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Magazine - Year 1953 - Version 2

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गायत्री चर्चा, नवरात्रि में गायत्री उपासना कीजिए।

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गायत्री प्रेमियों से यह छिपा नहीं है कि नवरात्रि का पुण्य काल गायत्री उपासना के लिये बहुत ही महत्वपूर्ण पर्व है। पिछले दिनों समय-समय पर नवरात्रि की विशेषता पर प्रकाश डालते हुए यह बताया जाता रहा है कि जैसे रात्रि और दिन के मिलन का समय ‘सन्ध्या’ काल कहलाता है और सन्ध्या काल की उपासना, साधारण समय की अपेक्षा अधिक फलवती होती है उसी प्रकार सर्दी और गर्मी की ऋतुओं का मिलन काल भी आध्यात्मिक साधना के लिए विशेष फलप्रद है। यह ऋतु सन्ध्या नवरात्रि ही है।

जैसे खेत में बीज बोने का एक विशेष समय आता है यदि उन्हीं दिनों बीज बोया जाय तो वह भली प्रकार उगता और फलता-फूलता है यदि इस निर्धारित समय से आगे पीछे बीज बोया जाय तो वैसा उपयुक्त फल नहीं होता इसी प्रकार नवरात्रि का समय भी साधना के लिये बहुत ही उपयुक्त है, इस समय जो जप, तप किया जाता है उसका फल अन्य साधारण समयों की अपेक्षा अधिक उत्तम होता है। जैसे स्त्री के ऋतुवती होने पर गर्भाधान सफल होने की सम्भावना अधिक रहती है वैसे ही नवरात्रि की गायत्री उपासना भी अधिक फलवती होती है। मिठाई बनाने के लिए चासनी पकाकर तार उठने के समय का जो महत्व है, वही महत्व नवरात्रि काल का है।

दो ऋतुओं की सन्ध्या मिलने पर शरीर गत मल फूल आता है और उस समय देह गत दोषों की सफाई बहुत अच्छे ढंग से एवं आसानी से हो सकती है। अनुभवी वैद्य जीर्ण रोगों के रोगियों की कोष्ट शुद्धि करने के लिए आश्विन या चैत्र में जुलाब देते हैं। और उदर रोग रक्त विकार आदि से रोगी को अच्छा करते हैं। आत्मिक रोगों के रोगी भी व्रत उपवास की तपश्चर्या रूपी जुलाब लेने और अनुष्ठान आदि की साधना रूप औषधि सेवन करें तो वे अन्य समय के उपचार की अपेक्षा अधिक लाभ उठा सकते हैं।

मुहूर्तों का विज्ञान ही महत्वपूर्ण है। पृथ्वी की चाल और ग्रह नक्षत्रों की चाल के अनुसार उनकी आकर्षण शक्ति एवं किरणों का प्रत्यावर्तन होता है, कई बार नक्षत्रों एवं ग्रहों की ऐसी किरणें पृथ्वी पर आती है कि उस समय रोग, भय, मानसिक उत्तेजना, कलह, अग्नि काण्ड आदि के उपद्रव फैलते हैं किसी समय कोई विशेष रोग दूर-दूर तक फैलता है और समय बदलने पर वह रोग अपने आप चला जाता है। इसमें जलवायु के जहाँ अनेक कारण हैं वहाँ अदृश्य शक्तियों एवं किरणों का पृथ्वी पर आवागमन का कर्म भी हैं। ‘मुहूर्त’ देखने या दिखाने का विज्ञान इसी आधार पर निर्धारित है। नवरात्रि का मुहूर्त ऐसा है जिस पर सात्विक दिव्य गुणों वाली शक्तियाँ, किरणें एवं सत्ताएं पृथ्वी पर छाई रहती हैं। साधना के अनुकूल वातावरण उन दिनों पृथ्वी पर छाया रहने से थोड़े ही समय में बहुत महत्वपूर्ण कार्य हो जाता है। इन्हीं सब बातों का ध्यान रखते हुए नवरात्रि में गायत्री की विशेष उपासना करने का जोर दिया जाता रहा है।

जो लोग गायत्री उपासना में पहले से ही रुचि रखते हैं उन्हें उचित है कि इन दिनों 24 हजार लघु अनुष्ठान करने का प्रयत्न करें। जो केवल श्रद्धालु हैं जिन्होंने अभी तक कोई उपासना नहीं की हैं और आगे भी कोई निश्चय साधना क्रम बनने में कठिनाई दिखाई पड़ती है उन्हें भी ऐसा करना चाहिए कि कम से कम इन 9 दिनों में तो थोड़ी बहुत साधना करने के लिये समय निकालें। परीक्षा रूप में इस समय थोड़ी बहुत साधना की जाय तो वह भी निष्फल नहीं जायगी, उसका परिणाम भी किसी न किसी दृष्टि से उत्तम ही सिद्ध होगा।

इस वर्ष नवरात्रि आश्विन सुदी 1 तारीख 8 अक्टूबर गुरुवार से आरम्भ होकर 8 दिन तक आश्विन सुदी 8 ता. 17 अक्टूबर शनिवार तक रहेगी। (इस बार एक तिथि बढ़ गई है) इन नौ दिनों में 24 हजार जप का लघु अनुष्ठान आसानी से किया जा सकता है। 9 दिन में 24 हजार जप करने के लिए प्रतिदिन 2667 मन्त्र जपने होते हैं। एक माला में 108 दाने होते हैं। प्रतिदिन 25 माला जपने से यह संख्या पूरी हो जाती है। एक घण्टे में साधारणतः 8 से 10 मालाएँ आसानी से जपी जा सकती हैं। इस प्रकार 2.30-3 घंटे में यह जप पूरा हो सकता है इतना समय निकालना कुछ अधिक नहीं है।

इन दिनों सूर्य प्रातः साढ़े 6 बजे निकलता है। दो घण्टे रात्रि रहे उठ कर शौच से निवृत्ति होकर सूर्योदय से डेढ़ घण्टा पूर्व यदि साधना पर बैठा जाय तो दो घण्टे दिन चढ़े 8॥ बजे तक यह साधन पूरा हो सकता है। जिन्हें प्रातःकाल इतना समय मिलने में असुविधा हो वे कुछ समय प्रातः कुछ समय सायं काल निकाल कर जप की पूर्ति कर सकते हैं।

साधन के नियम बहुत सरल हैं। स्नानादि से निवृत्त होकर आसन बिछाकर पूर्व को मुख करके बैठें। जिन्होंने कोई प्रतिमा या चित्र किसी स्थिर स्थान पर प्रतिष्ठित कर रखा हो वे दिशा का भेद छोड़कर उस प्रतिमा के सम्मुख ही बैठे। वरुण देव तथा अग्नि देव को साक्षी करने के लिए पास में जल पात्र रख लें और घृत का दीपक या अगरबत्ती जला लें संध्यावंदन करके गायत्री माता का आवाहन करें। आवाहन मन्त्र जिन्हें याद न हो वे गायत्री शक्ति की मानसिक भावना करें। धूप, दीप, अक्षत, नैवेद्य, पुष्प, फल, चन्दन, दूर्वा, सुपारी, आदि पूजा की जो माँगलिक वस्तुएँ उपलब्ध हों उनसे चित्र या प्रतिमा का पूजन कर लें। जो लोग निराकार मानने वाले हों वे धूपबत्ती या दीपक की अग्नि को ही माता का प्रतीक मान कर उसे प्रणाम कर लें।

अपने गायत्री गुरु का भी इस समय पूजन वन्दन कर लेना चाहिये यही शाप मोचन है। कहा जाता है कि गायत्री मन्त्र कीलित है या शाप लगा हुआ है। उसका उत्कीलन करके जप करना चाहिए। इसका वास्तविक तात्पर्य इतना ही है कि स्वेच्छापूर्ण सर्व तन्त्र स्वतन्त्र साधना नहीं होनी चाहिये वरन् किसी के संरक्षण सहयोग एवं पथ-प्रदर्शन में साधना करनी चाहिए। नवरात्रि साधना में गुरु पूजन की विशेष आवश्यकता है क्योंकि अनुष्ठान का कोई ब्रह्मा सा संरक्षक अवश्य होता है।

इन दिनों जिससे जितनी तपश्चर्या बन पड़े उतनी उत्तम है। (1) ब्रह्मचर्य, (2) उपवास। यह दो तप प्रधान हैं। जो लोग केवल एक समय फलाहार पर नहीं रह सकते वे दो बार फल दूध ले सकते हैं। जिनके लिए यह भी कठिन हो वे दोपहर को बिना नमक का एक अन्न से बना हुआ भोजन और शाम को दूध लेकर अपना उपवास चला सकते हैं।

उपरोक्त दो प्रधान व्रतों के अतिरिक्त नवरात्रि में अन्य तितीक्षाएं भी उत्तम हैं। (1) भूमिशयन (2) चमड़े के जूतों का त्याग (3) पशुओं की सवारी का त्याग (4) शृंगार सामग्रियों का त्याग (5) अपना भोजन, जल, वस्त्र धोना, हजामत आदि शारीरिक कार्य स्वयं करना (6) प्रतिदिन कुछ समय मौन आदि संयम नियमों का पालन करने का यथा सम्भव प्रयत्न करना चाहिये।

जप के साथ-साथ हवन की भी आवश्यकता हैं। 24 हजार के अनुष्ठान में कम से कम 240 आहुतियों का हवन अवश्य होना चाहिये। इससे अधिक हो जाय तो और भी इच्छा है। प्रतिदिन 24 आहुतियों का हवन स्वयं करते रहने से दस दिन में वह पूरा हो जाता है। नित्य न हो सके तो वह अन्तिम दिन भी किया जा सकता है। हवन की विधि बहुत सरल है वह पिछले अंक में दी जा चुकी है।

जो साधक अपनी नवरात्रि तपश्चर्या की पूर्व सूचना हमें दे देंगे उनके साधन का संरक्षण, उनकी भूलों का परिमार्जन आवश्यक पथ-प्रदर्शन तथा उस साधन का आवश्यक परिपोषण यहाँ होता रहेगा। जो सज्जन अपना हवन न कर सकें वह भी हमें सूचित कर दें उनके निमित्त शास्त्रोक्त विधि से हवन यहाँ पर कर दिया जायगा।

जो नये उपासक हैं, जिनका पिछला कोई अनुभव नहीं हैं, वे नवरात्रि में 11 माला प्रतिदिन का नियम बना लें। इस प्रकार उनका दस हजार का जप हो जायगा। व्रत नियम पालन करना उनकी इच्छा पर निर्भर है, पर इन दिनों ब्रह्मचर्य से अवश्य रहें, जो व्यक्ति स्वयं साधना नहीं कर सकते वे दूसरों से अपने बदले का अनुष्ठान करा सकते हैं। इस प्रकार की समुचित व्यवस्था कराने में गायत्री संस्था की सहायता ली जा सकती है।

नवरात्रि में गायत्री चालीसा का 108 पाठों का अनुष्ठान भी होता है। 9 दिन में नित्य 12 पाठ करने से 108 पाठ पूरे हो जाते हैं। प्रायः दो घण्टे में 12 पाठ आसानी से हो जाते हैं इसके लिए किसी विशेष प्रतिबन्ध की आवश्यकता नहीं होती। अपनी सुविधा के किसी भी समय शुद्धता पूर्वक उत्तर को मुख करके देखना चाहिए और 12 पाठ कर लेने चाहिए अन्तिम दिन 108 या कम से कम 24 गायत्री चालीसा धार्मिक प्रकृति के व्यक्तियों में प्रसाद स्वरूप बाँट देनी चाहिये। स्त्रियाँ, बच्चे, रोगी, वृद्ध पुरुष तथा अव्यवस्थित दिनचर्या वाले कार्य व्यस्त लोग इस गायत्री चालीसा अनुष्ठान को आसानी से कर सकते हैं।

नौ दिन अनुष्ठान करके दसवें दिन उसकी समाप्ति करनी चाहिए। जिन्हें जल्दी ही वे नौंवे दिन अपना जप पूर्ण करके भी पूर्णाहुति कर सकते हैं। अन्तिम दिन पूर्णता का हवन होना आवश्यक है। अपनी सामर्थ्यानुसार आहुतियों की संख्या रखी जा सकती है। कई व्यक्ति हवन में साथ बैठ कर आहुतियों का बाँट भी कर सकते हैं।

हवन के उपरान्त सत्पात्रों को ब्राह्मण भोजन या यज्ञ दक्षिणा देने का नियम है। यह भी यथा सम्भव करना चाहिये। जिन्हें आर्थिक कारणों से हवन की सुविधा न हो वे केवल घृत की 24 आहुतियाँ दे दें। जो ब्रह्मभोज नहीं कर सकते वे गौओं को 24 छटाँक आटा और 24 तोले गुड़ के गोले बनाकर खिलादें। कुँवारी कन्याओं को भोजन कराना भी ब्राह्मण भोजन ही है। दान का एक अच्छा तरीका यह भी है कि सामर्थ्यानुसार पैसे की गायत्री सम्बन्धी छोटी पुस्तकें मंगाकर सत्पात्रों को वितरण कर दें। अन्न दान से ज्ञान दान का पुण्य फल अधिक है।

सदा की भाँति इस वर्ष भी हमारा नौ दिन का पूर्ण निराहार व्रत रहेगा। इसलिये व्यक्तिगत रूप से इन दिनों पत्र व्यवहार तो हम किसी से न करेंगे पर ऐसी व्यवस्था कर दी गई है कि सबके पत्रों का उत्तर यथोचित रूप से दिया जाता रहे। बहुधा कई व्यक्ति नवरात्रि में हमारे समीप रह कर साधना सम्बन्धी मार्ग दर्शन चाहते थे पर यहाँ पहले व्यवस्था ठीक न थी इसलिए प्रायः सभी को यहाँ न आने के लिए कहा जाता था पर अब ये कठिनाई दूर हो गई है। मथुरा में गायत्री तपोभूमि बनवाने के कारण यहाँ साधकों की ठहरने की व्यवस्था हो गई है। पर जो सज्जन आना चाहें वे पूर्व स्वीकृति अवश्य ले लें क्योंकि सीमित संख्या में ही ठहरने की व्यवस्था है।

भूल सुधार

गत जुलाई के गायत्री अंक में ब्रह्मनिष्ठ तपोमूर्ति श्री गायत्री स्वरूप जी वानप्रस्थी का परिचय पृष्ठ 21 पर छपा है उसमें दो भूलें रह गई हैं पाठक उन्हें सुधार लें। वानप्रस्थी जी की जन्मभूमि जोधपुर प्राँत में गंगाणी नामक कस्बे में है। (2) उनका मौन व्रत आरम्भ हुए अभी 1 वर्ष के लगभग हुआ है।

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