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Magazine - Year 1953 - Version 2

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चलते रहो! चलते रहो!

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(प्रो. मोहनलाल वर्मा बी. ए. एल. एल. बी.)

निरन्तर तीव्र गति से प्रवाहित सरिताओं का जल जीवन युक्त होता है, इसके विपरीत जिस जल में प्रवाह नहीं है, जो एक स्थान पर रुक गया है, वह सड़कर दुर्गंधमय हो उठता है। इस सड़े हुए स्थिर जल में भी ज्यों−ही प्रवाह की गति आती है, त्यों−ही इसमें नव जीवन का प्रादुर्भाव हो उठता है। गति ही जीवन हैं, स्थिरता मृत्यु का पर्याय है।

प्रकृति में देखिये, अनन्त आकाश का भ्रमण करता हुआ सूर्य प्रातः से अपना गतिवान जीवन प्रारम्भ करता है और अपरिमित लोकों को द्युतिमान करता हुआ सम्पूर्ण दिन गतिशील रहकर रात्रि में विश्राम ग्रहण करता है। उसकी इस यात्रा का प्रतिपल प्रतिक्षण गति से परिपूर्ण रहता है। निरन्तर गतिशील रहने के कारण ही कदाचित उसके द्वारा विश्व के जीव जगत का इतना भला होता है। सूर्य भगवान का एक दिन का विश्राम जीव-जन्तु जगत के लिए मृत्यु का सन्देश बन सकता है।

प्रकृति के जीव-जन्तु-पक्षी जगत को देखें, तो आपको स्पष्ट ज्ञात हो जायगा कि जो जीव गतिवान रहते हैं वे स्वास्थ्य, सौंदर्य और दीर्घजीवन का आनन्द प्राप्त करते हैं। निरन्तर यत्र तत्र उड़ने वाले विभिन्न पक्षी, जंगलों में इधर-उधर दौड़ने वाले हिरण, गतिवान जीवन व्यतीत करने वाली गाएँ, बकरियाँ, भेड़े, घोड़े, वृक्षों पर उछल-कूद का जीवन व्यतीत करने वाले बन्दर जल में निरन्तर गतिशील मछलियाँ, कछुए, मगर इत्यादि बड़ा स्वस्थ जीवन व्यतीत करते हैं। इसके विपरीत आलस्य में जड़ जीवों की तरह स्थिर पड़े रहने वाले जीव, पंगु, अल्पायु, और अस्वस्थ रहते हैं। निष्क्रिय जीवन व्यतीत करने वाले जीव जल्दी मृत्यु को प्राप्त होते हैं। उनके अवयव शैथिल्य में पड़े रहने के कारण निज कार्य यथोचित रीति से पूर्ण नहीं कर पाते।

प्राणिशास्त्र हमें सिखाता है कि जो अपनी शक्तियों- शारीरिक मानसिक या आध्यात्मिक-का निरन्तर उपयोग करता है, उस गति के कारण उनकी ये शक्तियाँ तथा निरन्तर सक्रिय रहने वाले अवयव पुष्ट होकर सुन्दर बन जाते हैं। काम न करने वाले अवयव सूख कर विनष्ट हो जाते हैं। निरन्तर कार्य से हमारा शरीर पुष्ट होकर आत्मा की ऊँचाई प्राप्त करता है।

लेखक की अपनी माताजी का उदाहरण गतिवान जीवन का जाग्रत उदाहरण है। वे बड़े तड़के पाँच बजे गृहस्थ के नाना कार्यों में दत्तचित्त हो संलग्न हो जाती हैं। ठण्ड या गर्मी शौचादि से निवृत्त होकर स्नान, ध्यान, पूजन, गीतापाठ के अतिरिक्त गृहस्थ के सभी कार्य ऐसे करती हैं जैसे किसी मशीन के द्वारा किये जा रहे हों। भैंस दुहने का कार्य हो या वस्त्र धोने का, पाकशाला के कार्य हों या सीने-पिरोने के, वे निरन्तर चलते रहते हैं। समस्त दिन कार्य से थक कर वे रात्रि में मीठी नींद सोती हैं। उन्हें पता नहीं रहता कि कहाँ सो रहीं हैं। भोजन कम से कम, वस्त्र सबसे थोड़े किन्तु कार्य सबसे अधिक। उनसे कोई उनके उत्तम स्वास्थ्य का रहस्य पूछे, तो वे उसे एक ही वाक्य में कहेगी, “जो फिरेगी, सो चरैगी, बँधो भूखौ, मरैगो।” अर्थात् जो चल-फिर कर गतिशील जीवन व्यतीत करेगा, उसे खुल-कर भूख लगेगी, जो एक स्थान पर बंधा रह कर गति विहीन जीवन व्यतीत करेगा, उसकी निष्क्रियता उसे मार डालेगी। इस उक्ति से उनके स्वस्थ जीवन का पूर्ण मर्म खिंच कर आ जाता है। वे गति को ही जीवन का प्रधान लक्षण मानती हैं। आधुनिक मानव के गिरे हुए स्वास्थ्य, कुरूपता, अल्पायु का प्रधान कारण स्थिर, गतिविहीन जीवन है। उसे थोड़ी दूर के लिये सवारी चाहिए। बस ट्राम ने उससे यात्रा का आनन्द छीन लिया है, साइकिल आधुनिक मानव का शत्रु है क्योंकि इसने आधुनिक युवक के पाँव जर्जरित, पंगु, शक्तिविहीन कर दिये हैं। उसे साइकिल का ऐसा क्रीतदास कर दिया है कि उसे थोड़ा भी चलना नहीं पड़ता। पाँवों का समुचित उपयोग न करने के कारण उसकी जीवन शक्ति का ह्रास हो गया हैं।

हम यह जानते हैं कि कुछ शौकीन लोग टहलने जाते हैं। बड़ी आबादियों में ऐसे व्यक्ति दस प्रतिशत से अधिक नहीं हैं जो टहलने के अभ्यस्त हैं। चाहे आप कोई व्यायाम करें, अथवा नहीं किन्तु टहलने का लोकप्रिय व्यायाम अवश्य करें। यदि नहीं तो आज से ही साइकिल का प्रयोग छोड़ कर इधर-उधर जाने के लिए पाँवों का ही प्रयोग किया करें।

“चलते रहो” का तात्पर्य विस्तृत है इसका एक अर्थ यह भी है कि कुछ न कुछ कार्य करते रहो, आलस्य में निष्क्रिय जीवन व्यतीत न करो। एक कार्य के पश्चात दूसरा कोई नवीन कार्य प्रारम्भ करो। मानसिक कार्य के पश्चात शारीरिक, शारीरिक श्रम के पश्चात मानसिक कार्य- यह क्रम रखने से मनुष्य निरन्तर कार्यशीलता का जीवन व्यतीत कर सकता है।

आलस्य शत्रु है, सक्रियता जीवन जागृति का लक्षण है। श्रम ही मनुष्य की सर्वोत्कृष्ट पूँजी है। आलसी व्यक्ति परिवार तथा समाज का शत्रु है। वह दूसरों के संचित श्रम पर निर्वाह करता है। ऐसे व्यक्ति से प्रत्येक परिवार को बचना चाहिये।

परिवारों में जितने व्यक्ति हों, सभी सक्रिय रहें, अपना-अपना कार्य जागरुकता से सम्पन्न करें। मुखिया का कर्त्तव्य है कि वह बच्चों में प्रारम्भ से ही कार्य करने की आदतों का विकास करे। बच्चों में आलस्य उनके भावी जीवन के लिए हानिकारक है।

निरन्तर कार्य करने से वासनाएँ नियन्त्रित रहती हैं। थक जाने से मनुष्य का मन घृणास्पद कृत्यों से बच जाता है। उसकी प्रवृत्तियाँ शुभ कार्यों की ओर अधिक लगती हैं। कार्यशीलता चरित्र को चमका कर द्युतिमान कर देती हैं और स्वास्थ्य सौंदर्य से परिपूर्ण कर देती हैं।

गतिशील जीवन का समग्र ज्ञान-विज्ञान एवं मर्म ऐतरेय ब्राह्मण के एक गीत में बड़ी सुन्दरता से व्यक्त किया गया है। इस गीत में भगवान इन्द्र ने हरिश्चन्द्र के पुत्र रोहित को सक्रिय जीवन व्यतीत करने का उपदेश इस प्रकार किया हैं :-

“हे रोहित! श्रम से जो नहीं थका, ऐसे पुरुष को भी नहीं मिलती। बैठे हुए आदमी को पाप घर बनाता है। इन्द्र उसी का मित्र है, जो बराबर चलता है। इसलिए चलते रहो, चलते रहो।

जो पुरुष चलता है, उसकी जाँघों में फूल फूलते हैं। उसकी आत्मा भूषित होकर फल प्राप्त करती है। चलने वाले से पाप थक कर सोये रहते हैं। इसलिए चलते रहो, चलते रहो!

बैठे हुए का सौभाग्य बैठा रहता है, खड़े होने वाले का सौभाग्य सोता रहता हैं और उठ कर चलने वाले का सौभाग्य चल पड़ता हैं। इसलिए, चलते रहो, चलते रहो!

सोने वाले का नाम कलि है, अंगड़ाई लेने वाला द्वापर है। उठ कर खड़ा होने वाला त्रेता है और चलने वाला कृतयुगी होता है। इसलिए चलते रहो, चलते रहो!

चलता हुआ मनुष्य ही मधु पाता है। चलता हुआ ही स्वादिष्ट फल चखता है। सूर्य का परिश्रम देखो, जो नित्य चलता हुआ कभी आलस्य नहीं करता। इसलिए चलते रहो, चलते रहो।

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