गो रक्षा हमारी आत्मरक्षा का प्रश्न है।
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(श्री मुरलीधर दिनोदिया बी. ए. एल. एल. बी.)
महात्मा गान्धी ने गाय को ‘सरल निर्दोषता की कविता कहा है। घास-फूस खाकर अमृतोपम दूध प्रदान करने वाली गाय वास्तव में प्रभु की सृष्टि में अपनी उपमा आप हैं। गोदुग्ध सचमुच इस लोक का अमृत है। एक दूध से ही कितने पदार्थ तैयार किये जाते हैं। बैलों से खेती करने तथा बोझा ढोने का काम लिया जाता है। गोबर तथा गोमूत्र वैज्ञानिकों द्वारा सर्वोत्तम खाद घोषित किए जाते हैं। मरने पर गाय का चमड़ा तथा हड्डियाँ आदि भी मनुष्य जाति के लिए परमोपयोगी सिद्ध होते हैं। मनुष्य की मृत्यु के अनन्तर गाय उसको वैतरणी से पार कराती है या नहीं करती इस विषय में हम अपनी अज्ञता स्वीकार करते हुए इतना कह सकते हैं कि मनुष्य को उसके जीवन में ही संसार-सागर को पार करने में जितना सहारा गाय से मिलता है उतना और किसी भी प्राणी से नहीं मिलता।
जीते जी और मरने पर भी मनुष्य जाति पर इतने उपकार बरसाने वाली गाय को आर्यों ने, हिन्दुओं ने, यदि माता कहा तो क्या अनुचित किया। कृतज्ञता आर्य जाति का एक गुण है। वेदों में गाय का नाम ही ‘अवध्न्या’ अर्थात् ‘जो मारी न जाए’ आया है। वेदों से लगाकर आज तक हमारी संस्कृति में गाय की यही प्रतिष्ठा चली आ रही है।
भारत वर्ष से विदेशियों की सत्ता को समाप्त करने के लिए जितने हिंसक-अहिंसक आन्दोलन आज तक चले, जितनी आजादी की लड़ाइयाँ लड़ी गई उन सब में गौ-रक्षा को पूरा-पूरा महत्व दिया गया। राजपूतों, मराठों, और सिखों ने गौरक्षा के लिए क्या नहीं किया।
इस युग में भारतीय राष्ट्रीयता के जनक ऋषि दयानन्द ने गो-रक्षा के महत्व को सबसे पहले समझा था और अंग्रेज अधिकारियों एवं मुसलमान नेताओं से मिलकर गो रक्षार्थ प्रयत्न किया था। उन्होंने ‘गो करुण निधि’ पुस्तक की हिन्दी में रचना की थी जो इस विषय पर भारत की समस्त लोग भाषाओं में सब से पहली पुस्तक है।
पीछे महात्मा गाँधी का आविर्भाव हुआ। उन्होंने तो गोवध को मनुष्य-वध के समान माना है और गोरक्षा के प्रश्न को स्वराज्य से भी ज्यादा महत्व दिया हैं। उन्होंने स्पष्ट किया है- “मेरे लिए गोवध और मनुष्य-वध एक समान है। भारत वर्ष में गोरक्षा का प्रश्न स्वराज्य से किसी भी प्रकार कम नहीं। कई बातों में तो मैं इसे स्वराज्य से भी बड़ा मानता हूँ।”
महात्मा गाँधी, भगवान तिलक, महामना मदन-मोहन मालवीय आदि महापुरुषों ने गो-रक्षा को स्वतन्त्रता-आन्दोलन का एक अंग बनाए रखा। गाँधी जी ने अपने विभिन्न कार्यों के लिए अलग-अलग ‘संघ’ बनाए तो गो-रक्षा के लिए गो-सेवा संघ भी स्थापित किया।
गो-रक्षा आर्य संस्कृति का प्रतीक है। गाँधी जी ने 1921 में अपने ‘नवजीवन’ पत्र में लिखा था कि “गो रक्षा हिन्दू धर्म की दी हुई दुनिया के लिए बख्शीश हैं। यह कोरी कपोल कल्पना नहीं है। तपोपूत ज्ञान धन आर्य ऋषियों ने चिन्तन के आधार पर जो निष्कर्ष निकाले थे उनकी सत्यता को आज के इस विज्ञान प्रधान युग में गो-भक्षक पाश्चात्य देशों के मनीषियों ने मुक्त कण्ठ से स्वीकार किया है और वे पुकार-पुकार कर कह रहे हैं कि “गाय सुख-समृद्धि की जननी है। मनुष्य जाति के इतिहास में आज तक जिन जातियों ने गो-रक्षण किया वे उन्नति के शिखर पर पहुँची और जिन्होंने गो-भक्षण किया वे अवनति के गहरे गढ़े में आज तक पड़ी हुई हैं।”
मुसलमानों के आगमन के साथ हमारे देश में गो-हत्या शुरू हुई थी। अंग्रेजी शासन-काल में तो व्यापार के आधार पर गो हत्या होने लगी और यह जघन्य कृत्य महात्मा गाँधी के उत्तराधिकारियों के शासन काल में अबाध गति से जारी है। गो-माँस, चमड़ा, हड्डी, आदि दूसरे देशों को बेच कर भारत वर्ष कई करोड़ रुपया प्रति वर्ष कमाता है। कैसी पुण्य कमाई है। क्या बढ़िया निर्यात व्यापार है! और आयात? दूसरे देशों से हम प्रति वर्ष करोड़ों रुपये की लागत के दुग्ध-चूर्ण आदि दुग्ध जन्य पदार्थ मंगवाते हैं। उधर यूरोप के स्विट्जरलैंड, डेनमार्क, आदि पिद्दी से छोटे-छोटे गो भक्षक देश भी शब्दशः दूधों नहाते हैं। वहाँ के निवासी स्वयं तो दूध का प्रयोग जी भर कर सकते ही है, दुग्ध जन्य पदार्थ प्रति वर्ष विदेशों को निर्यात कर सैकड़ों रुपये कमाते हैं सो अलग।
हमारे कितने ही नेताओं तक को यह भ्रम है कि मुसलमान मत में गोवध अनिवार्य ठहराया गया है। वास्तविकता यह है कि मुसलमानी मत में कहीं भी गो-वध का विधान नहीं है, और एक धर्म पुस्तक में तो गो-घातक को नरक का अधिकारी बताया गया है। मुसलमानी देशों में लोग गो-वध जानते ही नहीं। भारत में ही अनेक मुसलमान बादशाहों ने राजाज्ञा द्वारा गो-वध बन्द करा दिया था। यदि मुसलमानों के लिए गोवध धार्मिक दृष्टि से अनिवार्य होता तो वे ऐसा कदापि नहीं करते। इसी जमाने में स्वर्गीय हकीम अजमलखाँ, सरसैयद अहमद, डॉ. सैयद महमूद, मौ. अब्दुल बारी आदि कितने ही गण्यमान्य मुसलिम नेताओं ने गो-रक्षा का समर्थन किया है। अभी हाल में नेहरू जी के मित्र केन्द्रीय मन्त्रीमण्डल के सदस्य माननीय रफी अहमद किदवई ने भी गो-रक्षा का समर्थन किया है।
संसार में भारत ही एक ऐसा देश हैं जहाँ उपयोगी पशुओं का अँधा-धुन्ध वध होता है। इस अभागे देश में तो जच्चा के गर्भस्थ बच्चों तक को मार कर उनकी खालें विदेशों को निर्यात की जाती हैं क्योंकि मुलायम खाल की कीमत ज्यादा मिलती है। इस जघन्य कृत्य की कोई भी मजहब आज्ञा नहीं देता।
पश्चिम के देश माँसाहारी हैं तथापि घी दूध को वे लोग भी अत्यावश्यक समझते हैं। हमारे शाकाहारी देश में तो इन पदार्थों का और भी अधिक महत्व है। लेकिन आँकड़ों को देखने से स्पष्ट हो जाता है कि हमारे देश में इन पदार्थों को कोई महत्व नहीं दिया जाता। जहाँ भारत में पशुओं की उन्नति के लिए आध आना प्रति पशु खर्च किया जाता है वहाँ अमरीका आदि देशों में एक रुपया प्रति पशु। न्यूजीलैण्ड में दूध की खपत का अनुपात प्रति व्यक्ति 56 औंस है जबकि भारत में 6 औंस ही है। एक पाश्चात्य विद्वान का कथन है कि अब तब ज्ञात खाद्य पदार्थों में सब से अधिक पूर्ण खाद्य दूध ही है। हमारी इस मूर्खता का नतीजा एक तो यही है कि जहाँ और देशों में मनुष्य की आयु का अनुपात (औसत) 50, 60 वर्ष तक बैठता है वहाँ भारत में 22 वर्ष ही है।
गाय हमारे राष्ट्र की रीढ़ है। भारत का आर्थिक ढाँचा गाय पर टिका हुआ है। गाय हमारे किसानों का सर्वस्व है। भारत के नेताओं, अर्थशास्त्रियों तथा पश्चिमीय विद्वानों ने भी आर्थिक दृष्टि से गाय को अत्यन्त महत्व दिया है। गाँधी जी ने लिखा है- “जब तक हम गाय को बचाने का उपाय ढूँढ़ नहीं निकालते तब तक स्वराज्य का अर्थ ही न कहा जावेगा। देश की सुख-समृद्धि गौरक्षा और उसकी सन्तान की समृद्धि के साथ जुड़ी हुई है।

