साधकों को चेतावनी
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(श्री महात्मा अद्वैतानन्द जी महाराज)
गायत्री उपासना की महिमा जितनी कही जाय उतनी कम है। माता की कृपा से कोई भी सच्चा साधक वंचित नहीं रहता, उसे उसके परिश्रम की अपेक्षा कई गुना लाभ निश्चित रूप से मिल जाता है। परन्तु बुद्धिमानी इसमें नहीं है कि छोटे छोटे साँसारिक प्रयोजनों में साधना की महान आध्यात्मिक शक्ति को खर्च किया जाय। तप से बड़ा और कोई धन नहीं है। तप के बदले से ही सुख मिलता है। संसार में जितने सुखी, और सुसम्पन्न व्यक्ति दिखाई पड़ते हैं वे भूतकाल में तपस्वी रहे हैं जब उनका तप समाप्त हो जाएगा तो उन्हें तुच्छ प्राणी की तरह जीवन व्यतीत करना पड़ेगा। तब उनके पास कोई सम्पत्ति शेष न रह जायगी।
तप और पुण्य की सम्पत्ति जमा करते जाना ही वास्तविक बुद्धिमानी है। इस सम्पत्ति के भण्डार से साँसारिक और आत्मिक सभी महानताएं प्राप्त हो सकती हैं। यहाँ तक कि ईश्वर तक को खरीदा जा सकता है। तपस्वी या साधक के लिए एक बहुत बड़ा खतरा यह है कि जैसे ही उसे कुछ आत्मबल प्राप्त होता है वैसे ही वह उत्साह से भर जाता है और उसका प्रदर्शन करके यश, प्रतिष्ठा, पूजा या प्राप्ति में उसे खर्च करने लगता है, फलस्वरूप वह पूँजी अति शीघ्र समाप्त हो जाती है और वह रीता का रीता रह जाता है।
गायत्री उपासकों में आत्मबल अति शीघ्र बढ़ता है, उन्हें छोटी छोटी अनेक सिद्धियों का अनुभव थोड़े ही दिनों में होने लगता है। उस समय उन्हें बहुत ही सावधान रहना चाहिए। किसी का भाग्य बदलने में, ईश्वर के विधान को पलट कर अपनी इच्छा प्रधान सिद्ध करने में अपनी शक्ति नष्ट नहीं करनी चाहिये। पूर्व जन्मों के किये हुए कर्मों से जो प्रारब्ध बनता है उसके भले बुरे सभी भोगने पड़ते हैं। कर्म भोग से हरिश्चंद्र, मोरध्वज, कर्ण, नल, अम्बरीष, भगवान के परम कृपा पात्र होते हुए भी इन लोगों को अपने भाग्य का भोग पूरा करना पड़ा। भक्त यदि अपनी तपस्या की बाजी लगादे तो भगवान को अपना कार्य करने से रोक सकता है। इसलिए भगवान से भक्त को बड़ा बताया गया है। परन्तु यह ध्यान रखना चाहिए कि ऐसा दुस्साहस करने से भक्त की तपस्या बहुत शीघ्र समाप्त हो जाती है और वह अपनी संचित आध्यात्मिक पूँजी से हाथ धो बैठता है।
इसलिए अपने या किसी दूसरे के साँसारिक प्रयोजन पूरे करने के लिए कभी आत्मबल को, तपोधन को, नष्ट नहीं करना चाहिए। गायत्री साधक किसी को शाप वरदान न दे। जो व्यक्ति गायत्री माता की कृपा से लाभ उठाना चाहता है उसे स्वयं उपासना आराधना करके गायत्री महाशक्ति की सहायता प्राप्त करनी चाहिये। दूसरों के तप से स्वयं लाभ उठाना एक गलत तरीका है जिसे चालाक आदमी, भोले भाले साधकों को खुशामद या दीनता दिखाकर प्रयुक्त करते हैं। साधकों को किसी प्रपंच में फंसकर अपनी शक्ति बरबाद नहीं करनी चाहिए वरन् उसे आत्म कल्याण के लिए सुरक्षित करना चाहिए।
यदि गायत्री उपासक को लोक सेवा करनी है, दूसरे पर दया आती है, उनकी पीड़ा दूर करने की इच्छा है, तो अपनी सारी बुद्धिमानी खर्च करके उस मनुष्य को माता का उपासक बना देना चाहिए ताकि वह स्वयं आनन्द आध्यात्मिक और साँसारिक लाभों को प्राप्त कर सकें। इस उपचार से साधक का पुण्य परमार्थ बढ़ता है और उस मनुष्य का भी कल्याण होता है जो लोग स्वयं उपासना का कष्ट नहीं उठाना चाहते और किसी तपस्वी के तप का अवस्थित लाभ अपना प्रारब्ध बदलने में खर्च कराना चाहते हैं। खुदगर्ज लोगों से गायत्री साधकों को सावधान रहना चाहिए। अनेक साधक संसार में आये दिन घटित होती रहने वाली दुख सुख की घटनाओं में अपनी टाँग अड़ाकर किसी का प्रारब्ध बदलने के झंझट में लग जाते हैं, यह मूर्खता का मार्ग किसी भी दूरदर्शी गायत्री उपासक को नहीं अपनाना चाहिए।

