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Magazine - Year 1953 - Version 2

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यज्ञ द्वारा आरोग्य लाभ

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First 11 13 Last
यज्ञ में आरोग्य वर्धक एवं रोग निवारक अद्भुत गुण हैं। जहाँ यज्ञ होते हैं। वहाँ सामूहिक रोगों की निश्चित रूप से कमी होती हैं। जलवायु का परिमार्जन एवं संशोधन होने से उनके रोग कारण दोष हट जाते हैं और आरोग्य वर्धक गुण बढ़ते हैं। फलस्वरूप अनेक रोगों से जनता अपने आप मुक्त हो जाती है। यज्ञ करना एक बड़ा अस्पताल खोलने के समान है जिससे अगणित रोग ग्रस्तों तथा भविष्य में बीमार पड़ने वाले लोगों का इलाज उनके घर बैठे ही हो जाता है। चिकित्सा पर जो धन, समय, श्रम, चिन्ता, काम में हानि आदि की कठिनाई होती है उससे अनेक रोग बन जाते हैं। सब प्रकार यज्ञ करना अस्पताल खोलने से भी अधिक उपयोगी सिद्ध होता हैं।

यज्ञ के आरोग्य वर्धक रोग निवारक गुणों का वर्णन करने वाले अनेकों मंत्र वेदों में भरें पड़े हैं उनमें से कुछ यहाँ दिये जाते हैं-

ममाग्ने वर्चोविहवेष्वस्तु वयं त्वेन्धाना स्तन्वं पुषेम।

अथर्व 4। 3। 1

हे अग्नि, हम आपको यज्ञ में प्रदीप्त करते हैं, आप हमारे शरीर को पुष्ट और तेज को प्रदीप्त करो।

यदि क्षितायुर्यदि का परेतो यदि मृत्योरन्तिकं नीति एवं। तमाहरामि निऋर्तरुपस्था दत्वार्षमेन शत शारदाय

अथर्व 3। 11। 2

यदि रोगी अपनी जीवन शक्ति को खो भी चुका हो निराशाजनक स्थिति को पहुँच गया हो, यदि मरण काल भी समीप आ पहुँचा हो तो भी उसको मैं मृत्यु के चंगुल से बचा लेता हूँ और सौ वर्ष जीने के लिए पुनः बलवान कर देता हूँ।

सहस्त्राक्षेण शतवीर्येण शर्तायुषा हविषाहार्षमेनम्।

इन्द्रौ यथैनं शरदो नयात्यति विश्वस्य दुरितस्य पारम।

-अथर्व 3। । 113

हजारों शक्तियों से युक्त, सौ वर्ष की आयु देने वाले इस हवन द्वारा रोगों को मौत के पंजे से बचाता हूँ। प्रभु इसे समस्त पापों तथा रोगों से मुक्त करें।

कोई पदार्थ अपने स्थूल रूप में जितना शक्तिशाली होता है उसकी अपेक्षा वह सूक्ष्म रूप में अधिक प्रभावशाली एवं विस्तृत हो जाता है। आयुर्वेद ग्रन्थों में लिखा है-बादाम को साबुत खाने की अपेक्षा पीसकर खाने में अधिक गुण हैं। पीसने की अपेक्षा घिसकर खाना अधिक लाभदायक है।” कारण स्पष्ट है जो वस्तु जितनी बारीक होती जाती है। सूक्ष्म बनती जाती है उतने ही उसके गुण बढ़ते जाते हैं। रोटी के ग्रास यों ही अधकुचले निगल लिए जायं तो वह भोजन उतना लाभ दायक न होगा जितना कि खूब चबा-चबाकर बारीक करके खाया हुआ भोजन। सोने या चाँदी का टुकड़ा किसी को खिलाया जाय तो उसके किसी लाभ की आशा नहीं किन्तु यदि उसी सोने या चाँदी को सूक्ष्म करके भस्म या वर्क बनाकर खिलाये जाते हैं तो उसका रोग निवारक एवं बलवर्धक पड़ता है। औषधि विद्या के ज्ञाता जानते हैं कि किसी औषधि को जितना ही बारीक किया जाता है अधिक घोटा जाता है उतनी ही वह अधिक गुणकारी बनती जाती है कारण यही है कि स्थूल की अपेक्षा सूक्ष्म का गुण विशेष होता है। यज्ञ में हवन सामग्री को अग्नि द्वारा स्थूल से सूक्ष्म बनाया जाता है, फलस्वरूप उसकी शक्ति एवं उपयोगिता भी बहुत बढ़ जाती है।

अग्नि में जलाने से कोई वस्तु नष्ट हो जाती है ऐसा सोचना ठीक नहीं। विज्ञान बताता है कि कोई भी पदार्थ कभी नष्ट नहीं हो सकता केवल उसका रूपांतर होता रहता है। जो वस्तु अभी मूर्त रूप में दिखाई दे रही हैं वह यदि अग्नि से, जल से, तोड़ फोड़ देने से या किसी अन्य प्रकार से नष्ट कर दी जाय तो वह नाश केवल उससे मूर्त रूप का ही होता है। उसके समस्त परमाणु ज्यों के त्यों अक्षुण्य रहते हैं उनका रूप भले ही बदल जाय पर उनका अस्तित्व बराबर बना रहता है। हवन में जलाई हुई सामग्री बर्बाद नहीं हो जाती केवल उसका रूप बदलता है। पहले वह मूर्त रूप में केवल एक स्थानीय थी, फिर वह सूक्ष्म होकर वायु रूप बनती हैं और विस्तृत क्षेत्र में फैलकर अपना व्यापक असर दिखाती है।

मिर्च को यदि साधारण रीति से सूँघा जाय तो उसमें कोई विशेष बात न मालूम पड़ेगी। यदि उसे कूटा जाय तो कूटते समय जो उसके सूक्ष्म परमाणु इधर-उधर उड़ेंगे उनके पास बैठे हुए लोगों को खाँसी आवेगी। यदि उसी मिर्च को जलाया जाय जो जितनी दूर तक वायु में उसके परमाणु फैलेंगे उतनी दूर तक के लोग छींकने लगेंगे। मिर्च अपने मूर्त रूप में जितनी शक्तिशाली थी उसकी अपेक्षा कूटने पर और उसकी अपेक्षा जलाने पर अधिक परिणाम में और अधिक क्षेत्र में अपना प्रभाव दिखा सकी। ‘सूक्ष्मता में अधिक शक्ति’ के इस सिद्धान्त के आधार पर यज्ञ की उपयोगिता बहुत कुछ समझी जा सकती है।

रोगों के कीटाणु बहुत ही बारीक होते हैं। उन्हें खुली आँखों से तो देखना भी असम्भव है। बढ़िया सूक्ष्मदर्शी यन्त्रों की सहायता से ही वे देखे जाते हैं। साधारणतया एक इंच स्थान में तीस हजार कीटाणु रहते हैं। कभी कुछ कम होते हैं। तो कभी-कभी वे और भी अधिक छोटे होने के कारण एक इंच में और भी अधिक संख्या में रह सकते हैं। औषधियों के कण स्वभावतः इतने बारीक नहीं हो सकते इसलिए वे सभी कीटाणुओं तक नहीं पहुँच सकते किन्तु वहीं औषधि यदि अग्नि में जलाई जाती है। तो वह वायु रूप होकर अधिक सूक्ष्म बन जाती है और उन बारीक से बारीक रोग कीटाणुओं के पास आसानी से पहुँच कर उन्हें नष्ट करने में समर्थ हो सकती है। मोटे रूप में खिलाने पर औषधि द्रव्य जितना गुण करते हैं उसकी अपेक्षा वायु रूप होने पर उनका गुण निश्चय ही अधिक होगा क्योंकि वे श्वास के साथ, रोम कूपों के द्वारा शरीर के प्रत्येक स्थान तक स्वल्प काल में प्रचुर परमाणु में पहुँच सकती है। औषधि को खाने पर वह पेट में पचती है तब रक्त में मिलने पर अपना प्रभाव रोगी के अंग तक पहुँचाती है पर हवन द्वारा उस औषधि को रोगी अंग के किसी भी भाग तक आसानी से पहुँचाया जा सकता है। हवन द्वारा औषधियों के प्रभाव को शरीर के गहरे से गहरे स्थान में सुगमता पूर्वक पहुँचाया जा सकता है।

कभी-कभी हैजा, चेचक, प्लेग आदि का प्रकोप होने की सम्भावना होती है, तो डॉक्टर लोग उसकी पूर्ण सुरक्षा के रूप में उस रोग के टीके (इंजेक्शन) लगाते हैं ताकि भविष्य में उस व्यक्ति पर उस रोग के आक्रमण की सम्भावना न रहे। उनका कहना है कि इस टीके की औषधि से रक्त में ऐसा प्रभाव उत्पन्न हो जाता है कि उस पर रोग का आक्रमण सफल नहीं हो सकता। डाक्टरों की यह खर्चीली एवं आडम्बर पूर्ण प्रक्रिया यज्ञ द्वारा अधिक अच्छी तरह हो सकती है। हवन करने से उसमें जलाई औषधियाँ सूक्ष्म होकर निकटवर्ती लोगों के शरीर में प्रवेश करती हैं और रक्त में ऐसा प्रभाव छोड़ देती हैं कि फिर वहाँ रोगों का आक्रमण नहीं हो सकता और ‘पूर्ण सुरक्षा’ की उचित व्यवस्था अपने आप हो जाती है।

आजकल बड़े-बड़े मेलों में हैजा आदि रोगों में टीका लगाने में बहुत खर्च होता है और टीका लगाने वालों को सुई चुभने का तथा उसकी प्रतिक्रिया में ज्वर आदि का कष्ट सहना पड़ता है फिर भी हैजा आदि की समुचित रोक नहीं होती। प्राचीन काल में ऐसे पर्वों पर बड़े-बड़े यज्ञ होते थे, जिनके कारण अधिक जन समूह इकट्ठा होने पर रोग आदि बढ़ने का भय तो दूर उलटे इन आगन्तुकों को आरोग्य लाभ होता था। आज तो समय की गति ही दूसरी है। लोग अपने महत्वपूर्ण विज्ञान भूलते जाते हैं उसे घृणा और अपेक्षा की दृष्टि से देखते हैं और दूसरों के अन्धानुकरण को अपनी बुद्धिमत्ता और प्रगतिशीलता मानते हैं।

रोग नाश में हवन कितना सहायक एवं उपयोगी होता है इस सम्बन्ध में प्रो. टिलवर्ट डॉ. टाटलिट डॉ. हेफकिन की खोजें बहुत उत्साहवर्धक हैं। उन्होंने वैज्ञानिक दृष्टि से अनेक वस्तुओं के धुएं बहुत ही उपयोगी सिद्ध किए हैं ।

रसायन शास्त्र के फ्राँसीसी विज्ञान वेत्ता डॉक्टर बिले ने अग्नि और धुँए का वायु पर क्या प्रभाव पड़ता है उस सम्बन्ध में गहरी शोध की है। उन्होंने विभिन्न पदार्थों के जलने से उत्पन्न धुओं के गुण-दोषों की जाँच करके पता लगाया है कि कतिपय वस्तुएँ ऐसी हैं जो अपने साधारण रूप की अपेक्षा जलने पर कहीं अधिक लाभदायक बन जाती हैं। उनका कहना है कि शक्कर जलाने में फार्मिक आलडीहाइड नामक गैस बनती है जो वायु में छाये हुए हैजा, महामारी, क्षय, चेचक आदि के रोग कीटाणुओं को दूर करती है। गन्ने की साधारण खाँड की अपेक्षा मुनक्का, छुहारा, किशमिश मधुर पदार्थों से जो गैस उत्पन्न होती है उसमें कृमि नाश के अतिरिक्त पोषण का भी विशेष गुण है। फार्मेलिन नामक एक पदार्थ डाक्टरों की दुकान पर बिकता है यह मकानों की शुद्धि एवं कीटाणु नाश के लिए काम में लाया जाता है। यह फार्मेलिन लकड़ियों को जलाकर बनाई हुई गैस का द्रव रूप ही है। साधारण लकड़ियों की गैस बनी फार्मेलिन जब इतनी उपयोगी है तो हवन में प्रयुक्त होने वाली विशेष गुण वाले वृक्षों की विशेष समिधाओं का यज्ञ धूम्र कितना उपयोगी होगा इसका अनुमान लगाना कुछ कठिन नहीं है।

यज्ञ से राजयक्ष्मा जैसे असाध्य एवं कष्ट साध्य समझे जाने वाले रोग भी दूर हो जाते हैं। जिन रोगों में साधारण औषधियाँ काम नहीं करतीं उनमें विधिपूर्वक यज्ञ विशेष उपयोगी सिद्ध होता है। चरक ऋषि का भी ऐसा ही मत है-

प्रयुक्तया यथा चेष्टया राजयक्ष्मा पुरोजितः।

ताँ वेद विहितामिष्टि मारोग्यार्थी प्रयोजयेत्॥

वरक चिकित्सा खण्ड 8। 122

प्राचीन काल में जिस यज्ञ के प्रयोग से राज यक्ष्मा रोग नष्ट किया जाता था। रोग मुक्ति की इच्छा रखने वाले मनुष्य को चाहिये कि उसी वेद विहित यज्ञ का आश्रय ले।

अथर्व वेद में कहा गया है कि संजीवनी शक्ति रोगी को प्राप्त होती है और वह रोग मुक्त होता है।

यथा :-

युँचामित्वा हविषा जीवनाय कमज्ञातयक्ष्यादुत राजयक्ष्मात। ग्रहिर्जग्रह यद्येत देन तस्या इन्द्राग्नि प्रमुमुक्तमेनम् ॥

अथर्व. 11। 1

हे व्याधि ग्रस्त रोगी, तुझको सुख के साथ चिरकाल तक जीने के लिए गुप्त यक्ष्मा और प्रकट तपैदिक रोग से हवन द्वारा मुक्त करता हूँ। इस रोगी को रोग से इन्द्र सूर्य एवं यज्ञ छुड़ा देंगे।

प्राचीन काल में आरोग्य वृद्धि और रोग निवारण के लिए यज्ञ होते थे, उनका ब्रह्मा कोई आरोग्य शास्त्र का मर्मज्ञ विद्वान होता था जो सूक्ष्म वैज्ञानिक परीक्षा द्वारा यह जान लेता था कि इस समय वायु मण्डल में दया विकार बढ़ जाने से कौन रोग फैला हुआ है और उसके निवारण के लिए किन औषधियों का हवन करना चाहिए। व्यक्तिगत रोगों के लिए भी ऐसे हवनों का आयोजन किया जाना था। रोगी के शरीर में कौन सी व्याधि बढ़ी हुई है, कौन से तत्व घट-बढ़ गये हैं उनकी पूर्ति करने एवं शरीरगत धातुओं का संतुलन ठीक करने के लिए किन औषधियों की आवश्यकता है वह ऐसा निर्माण करता था और उन औषधियों की सम्मिति बना कर, उसी प्रकृति के वेद मन्त्रों से आहुतियाँ दिला कर हवन कराया जाता था। वैसा ही पुरोडस एवं यज्ञावशिष्ठ रोगी के लिए तैयार किया जाता था, रोगी यज्ञ धूप के वातावरण में रहता था और उसी वायु से सुवासित जल वायु एवं आहार ग्रहण करता था। ऐसे भेषज यज्ञों के अनेक वर्णन ग्रन्थों में आते हैं :-

भैषज्य यज्ञा वा एते। ऋतु सन्धिषु व्याधिर्जायते तस्यादृतु सन्धिषु प्रयुज्यन्ते।

शतपथ

अर्थात्- यह भैषज्य यज्ञ है। ऋतु परिवर्तन के समय जो व्याधियाँ उत्पन्न होती हैं उनके निवारण के लिए इनका प्रयोग होता है।

भैषज वृतोह वा एष यज्ञो यत्रैवं विद् ब्रह्मा भवति।

छान्दोग्य 4। 17।18

अर्थात्- भैषज्य यज्ञों में आयुर्वेद शास्त्र का ज्ञाता ब्रह्मा होता है।

आज वह यज्ञ चिकित्सा की महत्व पूर्ण विद्या लुप्त प्रायः हो गई है परन्तु यदि इस दिशा में अभिरुचि रखने वाले मनीषी लोग प्रयत्न करें तो इस महत्व पूर्ण विज्ञान को पुनर्जीवित करके असंख्य रोगियों की पर्याप्त रक्षा की जा सकती है।

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