हमारा जीवनोद्देश्य-अक्षय सुख
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(श्री हरगोविन्द जी पाराशर काव्यतीर्थ साहित्यरत्न)
मानव के नैसर्गिक इच्छात्रय में सुख प्राप्ति की आकाँक्षा सर्वप्रमुख है। वह अपने हृदय से उसको चाहता है तथा उसी की प्राप्ति में सदैव प्रयत्नशील रहता है। “दुःख से निवृत्ति हो चिरन्तन सुख मुझे मिले” यह मनुष्य चाहता तो अवश्य है, पर माया के पाश में कुण्ठित बुद्धि हो उस ‘अक्षय सुख’ के यथेष्ट महत्व और सन्मार्ग को न जानने के कारण लक्ष्य भ्रष्ट हो विफल मनोरथ संसार में बारम्बार भ्रमित होता रहता है। यहाँ हमारे प्रस्तुत विषय की स्पष्टि के लिए निम्नलिखित इन प्रश्नों के उत्तर अभीष्ट होंगे-
(1) सुख किसे कहते हैं? (2) उसके कितने विभेद हैं? (3) उनमें मानव की कैसी अवस्था रहती है? (4) मनुष्य को कौन सा सुख श्रेयस्कर है? (5) अक्षय सुख क्या है? (6) यह सुख कैसे प्राप्त किया जा सकता है? तथा इसे प्राप्त करने से क्या होता है? आइए इन प्रश्नों पर विचार करें।
(1) दैहिक (देह सम्बन्धी) दैविक (भाग्य सम्बन्धी) और भौतिक (संसारी) इन तीनों तापों के दुःख से निवृत्ति हो ऐसी शान्ति को ‘सुख’ कहते हैं।
(2) सम्पूर्ण सुखों को संक्षेपतः दो मुख्य भागों में विभक्त किया जा सकता है- (1) निरालम्ब सुख और सालम्ब सुख। किसी वस्तु या आकार के अवलम्बन साहित्य सुख को ‘निरालम्ब’ तथा किसी वस्तु या साकार द्वारा प्राप्त सुख को ‘सालम्ब सुख’ कहा जाता है।
निरालम्ब सुख स्थायी तथा सालम्ब सुख अस्थायी होता है क्योंकि निराकार अविनाशी एवं स्थायी होता है, इसके विपरीत साकार वस्तु विनाशी होती है। जो सुख जिस आलम्ब के हेतु होगा, उसके नष्ट होने पर ‘तज्जनित सुख’ भी नष्ट हो जावेगा। यदि वह आलम्बन अविनाशी अक्षय है तो तज्जनित सुख भी अविनाशी होगा।
(3) निरालम्ब सुख ‘आत्मानन्द’ नाम से भी व्यवहृत होता है प्रत्येक प्राणि आत्मवान् है, तथा ‘आनन्द’ आत्मा का गुण है आत्मा और परमात्मा वस्तुतः अभिन्न हैं, जब आत्मा अनुभवजन्य हो जाती है, तब वह (प्राणि) आनन्दमय हो जाता है। सालम्ब सुख में मानव की सुख दुःखात्मक अवस्था रहती है, कारण-यह सुख किसी साकार वस्तु का अवलम्बन जन्य होता है। पहले हम कह चुके हैं कि साकार विनाशी होता है। अतः तज्जन्य सुख भी नष्ट हो जाता है, तब उसकी दशा भी पूर्ववत दुःखी हो जाती है। इस सुख में अन्योन्याश्रय सम्बन्ध हैं, जैसे धन के कारण जो सुख होगा उसके नष्ट होने पर तज्जन्य उस सुख का भी विनाश निश्चित हो जायगा और उस उपयोग (सुख) के अभाव में धन का भी नाश हो जावेगा।
(4) इन दोनों सुखों को यदि अक्षयता रूपी मापदण्ड में तौला जाय तो निरालम्ब रुख ही गुरु निकलेगा। इसी ‘निरालम्ब सुख’ को ‘अक्षय सुख’ भी कहते हैं, अतः मनुष्य को इसी सुख की प्राप्ति में कृत प्रयत्न होना चाहिये।
(5) ‘अक्षय सुख’ उसे कहते हैं जो कभी भी किसी भी अवस्था में कम न हो किन्तु अक्षय ही बना रहे। सुख तभी अक्षय हो सकता है, जबकि उसका आलम्बन भी अक्षय हो। अक्षय आलम्बन परमात्मा अर्थात् ब्रह्म के सिवा और कुछ भी नहीं। वही ब्रह्म एक ऐसा तत्व है जिसका आज तक कोई वर्णन उपस्थित नहीं कर सका है। यद्यपि वेद चतुष्टय इस तरफ खूब प्रयत्न करते हैं पर ‘नेति नेति’ से अपनी असमर्थता भी व्यक्त कर देते हैं। वही तत्व आकार रहित और अक्षय है उसी के सहारे जो अखण्ड सुख प्राप्त होता है वही ‘अक्षय सुख’ कहा जाता है।
(6) इसी अक्षय सुख की प्राप्ति का मार्ग-निर्देशन प्रत्येक धर्म अपनी-अपनी रीति से स्पष्ट करते हैं। ‘जितने मत वे ही पथ’ के अनुसार सब धर्म उसी एक परम तत्व या ‘अक्षय सुख’ की प्राप्ति के मार्ग हैं। किसी भी धर्म से इस ‘अक्षय सुख’ को प्राप्त किया जा सकता है, अन्तर केवल इतना ही है कि कोई मार्ग सीधा है तो कोई घुमावदार।
इस सुख को जो प्राप्त कर लेता है वह कहीं तन्मय हो जाता है। इसी मत का दृष्टीकरण तुलसी दास जी ने अपने इन शब्दों में इस प्रकार किया है-
सोई जानेहू जेहि देहु जलाई।
जानत तुम्हई तुम्हई होहि जाई॥
मानव की एक ‘ऐसा प्राणी है जो’ इस सुख की प्राप्ति भली भाँति करने में समर्थ हो सकता है। इस ‘अक्षय सुख’ की प्राप्ति का एक सीधा मार्ग जो हमारे ऋषि मुनियों से विहित है संक्षिप्त में निर्दिष्ट करना ‘अप्रासंगिक’ न होगा। पहले सत्शास्त्रों को अध्ययन एवं मनन कर सत्संग से भगवान में श्रद्धा और विश्वास को दूर कर, इन्द्रियों का नियमन करते हुए मन को वश में करे। मन को वश में करना बड़ा ही कठिन कार्य है, अतः उसे अभ्यास और वैराग्य (त्याग) से वश में करे। तथा-
यतो यतो निश्चरति, मनश्चञ्चल मस्थिरम्।
ततस्ततो नियम्यैत, दात्मन्येव वशं न येत्। गीता।
“अस्थिर चंचल मन जिन-जिन विषयों की ओर दौड़े, वहाँ-वहाँ से उसका नियमन करते हुए आत्मा के वश में करे।”
तमोगुण के पाँच तथा रजोगुण के तीन (काम, क्रोध, लोभ) इन आठों गुणों से जब तक समूल निवृत्ति नहीं होती, तब तक मन वश में नहीं होता। अतः धीरे-धीरे दृढ़ाभ्यास से तमोगुण और रजोगुण का परित्याग करें, इससे तत्व गुण की प्राप्ति होती है तथा मन वश में हो जाता है। इसके बाद दैहिक, दैविक, भौतिक तापों को समूल जीतकर दत्तचित्त हो परमात्मा प्राप्ति के लिए निदिध्यासन करे, इससे अन्तःकरण में ज्ञान का आविर्भाव होगा। ज्ञान होने पर कर्म बन्धन से मुक्ति प्राप्त हो जाती है, जैसा कि गीता में कहा भी है-
सर्व कर्माखिलं पार्थ। ज्ञाने परि समाप्यते॥ 4।
“हे पार्थ! सम्पूर्ण यावकर्म ज्ञान में समाप्त हो जाते हैं।” ज्ञान ‘अक्षय सुख’ का प्रवेशद्वार है। यहाँ आने पर साधक शान्ति के पास पहुँचने लगता है। गीता में कहा भी है-
ज्ञानं लब्ध्वा पराँ शान्ति मचिरेणाधि गच्छति।
“ज्ञान को प्राप्त कर परमशान्ति या अक्षय सुख शीघ्र ही प्राप्त होता है। पर अभी प्राप्ति नहीं हुई, इसके बाद ज्ञान रूपी तलवार से तीन विघ्न छेदन करने शेष रह जाते हैं। ये सब अक्षय सुख की प्राप्ति के बाधक हैं, ये वे ही तीन शरीर हैं जो स्थूल, सूक्ष्म और कारण शरीर कहे जाते हैं। इन्हीं तीनों परदों का ज्ञानखण से छेदन कर साधक ‘अक्षय सुख’ प्राप्त करता है।
भगवान कृष्ण ने अर्जुन को इसी ‘अक्षय सुख’ की प्राप्ति के लिए तलवार चलाने की आज्ञा दी है-
तस्मादज्ञान सम्पूतं, हृत्स्थं ज्ञानासिनात्मनः।
छित्वैनं संशयं योग मातिष्ठोत्तिष्ठ भारत 4। 42
हे अर्जुन! तू समत्व बुद्धि योग में स्थित हो, और अज्ञान से उत्पन्न हुए हृदय स्थित इस अपने संशय (शरीर त्रय) को ज्ञान रूप तलवार के द्वारा छेदन कर, खड़ा हो अर्थात् अक्षय सुख की प्राप्ति कर।
इन तीनों शरीरों के छेदन होने पर साधक अखण्डानन्द अर्थात् ‘अक्षय सुख’ प्राप्त करता है, तथा वह वहीं स्थिर हो जाता है लौटता नहीं। भगवान ने भी कहा है-
य प्राप्य न निवर्तन्ते, तद्धाम परमं मम।
जहाँ पहुँच कर फिर आवागमन नहीं होता वही मेरा परम धाम है।
इसी ‘अक्षय सुख’ की प्राप्ति में मनुष्यत्व की सार्थकता है। इस कारण हे मेरे भाइयो! आप इसी की प्राप्ति में जुट जाओ। भगवान बड़े ही दयालु हैं वह तुमको शीघ्र ही अपना लेंगे इसमें कोई शक नहीं।

