिवार का प्रत्येक सदस्य इस अवसर पर बहुत ही प्रसन्न दृष्टिगोचर हो रहा था। अपने इतने भाई बहिनों को सामने देखकर उत्साह और हर्ष से सबके मन भरे हुए थे।

महिलाओं का पंडित अलग था, उनने बड़ी ही श्रद्धा तथा तत्परता के साथ भाग लिया। पहले दिन उनने सवा हजार से अधिक गायत्री चालीसा के पाठ किये। दूसरे दिन उनके लिए सवा लक्ष गायत्री जप का आयोजन था उन्होंने उससे भी अधिक जप किये। तीसरे दिन उनके द्वारा हवन का आयोजन था। सेवा कार्यों में उनका सहयोग सराहनीय रहा।

मन्दिर की प्राण प्रतिष्ठा का कार्यक्रम तीनों दिन चलता रहा। ता. 22 गंगा दशहरा एवं गायत्री जयन्ती के पुण्य पर्व पर मध्याह्न काल को शुभ मुहूर्त में माता जी की प्रतिमा की प्राण प्रतिष्ठा वेद मन्त्रों के साथ सम्पन्न हुई। प्रतिमा की भव्यता देखते ही बनती थी। दर्शन को ऐसा लगता था मानों प्रसन्न मुद्रा में उसे आशीर्वाद दे रही हों।

उत्सव के विभिन्न अवसरों की चलती फिरती सिनेमा फिल्म खींची गई जो छोटे और बड़े सिनेमाओं में आसानी से दिखाई जा सकेगी। कितने ही फोटो भी लिये गये जो सम्भवतः अखण्ड ज्योति के अगले अंकों में छपेंगे।

आचार्य जी 24 दिन के उपवास के कारण अत्यन्त दुर्बल हो गये थे। उनका 117 पौण्ड का शरीर भार घट कर 95 पौण्ड रह गया था, शरीर काम नहीं करता था फिर भी वे तख्त पर पड़े हुए आगन्तुकों से निरन्तर कुशल क्षेम पूछना, पूछे हुए प्रश्नों का उत्तर देना तथा व्यवस्था का संचालन करना जारी था। दुर्बलता इतनी अधिक थी कि खड़े होते ही शरीर काँपता था पर उनके चेहरे का तेज और वाणी का रस तनिक भी कम नहीं हुआ था। गंगा जल पीकर 24 दिन पूरे करने से उनका आत्म तेज कितना निखर गया है इसकी झाँकी हर आँख वाले को होती थी। वे बहुत कम बोल पाते थे, पर उपस्थित लोगों में से हर व्यक्ति यह अनुभव करता था मानों उसे परा और पश्यति वाणियों द्वारा बहुत ही महत्वपूर्ण शिक्षा दी जा रही है।

जिन लोगों को इस पुनीत अवसर पर उपस्थित रहने का सौभाग्य मिला वे इन दिनों को धन्य मान रहे थे। सभी व्यक्ति एक प्रकृति के होने के कारण प्रेम आत्मीयता, स्नेह, सौहार्द, एवं स्नेह भावना का झरना झर रहा था, ऐसा अनुभव होता था मानों स्वर्गीय सुख यहाँ से फूट पड़ता हो। अधिकाँश व्यक्ति एक दो दिन पहले आ गए थे और यज्ञ से एक दो दिन पीछे गये। पर यह समय कुछ घण्टों की तरह बीत गया। किसी की इच्छा इस स्वर्गीय आनन्द को छोड़ने की न थी। कई व्यक्ति तो जाते समय बालकों की तरह फूट फूट कर रोये, यों वियोग से दुख तो सभी को हुआ परिस्थितियों के कारण, मजबूरियों के कारण, जाना पड़ रहा था पर हृदय से कोई भी जाना न चाहता था।

यज्ञ के लिए अरुणि मंथन द्वारा वेद मन्त्रों से अग्नि उत्पन्न की गई जिसका दृश्य बड़ा ही प्रभावोत्पादक था। प्राचीन काल में ऋषि लोग दो लकड़ियाँ घिसकर किस प्रकार वेद मंत्रों द्वारा यज्ञ के लिये अग्नि उत्पन्न करते थे, इसका प्रत्यक्षीकरण देखकर सबको बड़ा हर्ष हुआ। इस पवित्र तथा लम्बे व्यतीत काल से जलती आ रही उस अग्नि को विशेष रूप से एक अप्रकट महात्मा के यहाँ से मंगाई गई थी। उन दोनों को यज्ञ में स्थापित किया गया। पंचमुखी घृत दीप की अखण्ड-ज्योति आयोजन के आरम्भ से अन्त तक जलती रही।

गायत्री मन्त्र लेखन लगभग 18 करोड़ एकत्रित हो गये थे उनकी विधिवत पूजा प्रतिष्ठा की गई। दो हजार से अधिक तीर्थों की रज तथा जल एक कक्ष में और मन्त्र लेखन की कापियाँ सुसज्जित रूप से दूसरे कक्ष में स्थापित की गईं थीं। (see copy lines missing)

तीन दिन का उपवास, भूमि शयन तथा सभी प्रकार का संयम नियम पालन करने से यज्ञ आयोजन में सम्मिलित रहने से प्रत्येक व्यक्ति यह अनुभव करता था, कि उसे एक विशेष आत्मबल प्राप्त हो रहा है। उस वातावरण की पवित्रता एवं सात्विकता हर हृदय में प्रवेश कर रही थी और ऐसा लगता था कि आन्तरिक कषाय कल्मषों को धोकर आत्मा को स्वच्छ कर देने वाली कोई दिव्य मन्दाकिनी सूक्ष्म रूप से यहाँ प्रवाहित हो रही है।

जितने व्यक्ति आये थे, सभी ने उत्सव को सफल बनाने के लिए जी-जान से प्रयत्न किया। जिनको जिस विभाग की सेवाएं दी गई थी, उसने अपने कर्तव्य को पूर्ण तत्परतापूर्वक पालन किया। धन्यवाद कौन किस किसको दे, सभी ने अपने आप ढंग से अपना कर्तव्य निभाया इसमें माता की प्रेरणा ही प्रधान कारण थी।

श्री. स्वामी देवदर्शनानन्द जी सरस्वती की अध्यक्षता में 24 लक्ष का जप पुरश्चरण पूरा हुआ। श्री मौनी महात्मा दुर्गा प्रसाद जी पंडित का शिवताण्डव नृत्य बड़ा ही प्रभाव पूर्ण रहा। छोटे से लेकर बड़े तक अपनी अपनी योग्यता के अनुभव बयाँ करते रहे। यज्ञ पूर्णतया सफल रहा। आँधी पानी की जो सम्भावना थी वह समारोह समय तक टलती रहीं पर यज्ञ समाप्त होते ही इन्द्र देव ने प्रसन्न होकर घनघोर जल वृष्टि की जिसको यज्ञ की सफलता समझकर सर्वत्र प्रसन्नता प्रकट की गई।

भविष्य के लिए ऐसी सुन्दर योजनाएं बनाई जा रही हैं जिनके द्वारा विस्तृत रूप से गायत्री विद्या लुप्त प्रायः महाज्ञान की पुनः स्थापना हो। प्रतिवर्ष चैत्र सुदी 15 को गायत्री उपासकों का एक वार्षिक सम्मेलन बुलाने का आयोजन रहा करेगा। जिस प्रकार का यज्ञ और पुरश्चरण मथुरा में हुआ था वैसे ही आयोजन देश भर में होते रहें इसके लिए प्रोत्साहन दिये जायेंगे। ऐसे आयोजनों में आचार्य स्वयं पहुँचने का प्रयत्न करेंगे। तपोभूमि में ऐसी व्यवस्था सोची जा रही है कि यहाँ नित्य नियमित पुरश्चरण और यज्ञ होते रहें। अधिक सस्ता गायत्री साहित्य छापने की भी योजना है। गायत्री सम्बन्धी खोज और अन्वेषण का कार्य इस तपोभूमि में निरन्तर होते रहेंगे।

आत्म कल्याण की साधना करने वालों के लिए यह तपोभूमि अत्यन्त ही महत्वपूर्ण एवं शाँतिदायक है। यहाँ ऐसे सज्जन स्थायी रूप से निवास कर सकेंगे जिन पर पारिवारिक उत्तरदायित्व नहीं है। जो लोग घरेलू जिम्मेदारियों से निवृत्त हो चुके हैं और शान्तिमय जीवन बिताना चाहते हैं उसके लिए आचार्य जी का सान्निध्य, एवं तपोभूमि का अत्यन्त ही पवित्र एवं प्रभावशाली वातावरण बहुत ही अनुकूल एवं शान्तिदायक सिद्ध हो सकता है। जिन्हें भगवान ऐसा सौभाग्य प्रदान करें उन्हें बड़भागी ही समझना चाहिए।

यह पुण्य तीर्थ निश्चित रूप से असाधारण महत्व पूर्ण हैं, जिस स्थान पर यह स्थापित है वह प्राचीन काल में महात्माओं की सिद्धि भूमि है, इसके चारों ओर अनेक शक्तिपीठ तथा तपोवन फैले हुए हैं। ब्रज का यह प्रमुख केन्द्र है ऐसे स्थान पर इस तीर्थ को बनाने या बनवाने में जिनका समय, श्रम, सहयोग तथा धन लाभ है उनके प्रयत्न की जितनी प्रशंसा की जाय उतनी कम है। इस संस्था के द्वारा भारतीय संस्कृति तथा भारतीय आध्यात्म धर्म के पुनरुत्थान में इस विशेष सहायता के आशातीत हैं।

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