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Magazine - Year 1953 - Version 2

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हमारे कुछ आवश्यक कर्त्तव्य

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(श्री भगवानदास जी केला)

1.हम कोई काम उसी हालत में अच्छी तरह कर सकते हैं जब हममें उसको करने की योग्यता हो। इस योग्यता में शारीरिक योग्यता का बड़ा महत्व है, या यों कह सकते हैं कि और योग्यता होते हुए भी, यदि हमारा शरीर ठीक नहीं है, हमारा स्वास्थ्य खराब है, हम बीमार पड़े हैं, तो हम उस काम को अच्छा न करे सकेंगे, उसमें हमारा मन ही न लगेगा। इसलिए हर एक आदमी का पहला कर्त्तव्य है कि वह अपना स्वास्थ्य बनाये रखे। बीमार पड़ने पर जो अपने विविध कर्त्तव्यों का पालन नहीं कर सकता, वह दुखी रहता है। यही नहीं उसके भाई-बन्धु आदि भी बड़ी चिन्ता में रहते हैं, उनका बहुत सा समय उसकी सेवा-सुश्रूषा करने में लग जाता है, इसलिये वे भी अपना अपना काम अच्छी तरह पूरा नहीं कर पाते। जिस परिवार में कोई आदमी रोगी होता है, उसकी आमदनी कम हो हो जाती है, और दवा-दारु आदि का खर्च बढ़ जाता है। इससे सभी को असुविधा होती है। इससे वह स्पष्ट है कि स्वस्थ रहने का प्रयत्न करना कितना आवश्यक है।

2. स्वास्थ्य रेखा के नियम बहुत जटिल या पेचीदा नहीं हैं। आदमी को शुद्ध, ताजा और सादा भोजन करना चाहिये, साफ हवादार स्थान में रहना चाहिये, कुछ व्यायाम और जितना जरूरी हो विश्राम करते रहना चाहिये और मन में अच्छे सात्विक विचार रखने चाहियें।

कुछ आदमी निर्धनता के कारण और कुछ आलस्य या शौकीनी आदि के कारण इन बातों की ओर यथेष्ट ध्यान नहीं देते। इसका परिणाम यह होता है कि वे बीमार पड़ जाते हैं, उनका सुख नष्ट हो जाता हैं, तब उन्हें स्वास्थ्य का मूल्य ज्ञात होता है। इसलिए यह जरूरी है कि हम कोई बात ऐसी न करें जिससे हमारा स्वास्थ्य बिगड़ने की आशंका हो।

2. स्वास्थ्य रक्षा के साथ ही, शिक्षा पाने की कोशिश करनी चाहिए। लिखना-पढ़ना सीख लेने पर हम अपने विचार लिख कर रख सकते हैं। हमारे लेखों को पढ़ कर दूर-दूर रहने वाले आदमी हमारे विचार जान सकते हैं, और हम उनके विचारों से परिचित हो सकते हैं। इस तरह दूर-दूर के आदमियों से हमारा सम्बन्ध हो जाता है। यही नहीं, हम उन महापुरुषों के विचार और अनुभव भी जान सकते हैं, जो पुराने जमाने में हुए थे। उनके लेखों या पुस्तकों से हम लाभ उठा सकते हैं। और अपनी उन्नति कर सकते हैं। शिक्षित आदमी अपने कर्त्तव्यों का अच्छी तरह पालन कर सकते हैं, और अपनी जीवन-यात्रा शान्ति और सुख पूर्वक तय कर सकते हैं। नागरिकों को चाहिए कि अपनी सन्तान तथा भतीजे, भानजे आदि को भी शिक्षा दिलावें। हाँ, यह याद रखना आवश्यक है कि शिक्षा का अर्थ केवल लिखना-पढ़ना सीख लेना ही नहीं है, शिक्षा का अर्थ है हमारी शारीरिक, मानसिक तथा नैतिक शक्तियों का विकास। अतः हमें शिक्षा का व्यापक स्वरूप ग्रहण करना चाहिये। सब विषय की विशेष बातें लिखने का यहाँ प्रसंग नहीं है, तुम स्वयं जान लोगे।

3. अन्य कर्त्तव्यों में पहले स्वावलम्बन की ओर तुम्हें ध्यान देना आवश्यक है। तुम्हें समाज द्वारा पैदा या तैयार किये हुये भोजन- वस्त्र आदि की आवश्यकता होती है इन वस्तुओं को बिना मेहनत किये, मुफ्त में प्राप्त करना किसी को शोभा नहीं देता। यह तो एक प्रकार की चोरी है। भिक्षा, छल, कपट या चोरी करने का तो विचार भी मन में न लाना चाहिये। दान-दक्षिणा या सहायता के रूप में दूसरों से धन या अन्य पदार्थ लेना केवल उन्हीं लोगों के लिए ठीक है, जो अपाहिज या लूले, लँगड़े आदि हों, अथवा जो सब समय समाज हित की बातें सोचने या करने में लगाते हैं। समाज सेवा के बिना, दूसरों के द्वारा प्राप्त पदार्थों का उपयोग करना सर्वथा अनुचित है। हमें स्वावलम्बी बनना चाहिये। किसी आदमी का, अपने बाप-दादा आदि की कमाई खर्च करते हुए भी निखट्टू पड़े रहने ठीक नहीं। अपने निर्वाह के लिए हमें स्वयं उद्योग और पुरुषार्थ करना चाहिये!

4. जिस प्रकार हमें अपने जीवन निर्वाह के लिए स्वावलम्बी बनना चाहिए, उसी प्रकार अपने परिवार तथा आश्रितों के लिए भी हमें समुचित परिश्रम और उद्योग करना चाहिए। यही नहीं, प्रत्येक व्यक्ति को इतनी योग्यता प्राप्त करनी चाहिए कि उसके कमाए हुए धन से उसका और उसके परिवार आदि का निर्वाह होने के बाद भी कुछ बचत अवश्य रहे, जो संकट या बीमारी अथवा बेकारी आदि के समय काम आवे, और साथ ही साथ बड़े परिवार यानी देश की सामूहिक आवश्यकताओं की पूर्ति में भी वह सहायक हों। यह तभी हो सकता है जब हम सोच समझकर खर्च करने वाले हों, मितव्ययी हों, अंधा-धुन्ध पैसा उड़ाने वाले न हों। कारण यदि खर्च पर नियन्त्रण न रहे तो चाहे जितनी आमदनी हो, सभी खर्च हो सकती है। प्रायः देखने में आता है कि जिन लोगों की अच्छी खासी और निश्चित आमदनी है, वे क्षणिक आनन्द की वस्तुओं में पैसा खर्च कर देते हैं, पीछे अत्यन्त आवश्यक है और उपयोगी पदार्थों के लिये भी उनके पास धन की कमी हो जाती है और वे कर्जदार बन जाते हैं। बड़ी-बड़ी तनख्वाह पाने वाले कितने बाबू लोगों का यह हाल होता है कि तनख्वाह मिलते ही उसका अधिकाँश भाग पिछले महीने के बिल चुकाने में झटपट खर्च हो जाता है। पन्द्रह-सोलह तारीख से उनकी जेब खाली दिखाई देती है। किसी प्रकार जैसे-जैसे चौबीस-पच्चीस तारीख तक काम चलता है, फिर तो एक-एक दिन अगले महीने की तनख्वाह की इन्तजारी में बीतता है। यह सब इनकी अनसमझ का और उधार सौदा लेने की आदत का फल है। ये लोग चाहें तो आसानी से, अपना खर्च चला सकते हैं, और अपनी बीमारी या बेकारी आदि के संकट के अवसर के लिये कुछ पैसा जमा भी कर सकते हैं। हर आदमी को ऐसा नियम बनाना चाहिए कि कोई चीज खरीदने से पहले अपनी आर्थिक स्थिति और उस बीज की जरूरत का शान्ति और गम्भीरता से विचार करें। जहाँ तक हो सके कोई चीज उधार न खरीदी जाय, चाहे वह कुछ सस्ती ही क्यों न मिलती हो।

5. हमारा धन सिर्फ हमारे ही उपयोग के लिए नहीं है। उस पर समाज का भी खासा अधिकार है। हमारे धन से हमारे परिवार का भरण-पोषण होना चाहिए, यह बात तो आदमी फिर भी आसानी से समझ सकते हैं, परन्तु हमारे धन पर समाज का भी अधिकार है, यह कैसे? मैंने परिश्रम किया, और उस परिश्रम के बदले किसी आदमी या संस्था या सरकार से मुझे कुछ धन मिल गया। अब इस धन से किसी दूसरे का क्या सम्बन्ध? मैं इसे जिस तरह चाहूँ खर्च करूं। इसमें कोई रोक-टोक क्यों?

किसी भी कार्य के उदाहरण से यह स्पष्ट हो जायगा कि मुझ में धन पैदा करने की जो शक्ति या योग्यता आदि है, वह उसी दशा में है, जबकि मुझे समाज के अनेक आदमियों का सहयोग प्राप्त हुआ है। यदि दूसरे लोगों की सहायता न मिले तो कोई भी आदमी अकेला कुछ धन पैदा नहीं कर सकता। धन पैदा करने के बाद उसकी रक्षा या वृद्धि भी समाज के सहयोग बिना नहीं हो सकती। इसलिए धन को खर्च करने में इस बात का अवश्य विचार रहना चाहिये कि उससे समाज का हित भी हो। जिस समाज ने हमें धन पैदा करने योग्य बनाया है, उसकी उपेक्षा करना निंद्य ही नहीं, हानिकारक भी है। इसलिये हर आदमी को चाहिए कि अपने धन का अधिकारी सिर्फ अपने आपको न माने, उसमें समाज का भी हिस्सा समझे और इसी दृष्टि से उसे खर्च करे।

ऊपर कहा गया है कि प्रत्येक व्यक्ति को शक्ति और योग्यता उसे बहुत कुछ समाज से प्राप्त हुई हैं इससे हम इस नतीजे पर पहुँचते हैं कि हमें अपनी शक्ति आदि का उपयोग समाज की उन्नति के लिए करना चाहिए। हम समाज के मौजूदा आदमियों के तो बहुत ऋणी हैं ही, यदि विचार किया जाय तो हम अपने पुरखों या पूर्वजों के भी ऋणी हैं। हमें इस समय किसी विषय का जितना ज्ञान प्राप्त है वह इस बात पर निर्भर है कि हमारे पूर्वजों ने अपनी सामर्थ्य में उस दिशा में कितना कार्य किया। प्रत्येक समय में आदमी पिछली पीढ़ी के अनुभवों से लाभ उठा कर काम करते हैं, और आने वाली पीढ़ी के लिए अपने अनुभव विरासत में छोड़ जाते हैं। इस प्रकार पीढ़ी दर पीढ़ी कोशिश होती रहने से भौतिक या वैज्ञानिक उन्नति होती है। यही बात मानसिक जगत के सम्बन्ध में कही जा सकती है। एक पीढ़ी अपने विचार साहित्य के रूप में छोड़ती है, उसे मनन करके अगली पीढ़ी मनुष्य जाति के भावी विकास में मदद देती है। इससे स्पष्ट है कि हमारी यह सीढ़ी, अब तक की पिछली सीढ़ियों के प्रति बहुत ऋणी हैं। इस परम्परा को बनाए रखने के लिए हमें भी समाज की उन्नति में भरसक सहयोग करना चाहिए। बस, हमारा धन ही नहीं, हमारी शक्ति और योग्यता, यहाँ तक कि हमारा जीवन भी मानव समाज के हित के लिए है। हमें तुच्छ खुदगर्जी की जिन्दगी न बितानी चाहिए, अथवा, यह कहना ठीक होगा कि हमारा सच्चा स्वार्थ इस बात में है कि हम समाज के लिए जीवन व्यतीत करें। हम अपने शरीर को स्वस्थ और हृष्ट-पुष्ट बनावे अपनी मानसिक तथा अन्ध शक्तियों को बढ़ावें, लेकिन यह याद रखें कि इनका उपयोग समाज की सेवा और हित के लिए ही हो, और हमारे द्वारा किसी को कुछ कष्ट या असुविधा न हो।

6. हम दूसरों से भाई-बन्धु या पड़ौसी का सा व्यवहार करें, किसी को कुछ कष्ट न दें, उनके सुख को अपना सुख और उनके दुख को अपना दुख समझें। यदि यह बात भली-भाँति ध्यान में रख ली जाय और इसके अनुसार सब आदमी व्यवहार करें तो सामाजिक जीवन को बहुत सी असुविधाएँ दूर हो जायं। पर हम अपनी सुविधा, अपने सुख, और अपने लाभ की ओर दृष्टि रखते हैं। दूसरों की हम चिन्ता नहीं करते। हम ऐसी चिन्ता की आवश्यकता ही नहीं समझते, मिसाल के तौर पर कितने ही विद्यार्थी जोर से पढ़ा करते हैं कि दूसरों का ध्यान बँट जाता है, उनके अध्ययन में बाधा होती है। पर वे इसका विचार नहीं करते। रेल का टिकट खरीदते समय यदि खिड़की के पास पुलिस का सिपाही खड़ा न हो तो कितनी धक्का-मुक्की होती है। हर एक आदमी चाहता है कि दूसरों को हटा कर मैं आगे बढ़ जाऊँ। यहाँ तक कि हम बड़े, बालक या कमजोर आदमी का भी कुछ लिहाज नहीं करते। फिर जब आदमी रेल में सफर करता है, तो बहुधा शिक्षित और सभ्य कहलाने वाला व्यक्ति पाँव फैला कर लेट जाता है, और अपने सामान आदि से इतना स्थान घेर लेता है कि दूसरे मुसाफिरों को बैठने को भी जगह नहीं मिलती। वह देखता है कि उसके कितने ही भाई खड़े हैं, और कष्ट पा रहे हैं, पर वह स्वयं अपनी इच्छा से उनके लिए जगह की व्यवस्था नहीं करता। हमारे यहाँ कोई त्यौहार या विवाह-शादी है तो हम यह कब सोचते हैं कि हमारी धूम-धाम और गाजे-बाजे से हमारे पड़ौसियों को कोई कष्ट तो नहीं होता! प्रायः रात को बारह और एक-दो बजे तक शोरगुल होता रहता है, और बेचारे पड़ौसियों की नींद हराम हो जाती है। कभी-कभी हमारे पड़ौस में कोई आदमी बीमार होता है, उसे वैसे ही नींद नहीं आती, फिर हमारे गाजे-बाजे से उसको कितना कष्ट होगा, इसका सहज ही विचार किया जा सकता है। कुछ घरों में खास-खास अवसरों पर ‘रतजगा’ होता है, औरतें रात भर जागती और गीत गाती रहती हैं। चाहें ऐसी बात किसी रीत-राम के नाम पर की जाय या धार्मिक कृत्य की आड़ में, नागरिकता की दृष्टि से और मानवता के विचार से सर्वथा निंदनीय और त्याज्य है।

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