ब्रह्मचर्य का वास्तविक रूप
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(श्री ज्वाला प्रसाद गुप्त, एम. ए. एल. टी.)
ब्रह्मचर्य क्या है? ब्रह्मचर्य का साधारण अर्थ है कि पुरुष और स्त्री एक दूसरे को विषय की दृष्टि से न देखें, एक दूसरे को विषय के विचार से न छुएँ उनके मन में स्वप्न में भी विषय के विचार न उठें। जब वे एक दूसरे की ओर देखें या एक दूसरे के बारे में सोचें तो उनकी दृष्टि और विचार में कामुकता लेश मात्र भी न हो।
शरीर में वीर्य ही प्रधान वस्तु है और वीर्य की रक्षा करना ही ब्रह्मचर्य है। परन्तु हम देखते हैं कि पुरुष और स्त्री, बूढ़े ओर जवान सभी काम लिप्सा के जाल में फँसे पड़े हैं। विषय और वासना से अन्धे होकर लोग थोड़ी सी देर के मजे के लिये बड़े परिश्रम से कमाई हुई जीवन शक्ति की निधि को पलभर में खा बैठते हैं जब मद उतरता है, तब हम अपने को दयनीय दशा में पाते हैं। दूसरे दिन सवेरे हमारा शरीर भारी और सुस्त मालूम होता है और दिमाग काम करने से जवाब दे देता है। हम भस्म और याकूतियाँ खाते हैं, वैद्यों के पास जाकर ताकत की दवा माँगते हैं और सदा इस खोज में रहते हैं कि खोई हुई भोग की शक्ति कैसे यथावत हो जावे। इसी प्रकार दिन और वर्ष बीतते जाते हैं और जब असमय में ही बुढ़ापा आ जाता है हम अपने शरीर और दिमाग दोनों को ही क्षीण पाते हैं।
अतः ब्रह्मचर्य से होने वाले शारीरिक तथा मानसिक लाभ को ध्यान में रखकर ब्रह्मचर्य का पालन प्रत्येक व्यक्ति को करना चाहिए। संकुचित अर्थ में जननेन्द्रिय-विकार के विरोध और अमैथुन को ही लोग ब्रह्मचर्य का पालन समझते हैं। परन्तु वास्तव में यह अधूरी और खोटी व्याख्या है। ब्रह्मचर्य का पूर्ण अर्थ है विषय मात्र का निरोध। जो और इन्द्रियों को जहाँ तहाँ भटकने देकर केवल एक ही इन्द्रिय को रोकने का प्रयत्न करता है, वह निष्फल प्रयत्न करता है, इसमें सन्देह नहीं। कान से विकार की बातें सुनना, आँख से विकार उत्पन्न करने वाली वस्तु देखना, जीभ से विकारोत्तेजक वस्तु चखना, हाथ से विकारों को भड़काने वाली चीज को छूना और साथ ही जननेन्द्रिय को रोकने का प्रयत्न करना, यह तो आग में हाथ डालकर जलने को रोकने के समान हुआ। इसीलिए जो जननेन्द्रिय को रोकने का निश्चय करे उसे पहले ही से प्रत्येक इन्द्रिय को उस इन्द्रिय के विकारों से रोकने का निश्चय कर लेना चाहिये।
यदि हम सब इन्द्रियों को एक साथ वश में करने का अभ्यास करें- रफ्त डालें तो जननेन्द्रिय को वश में करने का प्रयत्न शीघ्र ही सफल हो सकता है, तभी उसमें पूर्ण रूप से सफलता प्राप्त की जा सकती है अतः ब्रह्मचर्य की संकुचित व्याख्या से भ्रमित न होकर हमें ब्रह्मचर्य के मूल अर्थ को याद रखना चाहिए। “ब्रह्मचर्य अर्थात् ब्रह्म की--सत्य की शोध में चर्या, अर्थात् तत्सम्बन्धी आचार। इस मूल अर्थ से सर्वेन्द्रिय संयम का विशेष अर्थ निकलता है” अतः केवल जननेन्द्रिय संयम के अधूरे अर्थ को तो हमें भुला ही देना चाहिए और समस्त इन्द्रियों का संयम मन, वचन और काया से होना चाहिए।
अतः याद रखिये कि आत्मा संयम, जो सर्वेंद्रिय संयम द्वारा ही सम्भव हैं, जीवन का नियम होना चाहिये। इसलिए मैथुन भी तभी किया जाय जबकि पति-पत्नी दोनों चाहें और वह भी नियमों से शासित होकर जिन्हें दोनों ने शान्त ‘चित्त से तय कर लिया हो। यदि आप विवाहित हैं तो याद रखिये कि आपकी स्त्री, मित्र, सहचरी और सहयोगिनी है, भोग विलास का साधन नहीं। यदि आप अविवाहित हैं तो अपने को पवित्र रखना आपका अपने प्रति, समाज के प्रति और अपने भावी साथी के प्रति, कर्त्तव्य है। यदि आप पति या पत्नी भक्ति की इस भावना को दृढ़ करेंगे, तो इसे आप सारे प्रलोभनों से बचने का अमोघ साधन पावेंगे।
परमात्मा ने शुक्र- (वीर्य) रूपी जो गुप्त शक्ति हमें दी है उसे दृढ़ आत्म-संचय द्वारा संचित करना चाहिए, फिर हम देखेंगे कि इससे केवल शारीरिक ही नहीं वरन् मानसिक और आत्मिक ओज और पौरुष में कितनी वृद्धि होती है।

